भारत-पाकिस्तान के बीच जंग नहीं चाहता चीन

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- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
भारत का चीन सबसे बड़ा पड़ोसी है, जिससे भारत की लंबी सीमा लगी हुई है. दोनों देशों के बीच 3,500 किलोमीटर की सरहद है.
1962 में दोनों देशों के बीच एक जंग भी हो चुकी है, जिसमें भारत को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा था. पाकिस्तान चीन का सदाबहार दोस्त है, जहां चीन ने चाइना पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर परियोजना के तहत 60 अरब डॉलर का निवेश किया है.
भारत और पाकिस्तान में ऐतिहासिक रूप से शत्रुतापूर्ण संबंध रहे हैं. दोनों देशों के बीच दो युद्ध हो चुके हैं. इसके अलावा कश्मीर को लेकर भी दोनों देशों में तनाव अक्सर बने रहते हैं.
चीन और पाकिस्तान में दोस्ती तो है, लेकिन भारत-पाकिस्तान के बीच को दोनों युद्धों (1965 और 1971) में चीन तटस्थ रहा था. चीन ने इन युद्धों में पाकिस्तान को भारत के ख़िलाफ़ सैन्य मदद नहीं की थी.
जब भारत और पाकिस्तान में तनाव होता है तो चीन के रुख़ का इंतजार सबको रहता है. पाकिस्तान को उम्मीद रहती है कि चीन की सहानुभूति उसके साथ रहेगी. हालांकि चीन का कश्मीर पर रुख़ रहा है कि दोनों देश इस मुद्दे को बातचीत के ज़रिए सुलझाएं.

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पिछले दो हफ़्तों से भारत और पाकिस्तान के बीच राजनयिक संबंध सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं. भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा ज़िले में 40 से ज़्यादा सीआरपीएफ़ के जवानों के मारे जाने के बाद भारत ने पाकिस्तान के बालाकोट में कार्रवाई की.
इसके बाद पाकिस्तान नियंत्रण रेखा के पार भारत के एक लड़ाकू विमान को मार गिराया और पायलट को गिरफ़्तार कर लिया. हालांकि पाकिस्तान ने पायलट को रिहा कर दिया लेकिन हालात अब भी तनावपूर्ण हैं.
कहा जा रहा है कि भारत ने 1971 के बाद पहली बार पाकिस्तान में इस तरह का हमला किया. जिस कश्मीर को लेकर विवाद है उससे चीन की भी सीमा लगती है. चीन के पाकिस्तान और भारत के साथ अलग-अलग संबंध हैं लेकिन उसके लिए दोनों में किसी एक देश का खुलकर पक्ष लेना आसान नहीं है.
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चीन का पाकिस्तान से बेहद क़रीबी के आर्थिक, राजनयिक और सैन्य संबंध हैं. चीन अमरीका से लंबे ट्रेड वॉर का सामना कर रहा है और वो वैकल्पिक साझेदार की तलाश में है.
ऐसे में भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था चीन के लिए कोई ख़राब विकल्प नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी अपने पांच साल के कार्यकाल में कई बार चीन जा चुके हैं.
इस हफ़्ते चीन के विदेश मंत्रालय ने भारत और पाकिस्तान से आत्मसंयम बनाए रखने और इलाक़ाई शांति और स्थिरता पर ध्यान देने के लिए कहा था.

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पाकिस्तान के विदेश मंत्री महमूद क़ुरैशी ने इस तनाव के बीच चीन के विदेश मंत्री वांग यी को फ़ोन किया था और भारत से तनाव कम करने में रचनात्मक भूमिका अदा करने का अनुरोध किया था.
इस फ़ोन में चीन के विदेश मंत्री ने कहा था, ''संप्रभुता और क्षेत्रीय एकता का पालन सभी देशों को करना चाहिए. चीन नहीं चाहता है कि कोई ऐसी कार्रवाई हो जिससे नियमों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मानकों का उल्लंघन हो.''
स्टीव सांग लंदन की एसओएएस यूनिवर्सिटी में चाइना इंस्टिट्यूट के निदेशक हैं. सांग ने सीएनएन से कहा है कि भारत और पाकिस्तान में तनाव बढ़ता है तो इससे चीन को किसी भी स्तर पर कोई फ़ायदा नहीं होगा.''
सांग का कहना है, ''चीन पाकिस्तान में तबाही को नहीं झेल सकता है लेकिन उसी तरह मुझे लगता है कि चीन ये भी नहीं चाहता है कि भारतीय इस युद्ध में उलझें.''
सांग मानते हैं कि पाकिस्तान और भारत के बीच कश्मीर पर लंबे समय से जारी तनाव चीन के लिए कभी बड़ी समस्या नहीं रही. इस तनाव में चीन और पाकिस्तान की दोस्ती पर भी कोई असर नहीं पड़ा लेकिन इस हफ़्ते दोनों देशों के बीच तनाव की जैसी स्थिति बनी वो चीन के लिए भी असहज करने वाली थी.

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सांग कहते हैं, ''चीन कुछ ऐसा करना चाहता है जिससे दिखे को वो तनाव कम करने के लिए कुछ कर रहा है लेकिन पाकिस्तान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को कमज़ोर भी नहीं होने देना चाहता है. लेकिन चीन ये भी नहीं चाहता है कि वो पाकिस्तान के पक्ष में इतना चला जाए कि भारत डोनल्ड ट्रंप पाले में पूरी तरह से चला जाए.''
भारत का कहना है कि वो कश्मीर में आतंकवाद के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर रहा है और बालाकोट में भी आतंकी ठिकानों को ही निशाना बनाया गया है.
चीन ने अपने उत्तरी-पश्चिमी प्रांत शिन्जियांग में वीगर मुसलमानों के लिए व्यापक पैमाने पर नज़रबंदी शिविर बनाए हैं. चीन की यह सबसे विवादित नीति है और दुनिया भर में इसकी आलोचना हो रही है. चीन इसे सही ठहराता है और उसका तर्क है कि यह आतंकवाद से लड़ने के लिए ज़रूरी क़दम है.
सांग मानते हैं कि ऐसे में भारत के साथ चीन सख़्ती से पेश नहीं आ सकता क्योंकि चीन भी आतंकवाद के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर रहा है. ऐसे में चीन के पास बेहकर विकल्प ये है कि दोनों देशों के बीच शांति स्थापना की बात करे.
हान हुआ पेकिंग यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशिया स्टडी की एक्सपर्ट हैं. वो कहती हैं कि पाकिस्तान में चीन का मज़बूत दख़ल है जबकि अमरीका का भारत में प्रभाव है.

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हान कहती हैं, ''चीन से दोनों देशों के लिए स्पष्ट संदेश है- शांति बनाए रखें. दक्षिण एशिया में स्थिरता ही चीन के हक़ में है और वो नहीं चाहेगा कि यह टूटे.''
पिछले कई वर्षों से चीन दक्षिण एशिया में संतुलनवादी नीति के साथ आगे बढ़ा है. वो अपने आर्थिक हितों को इस इलाक़े में तनाव के माहौल में नहीं साध सकता. जुलाई 2017 में डोकलाम में चीन और भारत के बीच महीनों तक सैन्य तनाव रहा.
डोकलाम भूटान में है और भारत का कहना था कि वो सीमाई इलाक़े में सैन्य निर्माण कर रहा है जो कि नियमों का उल्लंघन है.
दोनों देशों के सैनिक महीनों तक आमने-सामने रहे. लेकिन 2018 के अप्रैल में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच अनौपचारिक मुलाक़ात से पहले एक सकारात्मक पहल सामने आई और तनाव ख़त्म हुआ.

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चीन के सरकारी अख़बार डेली चाइना का कहना है कि दोनों देशों में मतभेद हैं पर दोनों के साझे हित ज़्यादा हैं. इसलिए मतभेद पीछे छूट जाते हैं. चीन पाकिस्तान का ऐतिहासिक रूप से दोस्त रहा है और है. पाकिस्तान चीनी हथियारों का सबसे बड़ा ख़रीददार है. थिंक टैंक सीएसआईएस के अनुसार 2008 से 2017 के बीच पाकिस्तान ने चीन से 6 अरब डॉलर का हथियार सौद किया.
एक बात ये भी कही जाती है कि पाकिस्तान चीन के क़र्ज़ में लगातार फंसता जा रहा है. हालांकि पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के लिए भी चीन ख़ास है और उन्हें लगता है कि पाकिस्तान से ग़रीबी मिटाने में चीन की मदद अहम है.
पाकिस्तान और चीन दोस्त ज़रूर हैं लेकिन भारत के ख़िलाफ़ युद्ध में दोनों देशों ने एक दूसरे का साथ नहीं दिया था. 1962 में चीन ने जब भारत पर हमला किया तो पाकिस्तान ने चीन का साथ नहीं दिया था. हालांकि ये बात भी कही जाती जाती है कि उस वक़्त पाकिस्तान पर अमरीका का काफ़ी दबाव था इसलिए पाकिस्तान तटस्थ रहा था.
चीन से युद्ध के ठीक तीन साल बाद पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया था. पाकिस्तान का आकलन ये था कि भारत ने अभी-अभी एक युद्ध किया है और उसमें बुरी तरह से उसे हार मिली है. इसलिए कमज़ोर मनोबल में युद्ध जीता जा सकता है. ज़ाहिर है चीन भी 1965 के युद्ध में भारत के ख़िलाफ़ पाकिस्तान के साथ नहीं था.
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