#Balakot क्या एयरस्ट्राइक की वजह से अनुप्रिया पटेल और राजभर के तेवर नरम हुए?

अमित शाह और अनुप्रिया पटेल

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    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए

उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के घटक दलों में पिछले काफ़ी समय से चली आ रही खींचतान फ़िलहाल थमती नज़र आ रही है लेकिन सवाल ये है कि ये नरमी घटक दलों की मांगें स्वीकार होने की वजह से है या फिर इसके पीछे कोई और कारण है.

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर कैबिनेट मंत्री होने के बावजूद आए दिन राज्य सरकार और मुख्यमंत्री को आंखें तरेरते रहते हैं लेकिन पिछले कुछ समय से बीजेपी की एक और सहयोगी पार्टी अपना दल ने भी पार्टी की राज्य इकाई से नाराज़गी खुलकर ज़ाहिर करनी शुरू कर दी थी.

ख़बरें तो यहां तक आईं कि ये पार्टी 28 फ़रवरी को होने वाली कार्यकारिणी की बैठक में गठबंधन से अलग होने का ऐलान भी कर सकती है लेकिन पार्टी नेताओं की बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के साथ बैठक के बाद कार्यकारिणी की बैठक ही स्थगित कर दी गई.

आशीष पटेल और अनुप्रिया पटेल

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नरम पड़े तेवर

अपना दल पार्टी के अध्यक्ष और एमएलसी आशीष पटेल ने गुरुवार को ये तो बताया कि बातचीत सकारात्मक रही, लेकिन लंबे समय से उनकी जो मांगें थीं, उनमें से क्या मानी गईं, इस बारे में उन्होंने कोई जानकारी नहीं दी.

हालांकि दो दिन पहले तक पार्टी नेताओं के तेवर काफ़ी तल्ख़ थे और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल ने तो पत्रकारों से बातचीत में साफ़तौर पर कह दिया था, "ऐसा लगता है कि बीजेपी सहयोगी दलों की बात नहीं सुनना चाहती. हमने 20 फ़रवरी तक का समय दिया था, उनकी ओर से कोई जवाब नहीं आया इसलिए हम लोग अब कोई भी अगला क़दम उठाने के लिए स्वतंत्र हैं."

वहीं कुछ दिन पहले ओमप्रकाश राजभर की भी अमित शाह के साथ बैठक हुई थी और उसके बाद उनके तेवरों में नरमी आ गई है.

इससे पहले, दोनों ही पार्टियों के कांग्रेस या फिर सपा-बसपा गठबंधन के साथ जाने तक की ख़बरें आने लगी थीं. हालांकि अपना दल ने कांग्रेस के साथ हुई किसी तरह की बातचीत से साफ़ इनकार कर दिया था लेकिन उनके तल्ख़ तेवर ये बताने के लिए पर्याप्त थे कि 'दरवाज़े खुले हैं'.

ओमप्रकाश राजभर

दरअसल, अपना दल और ओमप्रकाश राजभर की पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी दोनों ही लोकसभा में अपने लिए कुछ ज़्यादा सीटों की मांग कर रहे हैं.

जानकारों के मुताबिक़, अपना दल पांच सीटें तो राजभर कम से कम दो सीटें चाहते हैं. इन दलों की ये मांग बिहार में हुए जेडीयू के गठबंधन के बाद से ज़्यादा मुखर हो गई है जहां बीजेपी को अपनी जीती हुई सीटें भी सहयोगी दलों के लिए छोड़नी पड़ी हैं.

वहीं, यूपी में सपा-बसपा गठबंधन और कांग्रेस के अलग चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद से इन दोनों दलों के पास विकल्प भी खुल गए और इन दलों ने ये बात बीजेपी नेताओं तक पहुंचाने की पूरी कोशिश भी की.

नरेंद्र मोदी और अमित शाह

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बीजेपी से मिला भरोसा?

हालांकि, पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक के बाद बीजेपी के आत्मविश्वास में हुई बढ़ोतरी के आगे इन दलों के दबाव में वो ताक़त शायद ही रह पाती लेकिन माना यही जा रहा है कि अमित शाह के साथ हुई बैठक के बाद निश्चित तौर पर इन्हें कोई ठोस आश्वासन मिला होगा.

इस बीच, बीजेपी के लिए राहत की एक और बात ये हुई कि अपना दल में एक और विभाजन हो गया. लोकसभा में इस पार्टी के दो सदस्य हैं- एक अनुप्रिया पटेल और दूसरे प्रतापगढ़ सीट से जीते हरिवंश सिंह.

हरिवंश सिंह ने दो दिन पहले अपना दल के कुछ पुराने सहयोगियों के साथ एक अलग पार्टी बनाने की घोषणा कर दी. उन्होंने अपना दल के दोनों धड़ों पर परिवारवाद का आरोप लगाया और ख़ुद के एनडीए के साथ बने रहने की घोषणा की.

अनुप्रिया पटेल

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साथ रहना है मजबूरी?

जानकारों के मुताबिक़ जाति विशेष के समर्थन पर टिकीं इन दोनों पार्टियों के तमाम समर्थक और नेता सीधे तौर पर बीजेपी के साथ खड़े हैं. यहां तक कि अपना दल के एक नेता के मुताबिक़, पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व यदि एनडीए से बग़ावत करता है तो ख़ुद अपना दल में ही बग़ावत हो सकती है और कई विधायक तक पार्टी से खिसक सकते हैं.

दूसरे, पुलवामा घटना और फिर एयरस्ट्राइक के बाद बीजेपी के पक्ष में कथित तौर पर बन रहे माहौल की वजह से भी इन दोनों पार्टियों ने एनडीए में ही बने रहने में अपनी भलाई समझी है.

वरिष्ठ पत्रकार सुनीता ऐरन कहती हैं, "मौजूदा स्थिति से बीजेपी को कुछ न कुछ फ़ायदा तो दिख ही रहा है, दूसरे वह इससे चुनावी फ़ायदा लेने की पूरी कोशिश में लगी है और आगे भी लगी रहेगी. लेकिन सच्चाई ये है कि दोनों ही पार्टियों को एक-दूसरे की ज़रूरत है. यदि राजभर बीजेपी का साथ छोड़ देते हैं या फिर अपना दल छोड़ देता है तो हिन्दू मतों का बंटवारा होगा और ज़ाहिर तौर पर बीजेपी को इसका नुक़सान होगा. इसलिए चुनाव तक तो बीजेपी इन पार्टियों की बात सुनेगी ही."

ओमप्रकाश राजभर

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वहीं जानकारों का ये भी कहना है कि ओमप्रकाश राजभर और कुर्मी मतों पर प्रभाव रखने वाले अपना दल के सामने एक और दिक़्क़त है. दरअसल, इस बीच बीजेपी ने इन जातियों को सीधे अपने प्रभाव में लेने की कोशिश की है. अनिल राजभर को मंत्री बनाने से लेकर अपना दल के कृष्णा पटेल गुट के साथ गठबंधन की संभावना और अपना दल सांसद हरिवंश के अलग पार्टी बनाने के ऐलान को इसी रूप में देखा जा रहा है.

ऐसी स्थिति में इन नेताओं को ख़ुद अपनी बिरादरी के ही छिटक जाने का भय सता रहा है क्योंकि बीजेपी ने अपनी पार्टी में ही इन जातियों के छत्रप तैयार कर लिए हैं. अपना दल के अध्यक्ष आशीष पटेल पर ज़रूरत से ज़्यादा महत्वाकांक्षी होने और पार्टी में परिवारवाद हावी होने का आरोप कई नेता पहले भी लगा चुके हैं.

बहरहाल, दोनों ही पार्टियों ने फ़िलहाल एनडीए के साथ ही रहने का फ़ैसला किन वजहों से किया है, ये अभी साफ़ नहीं है. जहां तक लोकसभा में सीटों का सवाल है तो बीजेपी अपनी सीटें इन दलों के लिए छोड़ेगी, ऐसा लगता नहीं है. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये है कि क्या सीट बंटवारे के बाद भी एनडीए की ये एकता क़ायम रह पाएगी?

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