पूर्वांचल के माफ़िया डॉन: बाहुबली नेता धनंजय सिंह की कहानी

पूर्वांचल का माफ़िया
इमेज कैप्शन, बाहुबली नेता धनंजय सिंह
    • Author, प्रियंका दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पूर्वांचल से

पूर्वांचल से दो बार विधायक और एक बार सांसद चुने गए बाहुबली नेता धनंजय सिंह की कहानी एक ऐसे विरोधाभास से शुरू होती है जो उनकी पहले से ही डगमगाती 'साख' पर एक और सवालिया निशान लगाता है.

दरअसल, 2017 के चुनाव में जौनपुर से निषाद पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर जमा किए गए शपथपत्र में धनंजय ने बताया है कि उनके ख़िलाफ़ तीन गंभीर आपराधिक मुक़दमे हैं. इनमें हत्या, सबूत मिटाने और अपराध के लिए उकसाने जैसे अपराध शामिल हैं.

लेकिन एक साल बाद मई 2018 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने धनंजय को मिली 'वाई सिक्योरिटी' के ख़िलाफ़ दायर हुई एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए राज्य पुलिस से पूछा कि 24 से ज़्यादा आपराधिक मामले वाले नेता की सुरक्षा में सरकारी अमला क्यों लगाया जा रहा है?

क़ानूनी दस्तावेज़ों के साथ दाख़िल की गई इस जनहित याचिका ने उनके कुल अपराधों की संख्या 24 बताई थी, जिसमें हत्या के 7 मामले शामिल हैं.

डीबी भोंसले और सुनीत कुमार की संयुक्त न्यायिक पीठ ने मामले में तत्कालीन अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल शशि प्रकाश सिंह को तलब करते हुए पूछा था कि लंबा आपराधिक इतिहास रखने वाले धनंजय सिंह की सरकारी सुरक्षा क्यों नहीं हटाई जानी चाहिए.

पूर्वांचल का माफ़िया
इमेज कैप्शन, पूर्वांचल का माफ़िया

साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि पूर्व सांसद पुलिस सुरक्षा का दुरुपयोग कर रहे हैं और सुरक्षा मिलने के बाद भी उन पर मुक़दमों का दायर होना बंद नहीं हुआ है. 25 मई 2018 को शासन की तरफ़ से जवाब देते हुए सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने धनंजय सिंह को मिली 'वाई-सेक्योरिटी' हटा ली है.

साथ ही, सरकारी वकील ने अदालत को यह भी बताया कि धनंजय सिंह के ख़िलाफ़ सभी लंबित आपराधिक मुक़दमों में उन्हें मिली ज़मानत को तुरंत ख़ारिज करने के बारे में तुरंत एक अर्ज़ी दाख़िल करने के निर्देश जौनपुर के पुलिस अधीक्षक को भेज दिए गए हैं.

माफ़िया नेताओं के मुक़दमों की पैरवी से जुड़े जानकार बताते हैं कि अक्सर पुलिस जांच के कमज़ोर होने, साक्ष्यों के साथ छेड़-छाड़ होने और गवाहों के पलट जाने की वजह से बाहुबलियों के ऊपर दर्ज मुक़दमे निचली अदालतों में ही ख़त्म हो जाते हैं.

नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर लखनऊ में कार्यरत एक वरिष्ठ क़ानूनी जानकार बताते हैं, "आदर्श स्थितियों में प्रशासन और पुलिस को ऐसे मामलों में बाहुबलियों के ख़िलाफ़ उच्च न्यायलयों का दरवाज़ा खटखटाना चाहिए, लेकिन ज़्यादातर मामलों में ऐसा होता नहीं है. पुलिस ऊपर की अदालत में मामला नहीं ले जाती और फिर अगले चुनाव में ये बाहुबली चुपचाप उन मामलों को अपने शपथपत्रों से हटा लेते हैं."

पहले हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद धनंजय को मिली पुलिस सुरक्षा तो हटा ली गई लेकिन अभी तक लंबित मामलों में उनकी ज़मानत रद्द नहीं हुई है. इस रिपोर्ट के लिए जब बीते महीने मेरी उनसे मुलाक़ात हुई, तब तक तो ज़मानत पर रिहा धनंजय की गाड़ियों का क़ाफ़िला पूर्वांचल के अलग-अलग कोनों में 2019 के चुनावी अभियान के सिलसिले में घूम रहा था.

लेकिन धनंजय सिंह से इस मुलाक़ात पर आने से पहले एक नज़र उनके आपराधिक और राजनीतिक इतिहास पर डालना ज़रूरी है.

आपराधिक पृष्ठभूमि

पहले जौनपुर के टीडी कॉलेज और फिर लखनऊ विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में शामिल होने वाले धनंजय ने मंडल कमीशन का विरोध करने से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की.

लखनऊ विश्वविद्यालय में ही उनका परिचय बाहुबली छात्र नेता अभय सिंह से हुआ और यहीं से धनंजय भी विश्वविद्यालय की 'दबंग' राजनीति में शामिल हो गए. कुछ ही सालों में लखनऊ के हसनगंज थाने में उन पर हत्याओं और सरकारी टेंडरों में वसूली से जुड़े आधा दर्जन मुक़दमे दर्ज हो गए. 1998 तक पचास हज़ार के इनामी बन चुके धनंजय सिंह पर हत्या और डकैती समेत 12 मुक़दमे दर्ज हो चुके थे.

1998 का भदोही फेक़ एनकाउंटर

तारीख़ 17 अक्टूबर 1998 थी. पुलिस को मुखबिरों से सूचना मिली कि '50 हज़ार के इनामी वांटेड क्रिमिनल' धनंजय सिंह 3 अन्य लोगों के साथ भदोही मिर्ज़ापुर रोड पर बने एक पेट्रोल पंप पर डकैती डालने वाले हैं'. सूचना पर काम करते हुए स्थानीय पुलिस ने दोपहर 11.30 बजे पेट्रोल पंप पर छापा मारा और मुठभेड़ में मारे गए 4 लोगों में एक को धनंजय सिंह बताकर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.

लेकिन सच ये है कि धनंजय ज़िंदा और फ़रार थे लेकिन कई महीनों तक अपनी मौत की ख़बर पर चुप बैठे रहे. फ़रवरी 1999 में जब वो पुलिस के सामने पेश हुए तब भदोही फ़ेक एनकाउंटर का राज खुला. धनंजय के ज़िंदा सामने आने के तुरंत बाद मामले में मानवाधिकार आयोग की जांच बैठी और बाद में फ़ेक एनकाउंटर में शामिल 34 पुलिसकर्मियों पर मुक़दमे दर्ज हुए. इस केस की सुनवाई भदोही की स्थानीय अदलात में अब भी जारी है.

पूर्वांचल का माफ़िया
इमेज कैप्शन, पूर्वांचल का माफ़िया

टकसाल सिनेमा शूटआउट

बनारस के पहले 'ओपन शूटआउट' के तौर पर पहचाने जाने वाले इस शूटआउट में धनंजय सिंह का सामना कभी उनके मित्र रहे अभय सिंह से ही हुआ. 5 अक्टूबर 2002 को बनारस से गुज़र रहे धनंजय के क़ाफ़िले पर हमला हुआ. टकसाल सिनेमा के सामने हुई. इस मुठभेड़ में दिन-दहाड़े बनारस की सड़कों पर दोनों तरफ़ से गोलियां चलीं थीं.

हमले में धनंजय के गनर और उनके सचिव समेत 4 लोग घायल हुए थे. तब जौनपुर के रारी के विधायक के तौर पर धनंजय ने इस मामले में अभय सिंह के खिलाफ मुक़दमा भी दर्ज करवाया था.

जौनपुर की राजनीति में प्रवेश

धनंजय के राजनीति में प्रवेश के बारे में बताते हुए वरिष्ठ पत्रकार पवन सिंह कहते हैं, "उस वक़्त जौनपुर में विनोद नाटे नाम के एक दबंग बाहुबली नेता थे. विनोद का प्रभाव इसी से समझिए कि उन्हें मुन्ना बजरंगी का भी गुरु कहा जाता है. वो जौनपुर से चुनाव लड़ना चाहते थे और उन्होंने यहां की रारी विधानसभा क्षेत्र से जीतने के लिए काफ़ी मेहनत भी की थी. लेकिन एक रोड ऐक्सिडेंट में अचानक उनकी मृत्यु हो गई. फिर धनंजय ने उनकी तस्वीर को सीने से लगाकर उनकी राजनीतिक फ़सल काट ली. 2002 में वो रारी से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर जीते तो 2007 में जनता दल यूनाइटेड के टिकट पर".

इस बीच 2008 में धनंजय बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में शामिल हुए और 2009 में बसपा के टिकट पर जौनपुर से सांसद चुने गए. 2011 में मायवती ने उन्हें 'पार्टी के ख़िलाफ़ काम करने' की वजह से बसपा से निष्कासित कर दिया.

राजनीतिक पतन की शुरुआत

2012 के चुनाव में धनंजय ने अपनी पूर्व पत्नी डॉक्टर जागृति सिंह को निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर खड़ा किया लेकिन वे हार गईं. फिर 2014 में लोकसभा और 2017 में विधानसभा में भी जौनपुर से हाथ आज़माया लेकिन हर बार हार का सामना करना पड़ा.

वरिष्ठ पत्रकार उत्पल पाठक जोड़ते हैं, "2017 के चुनाव में पारिवारिक विवाद से नाराज़ मुलायम सिंह चुनाव प्रचार के लिए सिर्फ़ दो जगह गए थे. जिनमें से एक था जौनपुर का मलहनी विधानसभा क्षेत्र. यहां मंच से सपा के प्रत्याशी बाहुबली नेता पारसनाथ यादव के पक्ष में प्रचार करते हुए उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा कि 'हम पारस के लिए आए हैं, आप लोग इन्हें जिताएं. इसके बाद पूरा खेल पलट गया और जो सीट धनंजय के क़ब्ज़े में दिख रही थी वो पारस यादव को मिल गई".

जौनपुर की सत्ता

जौनपुर की सत्ता पाने के लिए बाहुबलियों में जारी लड़ाई भी इस जिले के राजनीतिक महत्व को बताती है. जुलाई 2018 में बागपत जेल में मारे गए मुन्ना बजरंगी की पत्नी सीमा सिंह ने अपने पति की हत्या की साज़िश का आरोप धनंजय सिंह पर लगाया था.

पुलिस को दी एक लिखित अर्ज़ी में उन्होंने कहा था कि धनंजय ने उनके पति की हत्या इसलिए करवा दी क्योंकि वो 2019 का लोकसभा चुनाव जौनपुर से लड़ने वाले थे. इस मामले में पुलिस की तहक़ीक़ात जारी है और धनंजय पर अभी तक कोई मुक़दमा दायर नहीं हुआ है.

घरेलू नौकर की हत्या

धनंजय सिंह ने तीन शादियाँ कीं. उनकी पहली पत्नी ने शादी के नौ महीने बाद ही संदिग्ध परिस्थियों में आत्महत्या कर ली थी. दूसरी पत्नी डॉक्टर जागृति सिंह अपनी घरेलू नौकरानी की हत्या करने के आरोप में नवंबर 2013 में गिरफ़्तार हुई थीं.

इसी मामले में सबूत मिटाने के आरोप में धनंजय सिंह भी नामज़द हुए थे. बाद में जागृति से उनका तलाक़ हो गया और 2017 में उन्होंने एक व्यवसायिक परिवार से आने वाली श्रीकला रेड्डी से पेरिस में तीसरी शादी की.

पूर्वांचल का माफ़िया

इमेज स्रोत, BBC/Priyanka Dubey

इमेज कैप्शन, बनसफा गांव में धनंजय सिंह

2019 का लोकसभा चुनाव

धनंजय जौनपुर के सिकरारा थाना क्षेत्र में मौजूद बनसफा गांव में बने एक विशाल घर में रहते हैं.

इंटरव्यू के लिए मैं धनंजय से पहले उनके घर पहुंच गई थी. तक़रीबन आधे घंटे बाद आया गाड़ियों का उनका क़ाफ़िला टुकड़ों में बंटकर घर के चारों तरफ़ फैल गया. एक एसयूवी से वह घर के बारमदे में आए, जबकि एक एसयूवी मुख्य गेट के बाहर और एक घर के साइड गेट के बाहर खड़ी थी. गाड़ियों के बाहर बंदूक़ कंधे पर लिए दो-दो आदमी खड़े थे.

घर की बैठक में हुई बातचीत में धनंजय ने 2019 के चुनाव के बारे में बात करते हुए कहा, "पूर्वांचल में 29 लोकसभा सीटें हैं और निषाद पार्टी के ज़रिए हम अगले चुनाव में न सिर्फ़ हिस्सा लेंगे बल्कि सीट कन्वर्ट करेंगे. महागठबंधन हो रहा है फिर भी यहां पूर्वंचल में ओम प्रकाश राजभर, अनुप्रिया पटेल और संजय निषाद जैसे जाति आधारित नेता बड़ा प्रभाव डालेंगे. हम जौनपुर, महाराजगंज और गोरखपुर के पास 4 सीटों पर पिच कर रहे हैं. कांग्रेस या भाजपा में से जो भी हमें इन सीटों पर लड़ने देगा, हम उसके साथ निषाद पार्टी का गठबंधन कर लेंगे."

अवसरवादी बाहुबली नेता के तौर पर पहचाने जाने वाले धनंजय आगे कहते हैं, "बसपा से मायावती जी ने हमें इसलिए निकाला क्योंकि वो अधिनायक की तरह काम करती हैं और हमारे साथ वो चल नहीं सकता. 34 साल में बसपा का कोई उम्मेदवार जीत नहीं पाया था जौनपुर से".

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)