पुलवामा हमले से चुनावों में किसका राजनीतिक नफ़ा-नुकसानः नज़रिया

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- Author, रंजीत कुमार
- पदनाम, रक्षा मामलों के पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
पुलवामा में 14 फरवरी को भारतीय अर्द्ध-सैनिक बल सीआरपीएफ़ (केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल) के काफिले पर चरमपंथी हमले के बाद पूरे भारत में पाकिस्तान विरोधी भावनाएं फिर उफान पर हैं.
पूरा देश सदमे में है और देश का राजनीतिक समुदाय एक स्वर से पाकिस्तान को सबक सिखाने के संकल्प जाहिर कर रहा है.
सत्ताधारी राजनेताओं के बयान फिर वैसे ही हैं जैसे पहले भी बड़े चरमपंथी हमलों के बाद हम देखते रहे हैं.
पाकिस्तान को सबक सिखाने और एक-एक बूंद ख़ून का हिसाब चुकाने की कसमें खाई जा रही हैं.
विपक्षी नेता भी देश की भावनाओं और राजनीतिक एकजुटता दिखाते हुए सरकार के साथ खड़े दिख रहे हैं. सर्वदलीय बैठक में सभी दलों ने आम राय से सरकार को इस बात की छूट दी कि पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए जो भी ज़रूरी कदम उठाए जाएंगे उन्हें विपक्ष का समर्थन हासिल होगा.
सबसे अहम बात यह है कि यह जघन्य हमला ऐसे वक्त हुआ है जब संसदीय चुनावों में केवल दो महीने बाकी रह गए हैं.

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उड़ी, पठानकोट के बाद पुलवामा में हमले
मौजूदा एनडीए सरकार के शासनकाल में इसके पहले दो बड़े हमले 18 सितम्बर 2016 को उड़ी और 2 जनवरी 2016 को पठानकोट में हो चुके हैं.
उड़ी सैन्य छावनी पर चरमपंथी हमले में 19 सैनिक मारे गए थे और इसके 11 दिनों बाद ही नियंत्रण रेखा के भीतर घुसकर पाकिस्तानी चरमपंथी शिविरों को तबाह कर, जिसे सर्जिकल स्ट्राइक कहा गया, नरेन्द्र मोदी की सरकार ने कड़े रुख के अनुरूप देश से यह वादा पूरा किया कि पाकिस्तान को सबक सिखाएंगे.
तब इस हमले के बाद देश के राजनीतिक समुदाय ने भारी विवाद खड़ा किया और सरकार ने इसका श्रेय लेते हुए राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश की.
उड़ी सैन्य शिविर पर हुए हमले के लिए भी जैश-ए-मोहम्मद को ज़िम्मेदार बताया गया था और इस बार पुलवामा हमले के तुरंत बाद जैश-ए-मोहम्मद ने इसकी ज़िम्मेदारी लेकर ठोस सबूत हासिल करने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी.

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जैश-ए-मोहम्मद का मुखिया मसूद अज़हर वही है जिसे 1999 में इंडियन एयरलाइंस के अपहृत विमान को अफ़ग़ानिस्तान के कंधार ले जाकर यात्रियों को छोड़ने के एवज़ में भारत सरकार कश्मीर की जेल से निकालकर छोड़ने को मजबूर हुई थी.
यही मसूद अज़हर पाकिस्तानी सैन्य संरक्षण में अब दैत्याकार रूप ले चुका है और उसने सिद्ध किया है कि उसके चरमपंथी भारत के भीतर घुसकर कामयाब कार्रवाई कर सकते हैं.
इसी मसूद अज़हर के ख़िलाफ़ पूरे देश का ख़ून खौल रहा है लेकिन कड़ी निंदा और सबक सिखाने की धमकियों के आगे भारत सरकार कुछ कर पाएगी इस पर देश विदेश के राजनीतिक हलकों की गहरी नज़र होगी.
अब चूंकि देश चुनावी राजनीति में प्रवेश करने वाला है इसलिए पुलवामा हमले के बाद मोदी सरकार अपने घोषित संकल्प के अनुरूप बदला लेने के लिए पाकिस्तान के ख़िलाफ़ किस तरह की कार्रवाई करती है यह काफी कुछ चुनावों में राजनीतिक फ़ायदा उठाने के नज़रिये से भी तय हो सकती है.

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पाक विरोधी भावनाओं का चुनावी फ़ायदा किसका?
देश के जिन 18 शहरों में पुलवामा से चालीस जवानों के शव पहुंचाए गए और पाकिस्तान विरोधी भावनाएं जिस तरह पूरे देश में देखी गईं उसका राजनीतिक फ़ायदा कहीं सत्ताधारी बीजेपी न उठाने लगे इस बात को लेकर विपक्षी दलों को भी चिंता होगी.
लेकिन सवाल यह उठता है कि मोदी सरकार क्या कदम उठा सकती है जिससे देश के मतदाताओं को लगे कि पाकिस्तान ने सबक सीख लिया.
2016 में उड़ी हमले के तुरंत बाद जिस तरह भारतीय सेना ने काफी कामयाब सर्जिकल हमला किया उसका पाकिस्तान को कोई जवाब देते नहीं बना. वह इतना शर्मिंदा हो गया कि उसने भारतीय सेना के किसी सर्जिकल स्ट्राइक से ही इनकार कर दिया लेकिन इसके बाद पाकिस्तानी सेना ने जिस तरह की हरकतें की उससे नहीं लगा कि पाकिस्तानी सेना डर गई है.
पाकिस्तान समर्थित संगठन भारत प्रशासित कश्मीर में अपने चरमपंथियों को भेजती रही और इसकी वजह से भारतीय सुरक्षा बलों ने हाल के वर्षों में सबसे अधिक नुकसान देखे हैं.
उड़ी हमले के तुरंत बाद तो मोदी सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक की वाहवाही ले ली लेकिन पुलवामा के बाद क्या कदम उठाया जाए कि सांप भी मरे और लाठी भी नहीं टूटे.
मोदी सरकार के इसी भावी कदम पर आगामी चुनावों के मद्देनज़र देश की राजनीति तय हो सकती है.
पुलवामा पर मोदी सरकार क्या क़दम उठायेगी?
मोदी सरकार पाकिस्तानी चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद को सबक सिखाने के लिये बहावलपुर में उसके मुख्यालय पर अचूक वार करती है या फिर नियंत्रण रेखा पार चरमपंथी कैंपों को तबाह करने के लिए एक बार फिर सर्जिकल स्ट्राइक का रास्ता अपनाएगी.
कोई भी सैन्य क़दम मोदी सरकार के लिए भारी जोखिम भरा होगा. इसीलिए सरकार ने इसकी ज़िम्मेदारी सैन्य नेतृत्व पर छोड़ दी है जिन्हें पता है कि ऐसे वक्त जब वे हथियारों की भारी कमी के संकट से गुजर रहे हैं पाकिस्तान से लड़ाई मोल लेने की क्या कीमत हो सकती है.
वैसे तो पाकिस्तान के मौजूदा हालात भी ऐसे नहीं हैं कि वो भारत से पंगा ले इसलिए काफी सोच समझ कर यदि सीमित हमले का कदम उठाया गया और पाकिस्तानी सेना फिर हाथ पर हाथ रख कर बैठी रही तो इसका राजनीतिक फायदा बीजेपी सरकार को आगामी संसदीय चुनावों में ज़रूर मिल सकता है.

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सैन्य विकल्पों पर विचार करने के साथ मोदी सरकार राजनयिक और आर्थिक कदमों पर अधिक जोर दे रही है और इसीलिए पाकिस्तान को सर्वाधिक पसंदीदा मुल्क (एमएफ़एन) का दर्ज़ा वापस ले कर पाकिस्तानी उत्पादों के आयात पर दो सौ प्रतिशत कस्टम शुल्क लगाकर पाकिस्तान को आर्थिक चोट पहुंचाने का माकूल कदम उठाया गया है.
इसके अलावा पाकिस्तान को सिंधु नदी जल संधि के तहत दिए गए हक के अनुरूप पाकिस्तान की ओर पानी बहने देने के फ़ैसले पर उठाया गया कोई क़दम भी कारगर साबित हो सकता है.
इन सब विकल्पों के बीच सत्ताधारी दल की कोशिश होगी कि पाकिस्तान विरोधी हवा चुनावी माहौल में और तेज़ बहे, ताकि लोगों को लगे कि पाकिस्तानी ख़तरों से केवल मोदी सरकार ही कारगर तरीके से निबट सकती है.
2016 के सर्जिकल स्ट्राइक का राजनीतिक फ़ायदा उठाने की कोशिश की गई इससे इनकार नहीं किया जा सकता है. अब आगामी चुनावों के दौरान पाकिस्तान का हौवा खड़ा किए जाने की सम्भावना प्रबल दिखने लगी है.
पुलवामा हमले के कुछ घंटे बाद ही जिस तेवर से प्रधानमंत्री मोदी ने झांसी में एक आम सभा को सम्बोधित किया उससे यह साफ़ हो जाता है.
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