ममता बनाम सीबीआई विवाद ने हरे किए शारदा निवेशकों के घाव

इमेज स्रोत, BBC/SAMJAYDAS
- Author, प्रभाकर एम.
- पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए
पश्चिम बंगाल में चिटफंड घोटालों की जांच कर रही सीबीआई और कोलकाता पुलिस के बीच उभरे विवाद ने लाखों निवेशकों के घाव हरे कर दिए हैं.
शारदा समूह की चिटफंड कंपनी ने छह साल पहले देवारती और हीरालाल जैसे लाखों ग़रीबों के सपने लील लिए थे. घोटाले के सामने आने के बाद इन लोगों ने साल भर तक इस उम्मीद में आंदोलन और प्रदर्शन किया था कि ब्याज नहीं तो शायद उनकी जमापूंजी भी वापस मिल जाए.
लेकिन चारो ओर से हताश होने के बाद इनमें से कइयों ने रोज़गार का ज़रिया बदल लिया. अब कोई छोटी-सी दुकान चला कर अपने घर-परिवार का पेट पाल रहा है तो कोई मेहनत-मज़दूरी कर या सब्जियां बेच कर. लेकिन इनके जख़्म एक बार फिर रिसने लगे हैं.
बीबीसी ने कुछ ऐसे ही लोगों से बात कर उनकी मौजूदा स्थिति जानने का प्रयास किया.
50 साल की देवारती लोगों के घरों में झाड़ू-पोंछा लगा कर अपना पेट पालती थी. उस कमाई से उनके पूरे परिवार को ढंग से दो जून की रोटी तक नसीब नहीं होती थी.
लेकिन पेट काट-काट कर उन्होंने वर्ष 2011 में मीडिया, रियल एस्टेट और चिटफंड का कारोबार करने वाली शारदा समूह की एक कंपनी में दस हजार रुपए का एक फिक्स्ड डिपॉजिट किया था.
एजेंट ने उनको लालच दिया था कि सात साल बाद 10 हजार की रक़म के एवज में उनको एक लाख रुपए मिलेंगे. लेकिन अप्रैल, 2013 में इस समूह पर ताला लगने और मालिक के फ़रार होने की ख़बरों के बाद से ही उनकी आंखों से नींद ग़ायब हो गई थी.

उनको अपने मेहनत के पैसे भी डूबते नज़र आ रहे थे. अब वह महानगर में हरी सब्जियां बेच कर किसी तरह दो जून की रोटी का जुगाड़ करती हैं.
देवारती कहती है, "सबकुछ एक बुरे सपने की तरह था. एजेंट ने सब्जबाग दिखा कर शारदा की योजनाओं में निवेश कराया था."
कंपनी बंद होने की ख़बर से देवारती की आंखों के आंग अंधेरा छा गया था. उसके गांव से लगभग हर घर के लोगों ने अपनी मामूली कमाई से पेट काट-काट कर इन योजनाओं में पैसे लगाए थे.
साल भर तक तो उन्हें उम्मीद थी कि पैसे मिल जाएंगे. लेकिन बाद में वह भी बुझ गई. वह कहती है, "ताज़ा मामले में हम जैसे तमाम लोगों के घावों को हरा कर दिया है. ग़रीबों को लूटने वालों को बद्दुआ लगेगी."
शारदा घोटाले ने ली जान
देवारती की पड़ोसी उर्मिला ने अपनी गाढ़ी कमाई के पैसे डूबने के गम में आत्महत्या ही कर ली थी. देवारती बताती है, "उर्मिला के परिवार को बीते पांच-छह साल से भारी दिक्कतों से जूझना पड़ रहा है. उसके दो बेटे कचरा बीन कर पेट पालते हैं."
कोलकाता से सटे उत्तर 24-परगना ज़िले में रहने वाले मोहन दास ने साल 2011 में एक निजी कंपनी से सेवानिवृत्त होने के बाद मिली तीन लाख की रकम शारदा कंपनी की एक ऐसी ही योजना में जमा कर दी थी. अब वे आज तक उस घड़ी को कोस रहे हैं.
मोहन बताते हैं, "शारदा समूह के स्थानीय एजेंट ने तीन साल में रकम दोगुनी और पांच साल में तिगुनी होने का वादा किया था. मैंने तिगुनी रकम पाने के लालच में वह पैसे लगाए थे. लेकिन अपनी रकम पाना तो दूर, मेरा बुढ़ापे का सहारा भी छिन गया. कंपनी दो साल में ही बंद हो गई."

मोहन ने अभी उम्मीद नहीं छोड़ी है. उनको लगता है कि सीबीआई जांच के बाद शायद सरकार निवेशकों की रकम लौटाने का कोई इंतजाम करे. हालांकि यह उम्मीद खोखली है, यह बात वे खुद भी जानते हैं. अब वे अपने मोहल्ले में चाय की छोटी-सी दुकान चला कर अपना पेट पालते हैं.
दक्षिण 24-परगना के बासंती इलाक़े की रहने वाली 79 साल की मानसी बेरा ने अपने पूरे जीवन की कमाई लगभग एक लाख रुपए एक चिटफंड योजना में जमा कर दी थी.
एजेंट ने उनको काफ़ी सब्जबाग दिखाए थे. मानसी कहती है, "सब बर्बाद हो गया. कंपनी बंद होने की खबरें सामने आने के बाद मैं महीनों ठीक से सो नहीं पाई. अब मुझे घर चलाने के लिए इस उम्र में भी रोजाना सब्जियां बेचनी पड़ती है."
मानसी पर अपने दो पोते-पोतियों की जिम्मेदारी है. उसके बेटे का असमय ही निधन हो गया और बहू ने घर छोड़ दिया.
'ज़िल्लत की वजह से आत्महत्या की आत्महत्या'
शारदा समूह ने ग्रामीण इलाकों से चिटफंड योजनाओं के लिए पैसे उगाहने की खातिर स्थानीय युवकों को मोटे कमीशन पर एजेंट बनाया था. इनको हर महीने 30 से 40 फीसदी तक कमीशन मिलता था. बर्दवान के मनोरंजन माइती भी ऐसे ही एक एजेंट थे. उस दौर में उन्होंने महीने में एक-एक लाख रुपए तक कमाए थे.

लेकिन कंपनी बंद होते ही उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. उनको स्थानीय लोगों के हाथों कई बार मार तक खानी पड़ी.
माइती बताते हैं, "उनके दो साथियों ने तो ज़िल्लत की वजह से आत्महत्या कर ली. कंपनी पर मेरे भी दो लाख से ज़्यादा की रकम बकाया है. मैंने अपनी कमाई का एक हिस्सा भी कंपनी की योजना में लगाया था. इसके अलावा कमीशन भी बाकी था."
साल भर तक पैसे वापस मिलने की राह ताकने के बाद उन्होंने फल-सब्जी बेचना शुरू किया.
इन तमाम निवेशकों में एक बात जो आम है वह यह कि यह तमाम लोग गरीब तबके के थे. कंपनी ने अपने एजंटों के जरिए उनको ऊंचे सपने दिखा कर अपनी योजनाओं में निवेश के लिए राज़ी किया था.
अब लगभग छह साल बीत चुके हैं. लेकिन इन लोगों के ज़ख्म अब तक भरे नहीं हैं बल्कि तीन फरवरी को सीबीआई बनाम कोलकाता पुलिस के विवाद ने उनके ज़ख्मों को हरा कर दिया है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















