पटना में राहुल की रैली, एक तीर से लगाए कई निशाने

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- Author, मणिकांत ठाकुर
- पदनाम, पटना से बीबीसी हिंदी के लिए
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की पटना रैली बिहार में इस दल की लगभग तीन दशक पुरानी राजनीतिक जड़ता तोड़ने में कामयाब रही.
यानी इस राज्य में कांग्रेस ने अपनी कमज़ोर पड़ चुकी सियासी ज़मीन पर एक बड़ी रैली कर फिर से उठ खड़े होने जैसी संभावना दिखाई है.
मोदी सरकार के ख़िलाफ़ राहुल गाँधी के तीखे प्रहारों के समर्थन में यहाँ रविवार को गाँधी मैदान में तालियों की गूँज ने कुछ संदेश भी छोड़े.

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कांग्रेस के बिना गठबंधन नहीं
सबसे बड़ा संदेश ये कि बिहार में कांग्रेस के साथ मोर्चाबद्ध हो कर ही आगामी चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) समेत अन्य विपक्षी पार्टियों का गठबंधन ताक़तवर और कारगर हो सकता है.
ज़ाहिर है कि उत्तर प्रदेश जैसी राजनीतिक स्थिति नहीं बन पाएगी बिहार में.
वहाँ अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी (सपा) और मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का संयुक्त जनाधार काफ़ी ताक़तवर हो जाता है.
इसलिए कांग्रेस को गठबंधन से अलग कर देना उन्हें नुक़सानदेह नहीं लगा.
लेकिन, यहाँ आरजेडी की स्थिति अलग है. सिर्फ़ उपेंद्र कुशवाहा, जीतन राम माँझी और शरद यादव की पार्टियों को जोड़ कर और कांग्रेस को छोड़ कर आरजेडी का मोर्चा सत्तापक्ष को कड़ी चुनौती पेश नहीं कर सकता.
इसलिए कांग्रेस की रैली ने आरजेडी को भी अहसास करा दिया कि वह उत्तर प्रदेश की तर्ज़ पर कांग्रेस रहित विपक्षी गठबंधन के बारे में सोचना भी छोड़ दे.

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यहाँ स्पष्ट कर दें कि जब कांग्रेस ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए बिहार में आरजेडी के बराबर या उससे कुछ ही कम सीटों की मांग उछाल दी थी और तेजस्वी यादव लखनऊ जाकर मायावती से मिल आए थे, तब कांग्रेस से आरजेडी के छिटकने तक की बातें होने लगीं थीं.
इसलिए कांग्रेस रैली में जुटी भीड़ से आरजेडी के लिए भी ये संदेश निकला कि कांग्रेस को साथ लिये बिना बिहार में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) को कड़ी चुनौती दे पाना कठिन है.
बिहार में भी फ़्रंट फ़ुट पर खेलने का जो अति उत्साह राहुल गाँधी ने दिखाया, उसके पीछे उत्तर प्रदेश वाला झटका ही काम कर रहा था.
ख़ासकर तेजस्वी यादव को कांग्रेस के प्रभाव में लेकर चुनावी सीटों के फँसे हुए बँटवारे को अपने हक़ में आसान बनाना भी उनका मक़सद रहा होगा.

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आरजेडी-कांग्रेस के बीच मतभेद
तो क्या यहाँ रैली-आयोजन के पीछे यह कांग्रेसी चिंता काम कर रही थी कि आरजेडी के हाथों बिहार में कांग्रेस का वैसा हाल न हो, जैसा उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के हाथों हुआ ?
रैली मंच पर राहुल गाँधी ने कई बार ज़ोर दे कर कहा कि तेजस्वी यादव कांग्रेस और अन्य सहयोगी दलों के साथ मज़बूत मोर्चा बना कर ही बीजेपी और नीतीश को परास्त कर सकेंगे.
उनका मतलब साफ़ था कि आरजेडी यहाँ कांग्रेस से अलग हो कर गठबंधन की बात न सोचे और सीटों के बँटवारे को सुलझाने में समझदारी से काम ले.
जबकि दूसरी तरफ़ तेजस्वी ने अपने भाषण में दबी ज़ुबान से ही सही, लेकिन कह दिया कि कांग्रेस बड़ी पार्टी है, इसलिए उसे उदारता दिखानी चाहिए. इशारा ये था कि कांग्रेस को यहाँ सीटों के मामले में आरजेडी की मुश्किल समझनी चाहिये.
लग यही रहा था कि दोनों पक्ष आशंकाओं के बीच भी संभावनाएँ तलाश रहे थे.

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बिहार में आरजेडी और कांग्रेस का एकसाथ मिल कर चुनाव लड़ना जहाँ मुस्लिम मतों के विभाजन की आशंका मिटाता है, वहीं सवर्ण समाज और पिछड़ा वर्ग के अंदर द्वंद्व को भी बढ़ाता है.
ऊँची जातियों के जो कांग्रेसी आरजेडी के सवर्ण आरक्षण विरोधी बयानों से ख़ासे नाराज़ हैं, वो कांग्रेस से गठबंधन की सूरत में भी आरजेडी को वोट देंगे, इसमें संदेह रहता है.
आरजेडी से जुड़े यादव समाज को घोर आपत्ति हुई थी, जब ऊँची जाति के आपराधिक पृष्ठभूमि वाले विधायक अनंत सिंह को पार्टी से जोड़ने की बात चली थी. जबकि विरोधाभास देखिये कि इस रैली के आयोजन में अनंत सिंह ने कांग्रेस की भरपूर मदद की.
ऐसे कई अंतर्विरोध आरजेडी और कांग्रेस के रिश्ते में उभरने के बावजूद समय का सियासी सच यही है कि फ़िलहाल बिहार में बीजेपी-जेडीयू के ख़िलाफ़ आरजेडी-कांग्रेस के मोर्चाबद्ध होने के सिवा कोई और विकल्प नहीं है.
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