क्या बीजेपी महागठबंधन का चेहरा न होने से परेशान है: नज़रिया

महासम्मेलन

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    • Author, नीरजा चौधरी
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में 20 से ज्यादा विपक्षी पार्टियों के गठबंधन की ओर से आयोजित बड़ी राजनीतिक रैली में हज़ारों लोगों ने हिस्सा लिया.

लोकसभा चुनावों से पहले केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को घेरने के लिए बुलाए गए इस 'महासम्मेलन' में छोटी-बड़ी और क्षेत्रीय पार्टियों के कई नेताओं ने संबोधित किया और मतदाताओं से आने वाले आम चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को सत्ता से बाहर करने की अपील की.

विपक्ष के इस महागठबंधन में कई दल ऐसे हैं जो आने वाले चुनावों में एक-दूसरे के ख़िलाफ़ भी मैदान में होंगे, मगर कोलकाता में उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि वे इस बात को लेकर एकजुट हैं कि आने वाले चुनावों में सत्ताधारी बीजेपी को बाहर का रास्ता दिखाना है.

मगर विपक्ष के इस महागठबंधन को लेकर यह सवाल उठता रहा है कि आख़िर यह गठबंधन किसके नेतृत्व में चुनावी मैदान में उतरेगा? इस प्रश्न को लेकर भारतीय जनता पार्टी भी विपक्षी नेताओं पर तंज करती रही है. मगर शनिवार को विपक्षी गठबंधन के कई नेताओं ने इस विषय पर बात की.

इस महासम्मेलन की मेज़बान ममता बनर्जी अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर निशाना साधते हुए नेतृत्व को लेकर कहा- हमारे गठबंधन में सभी नेता हैं.

ममता बनर्जी

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वहीं समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा, "कभी-कभी ये लोग हमें चिढ़ाने के लिए कहते हैं कि इनके पास दूल्हे बहुत हैं. हम तो कहते हैं कि हमारे पास दूल्हे ज्यादा हैं तो जो जनता तय करेगी वही बनेगा. पहले भी बना है, फिर एक बार नया प्रधानमंत्री बनेगा."

लेकिन महागठबंधन की इस रैली पर पर व्यंग्य करते हुए केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा, "किसी ने बहुत मज़ाकिया बात कही कि हमारा नेता देश की जनता चुनेगी. देश की जनता से चुने जाने के लिए आपको पहले एक नेता का नाम लेना होगा. राहुल गांधी, मायावती, ममता जी के अलावा कुछ क्षेत्रीय नेता भी हैं, जिनकी प्रधानमंत्री बनने की मंशा है."

इस बयानबाज़ी के बीच सवाल यह उठ रहा है कि क्या बीजेपी यह चाहती है कि महागठबंधन अपना एक नेता घोषित करे ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनावों में उससे सीधा मुक़ाबला करने में आसानी होगी?

इस बयानबाज़ी के बीच यह तो स्पष्ट हो गया कि भारतीय जनता पार्टी आने वाले समय में महागठबंधन पर इस बात को लेकर निशाना साधेगी कि उसका नेता कौन है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या महागठबंधन का नेता घोषित न करना उसके लिए फ़ायदेमंद होगा या बीजेपी के लिए?

नरेंद्र मोदी

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कहीं ऐसा तो नहीं कि बीजेपी को मुश्किल हो रही है कि महागठबंधन का कोई नेता न होने के कारण उसे उस तरह तुलना करने में मुश्किल होगी, जिस तरह से पिछले चुनावों में उसने नरेंद्र मोदी की तुलना सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी से की थी?

इन सवालों को लेकर बीबीसी संवाददाता आदर्श राठौर ने बात की वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी से. पढ़िए उनका नज़रिया, उन्हीं के शब्दों में...

'चेहरे से टक्कर चाहेंगे मोदी'

ऐसा कहा जा रहा है कि आजकल आम चुनाव अन्य देशों में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों जैसे होते जा रहे हैं जिसमें चेहरों के बीच टक्कर होती है.

2014 में नरेंद्र मोदी इसी तरह से एक चेहरा थे. उस वक्त यूपीए से लोगों में बहुत नाराज़गी थी. उस समय मोदी सुनामी के रूप में आए और लोगों में कमाल का क्रेज़ था. उस समय उनके सामने राहुल गांधी थे, जो तब तक उतना नहीं उभरे थे. ऐसे में यह कांग्रेस के लिए नुक़सान की बात थी.

राहुल गांधी

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ऐसे में इस बार भाजपा कि कोशिश होगी कि पिछली बार की तरह नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी का मुक़ाबला हो, जैसे प्रेज़िडेंशियल चुनावों में होता है.

साथ ही बीजेपी की कोशिश यह बताने की भी होगी कि दूसरी तरफ़ गए तो वहां खिचड़ी सरकार बनने वाली है. इसलिए उनपर भरोसा मत कीजिए, हमारी सरकार परखी हुई है.

मगर ध्यान देने वाली बात यह है कि आज 2014 जैसे हालात नहीं हैं. नरेंद्र मोदी की साख अभी भी है, लेकिन वैसी नहीं है जैसी 2014 से लेकर 2017 तक थी.

बिना चेहरे के कमाल कर पाएगा महागठबंधन?

छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश चुनाव में कांग्रेस के पास मुख्यमंत्री का कोई चेहरा नहीं था. मगर वहां लोगों ने ब्रैंड कांग्रेस को पसंद किया.

अब प्रश्न यह है कि इसी तरह से क्या लोग ब्रैंड विपक्ष को विकल्प के तौर पर देख पाएंगे? ख़ासकर वे तबके, जो बीजेपी की नीतियों से बहुत ही नाराज़ हैं या प्रभावित हैं. चाहे वो दलित हों, किसान हों या बेरोज़गार हों. या वो तबक़े जो नोटबंदी-जीएसटी की वजह से भी नाराज़ हैं. कुछ ऐसे लोग भी हैं जो बीजेपी का रुख़ करेंगे, मगर कुछ महागठबंधन की ओर भी आएंगे.

शनिवार को ममता बनर्जी हों या अखिलेश यादव, उन्होंने यह सफ़ाई देने की कोशिश की कि वो मिलकर चुनाव में जाएंगे और अगर प्रधानमंत्री की बात है तो वो बाद में देखेंगे.

अखिलेश यादव

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उन्होंने कहा कि उनके प्रधानमंत्री का उम्मीदवार कोई भी हो सकता है और इसका चुनाव जनता करेगी.

किसका दावा बड़ा?

वैसे भी इस विपक्षी महागठबंधन में नेताओं की इतनी बड़ी क़तार है और इनमें कोई भी प्रधानमंत्री का उम्मीदवार हो सकता है. ऐसे में शनिवार को कोलकाता से यह संदेश मिला कि प्रधानमंत्री कौन होगा, यह चुनाव बाद के आंकड़ों और गणित पर निर्भर करेगा.

हालांकि लोग दावा तो पेश कर ही रहे हैं. ममता बनर्जी ने आज दमखम दिखाया और नेताओं ने उनकी भीड़ इकट्ठा करने की और लोगों को साथ लाने की क्षमता की तारीफ़ भी की. वहीं इसी तरह मायावती चाहेंगी कि सबसे ज़्यादा सीटें उन्हें मिलें तो वह दावा ठोकें.

तो महागठबंधन में तीन-चार पार्टियां हैं जिनकी अच्छी सीटें आ सकती हैं. जैसे स्टालिन की आएंगी, हालांकि वो प्रधानमंत्री पद के उम्मीवार नहीं हैं. डीएमके की भी सीटें आएंगी, मायावती और अखिलेश की आएंगी.

मायावती

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कांग्रेस तो सबसे बड़ी पार्टी होगी ही इनमें. उधर ममता बनर्जी भी अच्छी सीटें ला सकती हैं.

तो इनमें से प्रधानमंत्री का उम्मीदवार कोई भी हो सकता है या हो सकता है कि कोई भी ना हो. हो सकता है आपसी सहमति से वे किसी और चुनें.

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