फ़िल्म "व्हाई चीट इंडिया" बिहार के रंजीत डॉन की कहानी तो नहीं?

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- Author, नीरज प्रियदर्शी
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
'व्हाई चीट इंडिया', इमरान हाशमी अभिनीत यह फ़िल्म सिनेमाघरों में आ चुकी है.
फ़िल्म की शुरुआत इस डायलॉग के साथ होती है...
"आज देश के हर इंसान का एक ही सपना है. इंजीनियरिंग या मेडिकल इंस्टीट्यूट का ठप्पा. ये सपने देखते हैं मां-बाप और पूरा करते हैं उनके बच्चे."
फ़िल्म की कहानी का सार कुछ यूं है...
एक छात्र इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में 287 रैंक लाता है. मगर एडमिशन लेने से पहले एक दलाल के जाल में फंस जाता है. दलाल उसे लालच देता है कि अगर वह इंजीनियरिंग कॉलेज में दाख़िला न लेकर दूसरे अभ्यर्थियों के नाम पर आगे की परीक्षाएं देता है तो ज़्यादा पैसे कमा लेगा.
छात्र लालच में आ जाता है. ख़ुद तो कुछ नहीं बनता लेकिन कइयों को इंजीनियर बना देता है, बदले में उसे पैसे मिलते हैं. दलाल उसकी तरह के दूसरे छात्रों को भी अपने झांसे में लेता है और एक सिंडिकेट खड़ा कर लेता है.
देश भर के इंजीनियरिंग, मेडिकल और मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट के लिए होने वाली प्रवेश परीक्षाओं में उसके लोग दूसरों के नाम पर परीक्षा देते हैं. यह धंधा परवान चढ़ता है.
लेकिन एक दिन 287 रैंक लाया वह छात्र प्रॉक्सी कैंडिडेट के रूप में पकड़ लिया जाता है. अखिल भारतीय स्तर पर एक सिंडिकेट का पर्दाफाश होता है. जिसका मोहरा वो दलाल है जो अदालत में अपने पेशी के दौरान कहता है, "मैंने किसी की ज़िंदगी ख़राब नहीं की और अगर मैंने कुछ अमीर बच्चों से पैसे बनाए हैं और कुछ ज़रूरतमंद ब्रिलिएंट स्टूडेंट्स की जेबें भरी हैं तो कुछ ग़लत नहीं किया है. मैं पेपरलीक नहीं करवाता. इट इज़ बैड फ़ॉर बिजनेस, बैड फ़ॉर द नेशन."
क्लाइमैक्स में फ़िल्म का नायक (इमरान हाशमी) कहता है "मुझे हीरो बनने की बिल्कुल इच्छा नहीं है और विलेन बनने का टाइम नहीं है."
फ़िल्म तो ख़त्म हो जाती है, मगर अपने साथ अतीत के पन्नों से कुछ सवाल छोड़ जाती है. मसलन, क्या इमरान हाशमी की यह फ़िल्म बिहार के रंजीत डॉन की कहानी से प्रेरित है? और अगर नहीं तो फिर फ़िल्म का नायक एकदम रंजीत डॉन के कैरेक्टर से क्यों मिलता-जुलता है?
रंजीत डॉन की असल ज़िंदगी पर आधारित है फ़िल्म?

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ये फ़र्जीवाड़ा राष्ट्रीय स्तर पर हुआ था. इसलिए मामले की जांच सीबीआई को दे दी गई थी. जांच शुरु हुई तो एक बड़े सिंडिकेट का ख़ुलासा हुआ. जिसके किंगपिन बनाए गए बिहार के नालंदा ज़िले के हिलसा प्रखंड के रहने वाले डॉ रंजीत कुमार सिंह, उर्फ सुमन कुमार उर्फ रंजीत डॉन.
हालांकि, फ़िल्म में कहीं भी यह जिक्र नहीं है कि यह रंजीत डॉन पर आधारित है लेकिन सोशल मीडिया और सिनेमा इंडस्ट्री में इस बात को लेकर चर्चा ज़रूर है. बहुत पहले साल 2012 में ही ये ख़बर आयी थी कि निर्देशक राकेश रंजन कुमार और महेश भट्ट की प्रोडक्शन टीम रंजीत डॉन पर एक फिल्म 'मार्कशीट' बना रहे हैं.
'मार्कशीट' अभी बन ही रही है. फ़िल्म से जुड़े सूत्र बताते हैं कि शूटिंग शुरू हो गई है. लेकिन इसी बीच इमरान हाशमी की प्रोडक्शन कंपनी ने व्हाई चीट इंडिया बनाकर विवाद पैदा कर दिया है. 'मार्कशीट' की टीम ने इमरान हाशमी की प्रोडक्शन कंपनी के ख़िलाफ कहानी चुराने का आरोप लगाते हुए अदालत में मुक़दमा दायर किया है, जिसकी सुनवाई में चल रही है.



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ये तो बात हो गई फ़िल्मी दुनिया की.
पर यहां गौर करने वाली बात ये है कि 'व्हाई चीट इंडिया' और 'मार्कशीट' जैसी फ़िल्मों की कहानियों के माध्यम से एक ऐसे कैरेक्टर को सामने रखा जा रहा है जिसका वजूद रंजीत डॉन उर्फ रंजीत कुमार सिंह पर लगे आरोपों और उनके ख़िलाफ चल रहे मामलों में मिलता है.
रंजीत कुमार उर्फ सुमन कुमार सिंह को 26 नवंबर 2003 को सीबीआई द्वारा कथित रूप से कैट की परीक्षा के पेपरलीक करते हुए दिल्ली में गिरफ़्तार किया गया था. अप्रैल 2003 में हुए सीबीएसई मेडिकल की परीक्षा के पेपरलीक के मामले में भी रंजीत को मुख्य अभियुक्त बनाया गया है. सीबीआई की चार्जशीट के अनुसार 10 दिसंबर 2003 को रंजीत समेत 18 अन्य लोगों के खिलाफ़ केस नंबर RC- 24A/2003 के तहत आईपीसी की धारा 409 और प्रीवेंशन ऑफ़ करप्शन एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हुआ है. जिसके लिए अधिकतम 10 साल की सजा हो सकती है.
मामले को बीते अब करीब 16 साल हो गए हैं. सीबीआई ने उसकी चार्जशीट भी दायर कर दी है. मुख्य अभियुक्त रंजीत डॉन मई 2009 में हाई कोर्ट से जमानत लेकर जेल से बाहर हैं.

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फ़िल्म के बारे में रंजीत को नहीं पता
यह पूछने पर कि उनके ऊपर फ़िल्म बन रही है, क्या उन्हें इस बात की जानकारी है? रंजीत कहते हैं, "नहीं! मुझे ऐसी किसी भी फ़िल्म के बारे में कोई जानकारी नहीं है. इसे लेकर हमसे किसी ने संपर्क भी नहीं किया है. पहली बार सुन रहा हूं."
'व्हाई चीट इंडिया' में भी उन्हीं परीक्षाओं के स्कैंडल की बात की गई है जिनकी जांच आज भी सीबीआई कर रही है. सारे मामले अदालत में विचाराधीन हैं.



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यह बताने पर कि फ़िल्म में रंजीत का जिक्र नहीं है. रंजीत को थोड़ा संतोष तो होता है. मगर कहते हैं, "मैं फ़िल्म देखूंगा. देखने के बाद अगर मुझे लगा कि मेरे कैरेक्टर को उसमें रखा गया है और मुझे गलत ढंग से पेश किया जा रहा है तो मैं फ़िल्म बनाने वालों पर केस करूंगा."
कैट वाले मामले में चार्जशीट अदालत में दायर हो चुकी है, मामले में कुल 125 गवाहों की गवाही भी हो चुकी है.
रंजीत सीबीआई की चार्जशीट दिखाते हुए कहते हैं, "इनमें से किसी ने भी मेरा नाम नहीं लिया है. चाहें तो आप चार्जशीट उठाकर देख सकते हैं. मेडिकल वाले मामले में अभी तक चार्जशीट नहीं हुई है. पता नहीं क्यों नहीं कर रहे हैं लोग!"

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अब तक विचाराधीन है मामला
आखिर डॉ रंजीत के मामले की सुनवाई इतनी लंबी क्यों चल रही है जबकि हाई कोर्ट के दो-दो चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस अल्तमस कबीर की अदालत ने छह जनवरी 2009 को ही यह आदेश दिया था कि मामले का निपटारा छह माह के अंदर कर दिया जाए.
जांच में देरी के सवाल पर रंजीत कहते हैं, "मैंने सीबीआई की हरसंभव मदद की. मैं ऐसा पहला अभियुक्त हूं जो चार-चार दफ़े अपने मामले का स्पीडी ट्रायल चलाने की मांग कर चुका हूं. सीबीआई के बारे में नहीं जानते आप कि वो किसके इशारे पर काम करता है! मेरी सुनने वाला कोई हो तब तो मैं अपना जवाब दूं."
साल 2003 के सीबीएसई मेडिकल पेपर लीक में रंजीत पर आरोप है उन्होंने बैंक के मैनेजर अजय कुमार सिंह से परीक्षा के पेपर लीक करवाए.
इस मामले में डॉ रंजीत कुमार पर दायर चार्जशीट में सबसे ख़ास कैनरा बैंक बोकारो के तत्कालीन शाखा प्रबंधक का धारा 164 के तहत दिया गया बयान है. बैंक के मैनेजर अजय कुमार सिंह ने चार पन्नों के अपने बयान में कहीं भी रंजीत का ज़िक्र तक नहीं किया है. जबकि अजय ने स्वीकार किया है कि बउआ झा और शिवनंदन झा के कहने पर उसने बैंक से पेपर लीक कराए.
यही नहीं, अरुण कुमार जिन पर मैनेजर से पर्चे लेने के आरोप हैं, वो कहते है मैंने रंजीत जी को खाना के लिए बुलाया था.



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रंजीत चार्जशीट के इन्हीं पहलुओं को लेकर अपना केस भी लड़ रहे हैं. वो कहते है,"सच कहें तो हम पीड़ित हैं और ये सब षड्यंत्र का नतीजा है. हमसे डर कर वहां के हमारे राजनीतिक विरोधियों ने हमारे खिलाफ़ साजिश रची."
रंजीत का गृह जिला नालंदा है. वहां से मगध विकास मंच नाम से एक संगठन चलाते हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में रंजीत ने बतौर एनडीए उम्मीदवार लोजपा के टिकट पर चुनाव भी लड़ा था. करीब 250 वोटों के बेहद मामूली अंतर से हार गए थे. उनके सबसे बड़े राजनीतिक विरोधी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही हैं क्योंकि उनका भी गृह ज़िला नालंदा ही है.
लेकिन अपने विरोधियों का नाम बताने के सवाल पर रंजीत ख़ामोश हो जाते है. कहते हैं "हम नाम क्यों लें. कौन नहीं जानता. सीबीआई को किसने इन 17 साल तक मेरे खिलाफ़ इस्तेमाल किया है. ये बात मेरे लोग बहुत अच्छे से जानते हैं. और रही बात खींचने की तो अख़बार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इतने पावरफुल लोग है कि उसके सामने हम कुछ नहीं हैं. मीडिया का भी मेरे ख़िलाफ़ जमकर इस्तेमाल हुआ."

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क्या बंद हुई पेपर लीक की समस्या?
ऐसा नहीं है कि रंजीत डॉन के पकड़ लिए जाने के बाद से देश में पेपरलीक होना बंद हो गया. 2003 के बाद से लेकर अब तक सैकड़ों प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपरलीक हुए. 2016-17 का एसएससी का पेपरलीक घोटाला आए दिन सुर्खियों में छाया रहता है.
बकौल रंजीत अगर वो उसके किंगपिन नहीं हैं तो फिर कौन है?
रंजीत इसका उत्तर कुछ यूं देते हैं, "देखिए, मैं तीन भाई हूं. मेरे बड़े भाई के दो बेटे और एक बेटी है. यकीन नहीं होगा मगर सच यही है कि तीनों आज की तरीख में बेरोज़गार हैं. आख़िर जिस इंसान के ऊपर ये आरोप मढ़े गए कि वो दूसरों के नाम पर परीक्षाएं देकर उन्हें पास कराता था, उसके घरवाले बेरोज़गार कैसे हो सकते हैं. क्या मैं उनके बदले परीक्षा दिलवाकर उन्हें पास नहीं करा सकता था. असल किंगपिन को खोजने का काम तो सीबीआई का था, उसने ऐसे इंसान को किंगपिन बना दिया जिसके ख़िलाफ़ सबूत तक इकट्ठा नहीं कर पा रही है."



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विधि और कानून के जानकार कहते हैं कि रंजीत डॉन के मामले में अगर अधिकतम सज़ा भी होगी तो दस साल की होगी. रंजीत ने छह साल पहले ही जेल में काट लिए हैं. पिछले करीब दस सालों से ज़मानत पर हैं.
रंजीत कहते हैं, "मैं पढ़ने-लिखने वाला और सोशल जस्टिस के लिए काम करने वाला आदमी था. आज भी वही हूं. अगर डॉ रंजीत कुमार सिंह को रंजीत डॉन नहीं बनाया जाता तो वह एक कैबिनेट मिनिस्टर होता. लेकिन हमारी स्थिति ऐसी रही कि हम किसी से कहने लायक नहीं रहे कि हमने अपने जीवन में क्या किया."
'व्हाई चीट इंडिया' की कहानी रंजीत जैसी ही कहानी है. लेकिन डॉन के जिस कैरेक्टर के इर्द-गिर्द यह फ़िल्म बनी मालूम पड़ती है, असल ज़िंदगी में वो कैरेक्टर अब केवल राजनीति करना चाहता है.

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रंजीत कुमार कहते हैं, "छह साल हम जेल में रह चुके हैं. पिछली बातों को भूलकर अब जीवन में फिर से आगे बढ़ना चाहते हैं. किसने क्या किया, किसने क्यों फंसाया, इसका हिसाब कभी ज़रूरत होने पर किया जाएगा. फिलहाल हमारा ध्यान राजनीति पर है. चुनाव की तैयारियों में लगा हूं."
रंजीत आख़िर में हमें एक चिट्ठी दिखाते हैं जिसके आधार पर उन्हें हाई कोर्ट से ज़मानत मिली है. उसके पहले छह बार उनकी ज़मानत याचिकाएं ख़ारिज हो चुकी थीं. लेकिन चीफ़ जस्टिस को चिट्ठी लिखने के तुरंत बाद ही रंजीत को ज़मानत मिल गई.
उस चिट्ठी में रंजीत ने लिखा था...
"हमारी बहन की शादी में हमको जाने नहीं दिया गया, हमारी नानी मरी तो हमको जाने नहीं दिया, दादी के निधन की सूचना पाकर मैं बहुत रोया था, फ़िर भी मुझे ज़मानत नहीं मिली. आख़िर इस देश में कौन ऐसा है जिसको बेल नहीं मिला है या पैरोल नहीं मिला है. यहां तक कि हमने जेल में पढ़ा था कि दाउद इब्राहिम के भाई जो जेल में बंद थे उनके बेटे की मृत्यु के समय उन्हें पैरोल पर बाहर जाने दिया गया था. मैंने तो वैसा कुछ किया भी नहीं है."
शायद पटना हाई कोर्ट में ये पहला केस था, जिसमें एक विचाराधीन कैदी की चिट्ठी पाकर चीफ़ जस्टिस ने ख़ुद फ़ाइलें मंगाई और ज़मानत दी.
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