केरलः विरोध प्रदर्शन में शामिल हुई सिस्टर को चर्च ने क्यों दी चेतावनी

नन

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    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरू से, बीबीसी हिंदी के लिए

दक्षिण भारतीय राज्य केरल के सबसे बड़ा चर्च एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है. मामला एक नन के चार महीने पहले एक अन्य नन के साथ हुए बलात्कार मामले में बिशप के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग से जुड़ा है.

चर्च के काम करने के नियमों के अनुसार नन को एक चेतावनी पत्र दिया गया था. इससे पहले इस मामले से जुड़े पादरी को एक नोटिस दिया गया था और उनसे कहा गया था कि उन्हें 'सेव आवर सिस्टर्स' कमिटी (एसओएस) की संयोजक पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए.

एसओएस अभियान पंजाब में जालंधर के बिशप फ़्रैंको मुलक्कल की गिरफ्तारी की मांग को लेकर शुरु किया गया था. बिशप फ्रैंकों पर एक नन ने यौन शोषण के आरोप लगाए थे.

नन सिस्टर लूसी कलप्पुरा और फादर ऑगस्टीन वेट्टोली को भेजे गए चर्च की चेतावनी और नोटिस के बारे में अब नारीवादी धर्मशात्री ये प्रश्न पूछने लगी हैं कि क्या पदक्रम के अनुसार बनाए गए मानदंड इस धार्मिक संस्था में काम कर रहे लोगों पर दवाब बना कर रखना जारी रखेंगे.

बुधवार को सिस्टर लूसी को वायनड में मौजूद फ्रांसिस्कन क्लेरिस्ट धार्मिक समूह के सुपीरियर जनरल के सामने पेश होना था लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.

दरअसल चेतावनी पत्र में उनसे कहा गया है कि "आज्ञा मानने की प्रतिज्ञा का उल्लंघन किया है जिसके लिए उन्हें माफी मांगनी चाहिए"

सिस्टर लूसी ने बीबीसी हिंदी से कहा, "मेरा मानना है मैंने कोई ग़लत काम नहीं किया, जैसा कि वो सोच रहे हैं. मैंने सिस्टर का समर्थन किया (नन जिन्होंने बिशप पर बलात्कार के आरोप लगाए) जो बिल्कुल सही था. सभी सिस्टरों को उनके समर्थन में साथ खड़ा होना चाहिए था. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. यह उनकी ग़लती है, मेरी नहीं."

लेकिन अब आगे क्या होगा? इस सवल पर सिस्टर लूसी कहती हैं, "वो जो कुछ करना चाहते हैं कर सकते हैं. मुझे इसकी चिंता नहीं है."

बिशप फ़्रैंको मुलक्कल के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग को लेकर बीते साल सितंबर में कोच्चि में आयोजित विरोध प्रदर्शनों में मिशनरी ऑफ़ जीसस की कई ननों के साथ सिस्टर लूसी भी शामिल हुई थीं. बिशप मुलक्कल पर दो साल के वक्त के दौरान (2016 तक) एक नन के साथ बलात्कार करने का आरोप था.

फ़ादर ऑगस्टीन वेट्टोली

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क्यों भेजा गया नोटिस?

इन विरोध प्रदर्शनों का आयोजन "सेव आवर सिस्टर्स" कमिटी ने किया था. इससे पहले पीड़ित नन ने बीते साल जुलाई में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी.

लेकिन पुलिस में जाने से पहले पीड़िता ने तय प्रक्रियाओं का पालन करते हुए चर्च के बड़े अधिकारियों से बिशप के ख़िलाफ़ शिकायत की थी लेकिन उनके ख़िलाफ़ कोई भी कदम नहीं उठाया गया.

चर्च की प्रक्रिया के मुताबिक़, आमतौर पर ऐसी शिकायतें चर्च के उच्च अधिकारियों की तरफ से पुलिस को भेजी जाती हैं.

लेकिन विरोध प्रदर्शन को तब बढ़ावा मिला जब पीड़ित नन की सहकर्मी मिशनरी ऑफ़ जीसस की पांच ननें, चर्च के मानदंडों का उल्लंघन करते हुए सार्वजनिक रूप से केरल के अर्नाकुलम में विरोध प्रदर्शनों में शामिल हुईं.

ये विरोध प्रदर्शन 22 सितंबर को तब ख़त्म हुआ जब केरल पुलिस की एक स्पेशल टीम ने लगभग 30 घंटे तक बिशप से पूछताछ की और फिर आधिकारित तौर पर बिशप फ़्रैंको की गिरफ़्तारी की घोषणा की.

उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजा गया था. हालांकि फिलहाल बिशप फ़्रैंको ज़मानत पर बाहर हैं.

बिशप फ़्रंको पुलिस की पूछताछ के बाद

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चर्च की कार्यवाही

विरोध प्रदर्शन समाप्त होने के कई हफ़्तों तक कुछ नहीं हुआ. लेकिन इस बीच 11 नवंबर को अर्नाकुलम-अंगामले के प्रशासनिक धार्मिक नेता बिशप जैकब मैनाथोडथ की तरफ से फ़ादर ऑगस्टीन वेट्टोली के नाम कारण बताओ नोटिस जारी किया गया.

इस नोटिस में फ़ादर ऑगस्टीन वेट्टोली को 'सेव आवर सिस्टर्स' के साथ उनके संबंध पर सफ़ाई देने के लिए कहा गया था.

इसके उत्तर में फादर ऑगस्टीन ने बताया था कि उनका अभियान चर्च के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि चर्च की छवि सुधारने के लिए था, लेकिन बिशप जैकब ने उन्हें 'सेव आवर सिस्टर्स' से फौरन हटने को कह दिया.

विरोध प्रदर्शन

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'चर्च का यौन शोषण पर रुख़ साफ़ नहीं'

फ़ादर अगस्टीन ने बीबीसी हिंदी से कहा, "मैंने तय किया है कि मैं बिशप जैकब की चिट्ठी का जवाब 18 जनवरी तक नहीं दूंगा. 18 जनवरी तक सिनेड (पादरियों की सभा) जारी रहने वाली है."

फ़ादर अगस्टीन कहते हैं, कि उन्हें और सिस्टर लूसी को भेजा गए नोटिस क्रिसमस के मौके पर दिए गए पोप फ़्रंसिस के संदेश के बिल्कुल विपरीत है.

वो कहते हैं, "पोप फ़्रांसिस ने बेहद कड़े शब्दों में कहा है कि यौन शोषण को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. ना सिर्फ़ यौन शोषण बल्कि इसे छुपाने के कृत्य को भी कैथोलिक चर्च बर्दाश्त नहीं करेगा. लेकिन केरल में चर्च ने अब तक यौन शोषण पर अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है कि योन शोषण को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. ''

वो कहते हैं कि चर्च प्रशासन को इस बात का डर सता रहा है कि आने वाले वक़्त में अगर नन सवाल पूछने लगेंगी तो उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ जाएगा क्योंकि "यहां दास प्रथा जैसी एक व्यवस्था है. उन्हें सवाल पूछने की अनुमति नहीं है. आज्ञा की आड़ में ना तो उन्हें कहीं जाने की और ना ही कोई फ़ैसले लेने की."

सिस्टर लूसी से चेतावनी पत्र में ये सवाल किया गया है कि उन्होंने मई 2015 में स्थानांतरण आदेश की अवज्ञा क्यों की. साथ ही एक कविता संग्रह छपवाने, ड्राइविंग सीखने और ड्राइविंग लाइलेंस बनवाने और कार खरीदने पर भी उनसे सवाल किए गए थे.

चेतावनी पत्र में कहा गया था कि "ये आज्ञा मानने की प्रतिज्ञा का गंभीर उल्लंघन है." पत्र सिस्टर ऐन जोसेफ़ ने जारी किया है, जो फ्रांसिस्कन क्लेरिस्ट धार्मिक समूह की सुपीरियर जनरल हैं.

चेतावनी पत्र में सिस्टर लूसी से ये सवाल भी पूछा गया है कि वे 20 सितंबर के विरोध प्रदर्शन में शामिल क्यों हुई थीं क्योंकि "ये एक तरह का गंभीर मुदा है और चर्च और फ्रांसिस्कन क्लेरिस्ट धार्मिक समूह को नुकसान पहुंचाने वाला है."

इसके साथ ही उनसे ये भी पूछा गया कि उन्होंने "ग़ैर-ईसाई अखबारों और पत्रिका" में लेख क्यों लिखे और टीवी चैनलों पर की बहस में हिस्सा क्यों लिया.

इस सभी सवालों के जवाब में सिस्टर लूसी ने कहा कि "ये मेरे मानवाधिकार हैं."

विरोध प्रदर्शन

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ये क्यों हो रहा है?

फ़ादर ऑगस्टीन कहते हैं, "ईसा मसीह की 'आज्ञा के अनुपालन' को चर्च अधिकारियों की आज्ञा की अवहेलना के तौर पर देखा जाता है. लेकिन सवाल यह है कि ननों को कैथलिक चर्च में दोयम दर्ज़े के नागरिक के तौर पर क्यों देखा जाए, जब ईसा मसीह के समक्ष पुरुष और महिला में कोई अंतर नहीं है. तो फिर पादरी और नन के बीच अंतर क्यों?"

नारीवादी धर्मशात्री कोचुरानी अब्राहम ने बीबीसी हिंदी से कहा, "भारत सहित दुनियाभर के कैथोलिक चर्च पदक्रम के अनुसार बनाए गए मानदंडों के आधार पर काम करते हैं. यही मूल मुद्दा है. इस बात के धार्मिक नियम तय हैं कि पादरी कैसे काम करेगा और नन कैसे काम करेगी. यहां महिलाओं के लिए मुश्किलें अधिक हैं क्योंकि यहां ऊंचे पदों पर पुरुषों का दबदबा है जबकि महिलाएं हैं ही नहीं."

कोचुरानी सालों पहले ख़ुद नन हुआ करती थीं, लेकिन अब वो इस पद से अलग हो चुकी हैं. वो कहती हैं, "भारत में महिलाओं के लिए धार्मिक जीवन का पालन करना कठिन है. ऐसा इसलिए है क्योंकि चर्च कड़े नियमों का पालन करता है, जो चर्च के आला अधिकारी बनाते हैं. यहां पितृसत्तात्मक रवैय्या होता है."

नन

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सिस्टर लूसी को पहले ही उनके काम के मद्देनज़र ग़लत तरीके से देखा जा रहा है. कोचुरानी कहती हैं, " उन्होंने सलवार कुर्ता पहन कर महिलाओं की दीवार बनाने के कार्यक्रम में हिस्सा लिया. तो धार्मिक समूह को लगता है कि उन्हें सज़ा दी जानी चाहिए. लेकिन पुरुषों को केरल के बाहर जाने पर साधारण कपड़े पहनने की इजाज़त है, जो महिलाओं को नहीं है."

जनवरी एक तारीख को सीपीएम के नेतृत्व वाली लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट ने सबरीमला मंदिर में 50 से कम उम्र की दो महिलाओं के प्रवेश के विरोध में भाजपा और उसके समर्थक संगठनों के अभियान के विरोध में 'महिलाओं की दीवार' बनाने का कार्यक्रम आयोजित किया था. इसी दिन सिस्टर लूसी को चेतावनी पत्र थमा दिया गया.

केरल का सबरीमला मंदिर बीते कई दिनों से रजस्वला उम्र की महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बार से सुर्खियों में हैं.

कोचुरानी कहती हैं, "अगर सुपिरियर जनरल कहती हैं कि आपको कोई काम नहीं करना है तो आप वो काम नहीं कर सकते. धर्म के पुरातन रूप का पालन यहां किया जा रहा है जबकि यूरोपीय देशों और अमरीका में चर्च अधिक खुले दिमाग़ वाले हैं. यहां उन्हें आज्ञा मानने वाला माना जाता है."

कोचुरानी मानती हैं कि ये बेहद ज़रूरी है कि चर्च पादरियों और नन के बीच संवाद स्थापित किया जाए. वो कहती हैं, "ये ज़रूरी है चर्च महिलाओं को वस्यक समझे. अब वक्त आ गया है कि चर्च अपनी सोच बदले."

इस बीच एक सवाल अभी भी बरकरार है कि क्या सिस्टर लूसी और फ़ादर ऑगस्टीन के ख़िलाफ़ चर्च की कार्रवाई से लोगों की सोच पर सकरात्मक प्रभाव पड़ेगा?

आर्चडायोसीस की पत्रिका 'लाइट ऑफ़ ट्रूथ' के संपादक फ़ादर पॉल थेलेक्कट कहते हैं, "ये कोई आदर्श तस्वीर नहीं प्रस्तुत करता लेकिन जो सामने है वह सच्चाई है और हमें ये स्वीकार करना होगा."

"जब आप न्याय और सच्चाई के लिए खड़े होते हैं तो ज़ाहिर तौर पर आप पर दवाब तो बनाया जाता है और कुछ के ख़िलाफ़ कदम भी उठाए जाते हैं, ऐसा आम तौर पर होता है. इसी तरह जीसस का जीवन बीता था और इसी तरह उनकी मौत भी हुई थी."

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