हामिद अंसारी इस पाकिस्तानी औरत की वजह से लौट पाए भारत, कौन है ये महिला?

रख्शंदा नाज़ और हामिद अंसारी

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    • Author, मीना कोटवाल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

छह साल बाद मुंबई के हामिद निहाल अंसारी की मंगलवार को पाकिस्तान से भारत वापसी हो गई है.

साल 2012 में फ़ेसबुक पर बनी एक दोस्त से मिलने के लिए हामिद पाकिस्तान गए थे. जहां पाकिस्तान के कोहाट में जासूसी और बिना दस्तावेज़ के आरोप में हामिद को गिरफ्तार कर लिया गया था.

पाकिस्तानी जेल से मिली रिहाई के बाद मंगलवार को हामिद अपने परिवार से वाघा बॉर्डर पर मिले. यहां पर पाकिस्तानी अधिकारियों ने हामिद को भारतीय अधिकारियों के हवाले किया.

हामिद का परिवार उन्हें लेने के लिए अमृतसर पहुंचा हुआ था. उनके परिवार ने दोनों मुल्कों की सरकार का शुक्रिया अदा करते हुए कहा, ''आज का दिन हमारे लिए ईद जैसा है.''

इस मौक़े पर हामिद की मां ने कहा, ''ये सामूहिक प्रयास है. हम बहुत छोटे लोग हैं और ख़ुद कुछ नहीं कर पाते. सरकार ने इस सारे मामले को सकारात्मक तरीक़े से लेते हुए पहले दिन से ही हमारी मदद की है. सरकारी अधिकारियों का व्यवहार परिवार जैसा था. हमारी आवाज़ काफ़ी कमज़ोर थी लेकिन मीडिया हमारी आवाज़ बना. इसके अलावा एनजीओ ने भी मदद की. ब्रिटेन से भी लोगों ने हमारी मदद की. अरविंद शर्मा नाम के वक़ील ने बिना फ़ीस के सुप्रीम कोर्ट तक हमारा केस रखा.''

हामिद का परिवार
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वो औरत, जिसने की हामिद की मदद

हामिद की वापसी से ठीक पहले उनकी मां फ़ौजिया के हाथों में चॉकलेट नज़र आई.

वो इस पर कहती हैं, ''मेरे बेटे को चॉकलेट बहुत पसंद है इसलिए मैं उसके लिए चॉकलेट लेकर आई हूं.''

भारत वापसी में हामिद की कई लोगों ने मदद की. इन लोगों में पाकिस्तान की मानवाधिकारों की वक़ील रख्शंदा नाज़ भी शामिल रहीं.

हामिद की रिहाई को लेकर लड़ी क़ानूनी लड़ाई का अनुभव कैसा रहा? रख्शंदा ने बीबीसी हिंदी को इस बारे में विस्तार से बताया. रख्शंदा बताती हैं कि वो हामिद के लिए जेल में जो सामान ले जाती थीं, उससे वो उनके लिए खीर बनाकर रखते थे.

रख्शंदा नाज़
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पढ़िए रख्शंदा की ज़ुबानी, इस केस की पूरी कहानी...

17 दिसंबर को जेल में हामिद के जाने की तैयारी हो रही थी. इसी बीच मैं हामिद से मिलने वहां आख़िरी बार पहुंची.

मुझे हामिद के बारे रीता मनचंदा से पता चला था जो भारत में एक समाजसेवी हैं.

हालांकि पाकिस्तानी पत्रकार और समाजसेवी ज़ीनत शहज़ादी ने इस केस के लिए कोर्ट में अपील की थी. हामिद की कस्टडी की सारी जानकारी उन्होंने ही जुटाई थी.

मैं उस वक़्त तीन साल से पाकिस्तान में नहीं थी. जब मैं आई तो ज़ीनत शहज़ादी पाकिस्तान से गुमशुदा थी. हालांकि वो दो साल बाद मिल गई और अब अपने घर वालों के साथ रह रही हैं.

तब से मैं हामिद के साथ संपर्क में हूं. हामिद को पेशावर जेल में पहली बार पेश किया गया और बताया गया कि उन्हें जासूसी के मामले में सज़ा मिली है.

हामिद निहाल अंसारी

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कई दिनों से बेटा ग़ायब था, मेरी उनके परिवार से बात हुई और उनकी मां को तब विश्वास हुआ कि उनका बेटा ज़िंदा है.

इस मामले पर विश्वास क्यों?

मैंने जब ये केस देखा तो मुझे ये मामला सच्चा लगा.

ये मामला सोशल मीडिया से जुड़ा हुआ था और मेरी बात हामिद के परिवार से भी हुई था. ये केस सीनियर एडवोकेट काज़ी मोहम्मद अनवर भी देख रहे थे और उन्होंने जिस तरह इस केस पर काम किया, उसकी वजह से ही आज कामयाबी मिली है.

मैंने इस केस के काग़ज़ हामिद की अम्मी फ़ौजिया अंसारी और रीता मनचंदा से लिए. हालांकि केस तो फ़ाइल हो ही चुका था लेकिन मैं भी इस कैसे में वैसे ही काम करना चाहती थी जैसे बाक़ी लोग कर रहे थे.

इस कामयाबी का पहले श्रेय ज़ीनत को जाना चाहिए, जिसने इंवेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग की और इस केस की सारी जानकारी जुटाई. इसके बिना हामिद के बारे में किसी को नहीं पता चलता.

हामिद जिस लड़की की तलाश में पाकिस्तान आए थे, वो लड़की ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रांत के कोहाट की रहने वाली थी.

लड़की ने पहचान बताने से मना किया था, जिससे मिलने ख़ुद ज़ीनत गई थीं. ज़ीनत उनके पिता से भी मिलीं और उन दोस्तों से भी बात की, जिन्हें हामिद और इस लड़की के बारे में पता था. हालांकि अब उस लड़की की शादी हो चुकी है.

ज़ीनत
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हामिद बनाता था रख्शंदा के लिए खीर

वैसे तो ये पूरा ही केस यादगार था. लेकिन मुझे आज भी याद है कि जब मैं हामिद से मिली तो उसे विश्वास ही नहीं था कि वो यहां से कभी छूट पाएगा.

मैंने उसे विश्वास दिलाया और कहा कि अब दिन गिनना शुरू कर दो.

मैं जब भी जाती तो हामिद के लिए कुछ खाने को या उसकी ज़रूरत का सामान ले जाती थी. चूंकि हामिद को केवल मुझे और काज़ी साहेब को हफ्ते में एक बार मंगलवार को फ़ोन करने इजाज़त थी, तो वो हमें अपनी ज़रूरत बता देते थे.

हामिद के गिफ्ट

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सिक्योरिटी के कारण हम उसके लिए बिना पका हुआ खाना ही ले जा सकते थे. मुझे आज भी याद है हामिद मेरे ले जाए हुए सामान से ही मेरे लिए खीर बनाकर रखता.

उसने ये सब कई दिन तक किया. उसने बताया था कि मैं आपका रोज़ इंतज़ार करता हूं. आपके लिए खीर बनाकर रखता और जब आप नहीं आतीं तो शाम होते ही उसे मैं ही खा लेता.

वो वाक़या याद कर मेरी आंख में आज भी आंसू आ जाते हैं.

हामिद के गिफ्ट

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जेल में उसने हाथों से कई चीज़े बनाना सीखी. उसने मुझे माचिस की तिल्लियों से बना घर दिया, अपने हाथ से सजाया हुआ पर्स दिया. इन सबसे उसका प्यार झलकता था.

कई बार जेल के अधिकारी भी कहते कि हामिद तो आपका पसंदीदा है.

कभी परिवार हामिद से क्यों नहीं मिल पाया?

हामिद के परिवार ने कई बार वीज़ा के लिए अप्लाई किया. एक बार सब हो भी गया था लेकिन उस समय हामिद की मां के पैर में फ्रैक्चर आ गया था, जिसकी सर्जरी होनी थी और पाकिस्तान आना वहीं टल गया.

हामिद की मां ने हामिद को ये बताने से मना कर दिया था कि उनकी कोई सर्जरी हुई है और दूसरी बार भी कुछ ऐसा ही हुआ.

हामिद की एक आंख का ऑपरेशन होना था उस समय हामिद ने अपने घर वालों को ये बताने से मना कर दिया.

इस मामले में मां-बेटे का प्यार देखा जा सकता था. दोनों सरहद पार थे लेकिन दोनों का दिल एक दूसरे के लिए धड़क रहा था.

हामिद अपनी मां को जेल से ख़त भी लिखता और सब बताता. उसने एक बार खत में लिखा था कि वो पहले से मोटा हो गया है उसे कपड़े छोटे हो गए हैं.

दिक्क़तें और चुनौतियां

इस केस में कई चुनौतियां आईं. लोग हवाला देते थे कि देखो कश्मीर में क्या हो रहा है और मैं एक भारतीय के लिए केस लड़ रही हूं. मैं सिर्फ़ इतना जानती हूं कि ये तो किसी के साथ भी हो सकता है. इसमें धर्म, जाति, राष्ट्रीयता मायने नहीं रखते.

मुझे परिवार ने कई बार मना भी किया कि मैं ऐसे मामले न देखूं क्योंकि ऐसे मामले में जान को ख़तरा रहता है. कुछ लोगों को लगता कि मुझे इसके लिए मोटा पैसा मिलता होगा.

पेशावर हाई कोर्ट

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इसके अलावा भी मैंने कुछ और मामले देखें. 1999 में मुझे वकालत करते हुए तीन साल ही हुए थे. तब मुझे दिल्ली के रहने वाले अशोक कुमार का केस मिला था.

लंदी कोतल कबायली क्षेत्र है, जहां से वे पकड़े गए थे. वो केस मुझे पेशावर के एक चर्च के ज़रिये मिला था. थोड़ी सी मशक्कत के बाद नवाज़ शरीफ़ की सरकार में उन्हें वाघा बॉर्डर से भारत भेज दिया गया था.

इसके अलावा 2017 को ही एक और केस आया था. दिल्ली के रमेश थे जिन्हें मेरे बारे में मीडिया से पता चला. उनकी बीवी यहां कराची में फंस गई थी. इस केस को जम्मू से मुझे रेफर किया गया और कहा गया था कि मैं इस दंपती की मदद करूं.

कितना खर्चा हुआ?

मुझे हर महीने हामिद से मिलने की इजाज़त मिली हुई थी. हालांकि कई बार इमर्जेंसी में ज़्यादा भी हो जाता था.

मैं पेशावर में ही रहती हूं और मेरे यहां से जेल महज 15 मिनट की दूरी पर है. खर्चा तो कुछ ख़ास नहीं हुआ.

घर से जेल जाने में पेट्रोल और हामिद के खाने का मामूली खर्चा हुआ.

मुझे याद है एक बार उनकी मां ने कहा कि हामिद नॉनवेज नहीं खाता. मैंने उन्हें बताया कि वो अब बर्गर भी खाता है और बिरयानी भी.

इसमें मेरे कोई लाखों रुपए नहीं लगे. इस केस के लिए काज़ी साहेब ने भी पैसा नहीं लिया उन्होंने भी अपना बच्चा समझ कर काम किया.

पाकिस्तान

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हमने अपने परिवार का हिस्सा समझ कर सब किया. बल्कि हम ईद पर उसके लिए नए कपड़े और मिठाई ले जाते थे.

हामिद की हीरोपंती

हामिद से ग़लती हुई, जिसमें उसके दोस्त भी शामिल थे. उन्होंने हामिद को फ़िल्मों के हीरो की तरह सपने दिखाए और हामिद वो करने चला गया.

हामिद से पहली मुलाक़ात में जेल से निकलने का कभी विश्वास नहीं था. इस मामले में उसे कोई अब छुड़ाने भी आ सकता है. एक तो हमारा इससे पहले कभी संपर्क भी नहीं हुआ था और ऐसे में एक औरत उसके पास जाकर उसे छुड़ाने के लिए कहती है तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ.

दूसरी मुलाक़ात में जब वो रिलेक्स हुआ तो मैंने उससे पूछा कि हामिद ये बताओ तुम क्या कोई सलमान ख़ान हो जो एक लड़की ले जाओगे.

आज (18 दिसम्बर) वो भारत चला जाएगा मैं उससे मिलने नहीं गई. लेकिन जब भी वो अपने अम्मी से मिलेगा मैं मीडिया में देखकर ही ख़ुश हो जाऊंगी.

कौन है रख्शंदा नाज़?

रख्शंदा का जन्म बलूचिस्तान के क्वेटा में हुआ, जिसके बाद वो हसन अब्दाल आ गए जहां के गुरुद्वारा पंजा साहिब से शुरुआती पढाई की. उसके बाद उन्होंने सरकारी कॉलेज से आगे की पढ़ाई की.

रख्शंदा नाज़

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पाकिस्तान की रख्शंदा 12 बहन भाई थे जिनमें वो सबसे छोटी बहन थी. उनसे छोटा उनका एक भाई है.

इंग्लैंड के कॉवंट्री यूनिवर्सिटी से इंटरनेशनल लॉ में एलएलएम किया. वहीं से मास्टर किया.

उन्हें वकालत करते हुए 25 साल हो चुके हैं और वे अब पेशावर में रह रही हैं.

रख्शंदा अभी वुमन रिज़नल नेटवर्क से जुड़ी हुई हैं, जिसमें वे देश-विदेश का काम देखती हैं. इसमें भारत, पाकिस्तान, अफग़ानिस्तान और इस साल इसमें श्रीलंका भी शामिल हुआ है.

इसके अलावा पाकिस्तान इंडिया फॉरम फॉर पीस एंड डेमोक्रेसी की भी सदस्य हैं. वे कारवां-ए-अमन बस सेवा लागू करवाने की प्रक्रिया का हिस्सा भी रही हैं.

हामिद के पिता निहाल अंसारी, मां फौजिया अंसारी और बड़े भाई डॉ खालिद अंसारी
इमेज कैप्शन, हामिद के पिता निहाल अंसारी, मां फौजिया अंसारी और बड़े भाई डॉ खालिद अंसारी

कैसे पाकिस्तान पहुंचे थे हामिद अंसारी?

हामिद मुंबई के रहने वाले हैं. हामिद ने मैनेजमेंट साइंस की पढ़ाई की है.

परिवार के मुताबिक़, लापता होने से चंद दिन पहले ही उन्होंने मुंबई के कॉलेज में लेक्चरर की नौकरी शुरू की थी.

हामिद की मां फौजिया अंसारी मुंबई में हिंदी की प्रोफ़ेसर हैं और कॉलेज की वाइस प्रिंसिपल हैं. उनके पिता निहाल अंसारी बैंकर हैं जबकि उनके बड़े भाई डेंटिस्ट हैं.

पाकिस्तान और भारत के बीच क़ैदियों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता जतिन देसाई के मुताबिक़, ''हामिद अंसारी की फ़ेसबुक पर कोहाट की एक लड़की से दोस्ती हुई थी और वो उसी से मिलने पाकिस्तान जाना चाहते थे. हामिद ने कई बार पाकिस्तान का वीज़ा हासिल करने की नाकाम कोशिश की और इसके बाद उन्होंने कोहाट के स्थानीय लोगों से फ़ेसबुक पर संपर्क किया.''

फ़ेसबुक

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चार नवंबर की वो फ्लाइट

चार नवंबर 2012 को हामिद अंसारी ने मुंबई से काबुल के लिए फ़्लाइट ली. उन्होंने अपने परिजनों को बताया था वो एक हवाई कंपनी में इंटरव्यू देने के लिए जा रहे हैं.

उन्हें 15 नवंबर को घर लौटना था लेकिन काबुल पहुंचने के कुछ दिन बाद घर वालों से उनका संपर्क टूट गया. उनका फ़ोन बंद होने के बाद घर वालों को कुछ संदेह हुआ.

कथित तौर पर इस दौरान हामिद अंसारी काबुल से जलालाबाद गए और वहां से यात्रा के दस्तावेज़ और पासपोर्ट के बिना तोरख़म के रास्ते पाकिस्तान में दाख़िल हुए. वो कुर्क में रुके और कोहाट पहुंचे.

पुलिस का कहना है कि कोहाट के होटल में कमरा लेने के लिए उन्होंने हमज़ा नाम का जाली पहचान पत्र इस्तेमाल किया और उसी दिन पुलिस ने शक़ की बुनियाद पर उन्हें हिरासत में ले लिया.

दूसरी ओर उनके परिवार का कहना है कि जब हामिद अंसारी से बात नहीं हुई तो उन्होंने उनका लैपटॉप देखा और उनके ई-मेल और फ़ेसबुक पर होने वाली बातचीत पढ़ी.

उनके परिवार के मुताबिक़, फ़ेसबुक की बातचीत से ये पता चला कि वो पाकिस्तान के ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रांत के कोहाट की किसी लड़की से बात करते थे और उसे से मिलने के लिए वहां जाना चाहते थे.

इसके बाद हामिद की मां ने दावा किया था कि उनके बेटे ने फ़ेसबुक पर कुछ पाकिस्तानी लोगों से भी बात की थी और उन्हीं के कहने पर ये रास्ता चुना था.

दूसरी ओर, पाकिस्तान के सरकारी सूचना विभाग के मुताबिक हामिद अंसारी ने पूछताछ में स्वीकार किया था कि वो ग़ैरक़ानूनी तौर पर अफ़ग़ानिस्तान से तोरख़म के रास्ते पाकिस्तान में दाख़िल हुए.

30 नवंबर को इस्लामाबाद में प्रधानमंत्री इमरान ख़ान से भारतीय पत्रकारों की बातचीत के दौरान हामिद अंसारी से जुड़ा सवाल पूछा गया था.

इस पर इमरान ख़ान का कहना था, "इंशाअल्लाह हम अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करेंगे. मैं इस मुक़दमे के बारे में जानता नहीं लेकिन मैं इस मामले को देखूंगा."

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