इमरान ख़ान के आने के बाद से पाकिस्तानी मीडिया में क्यों मची है भगदड़

मीडिया सेंसरशिप

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, उपासना भट्ट
    • पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग सेवा

इमरान ख़ान ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के रूप में अपने 100 दिन पूरे कर लिए हैं. लेकिन इन्हीं 100 दिनों में पाकिस्तान के मीडिया जगत ने तमाम चुनौतियों का सामना किया है.

सोशल मीडिया से लेकर पारंपरिक न्यूज़ आउटलेट्स पर आर्थिक तंगी से जुड़ी ख़बरें आ रही हैं. मीडिया सेक्टर में रुकी हुई तनख़्वाहों से लेकर नौकरियां ख़त्म किए जाने को लेकर चर्चा जारी है.

जुलाई में हुए आम चुनाव से पहले ही सेंसरशिप को लेकर चिंता जताई जा रही थी.

लेकिन अब कई प्रतिष्ठित पत्रकारों को नौकरी से निकाले जाने के बाद पाकिस्तान का पत्रकारिता जगत बुरी तरह से हिल गया है.

नौकरी से निकाले जाने वाले कई पत्रकार इसके लिए सरकार को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं.

इसके साथ ही मीडिया पर नियमन की प्रक्रिया में सुधार की सरकारी योजना की भी आलोचनाएं हो रही हैं. कहा जा रहा है कि इससे प्रेस की आज़ादी प्रभावित होने की आशंका है.

क्यों रुकी हुई हैं तनख़्वाहें

कई विश्लेषक मानते हैं कि आर्थिक तंगी के नाम पर सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को मीडिया संस्थानों से बाहर निकाला जा रहा है.

अक्टूबर महीने के आख़िरी दिनों में ख़बरें आई थीं कि नवा-ए-वक़्त मीडिया ग्रुप के न्यूज़ चैनल वक़्त न्यूज़ को आर्थिक संकट की वजह से बंद किया जा रहा है.

न्यूज़ चैनल के बंद होने की ख़बर को एक वरिष्ठ पत्रकार मतिउल्लाह जान ने अपने ट्विटर अकाउंट पर शेयर किया था.

पाकिस्तान

इमेज स्रोत, Getty Images

इससे कुछ दिन पहले ही उन्होंने ट्विटर पर चैनल से खुद को निकाले जाने की बात दुनिया के सामने रखी थी.

पाक अख़बार डेली पाकिस्तान ने स्थानीय सूत्रों के हवाले से ख़बर दी है कि वक़्त न्यूज़ ने 'आर्थिक संकट' का सामना करने के लिए शुरुआत में अपने कुछ कर्मचारियों को नौकरी से बाहर किया. लेकिन इसके बाद इन समस्याओं की वजह से सभी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया.

Propakistani.pk नाम की वेबसाइट बताती है, "सत्ता पक्ष की ओर से पड़ते दबाव के चलते चैनल ने दम तोड़ दिया."

मीडिया सेंसरशिप

इमेज स्रोत, Getty Images

प्रतिष्ठित अख़बार डॉन के मुताबिक़, बीती मई में सुप्रीम कोर्ट ने बोल न्यूज़ चैनल को अपने कर्मचारियों की तनख़्वाह रोकने के मामले में आड़े हाथों लिया था.

कुछ मीडिया संस्थानों के मुताबिक़, अक्टूबर महीने में बोल न्यूज़ ने अपने 200 कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया.

आर्थिक बोझ को कम करने की वजह से डॉन की संडे मैगज़ीन भी प्रभावित हुई है. इसकी वजह से मैगज़ीन को अपने कुछ पन्नों को कम करना पड़ा है.

लाइन
लाइन

प्रतिष्ठित पत्रकारों का निकाला जाना

पाकिस्तान के प्रतिष्ठित पत्रकार मातिउल्लाह जान (वक़्त न्यूज़), नुसरत जावीद (डॉन न्यूज़), तलत हुसैन (जियो टीवी) और इम्तियाज़ आलम (जियो टीवी) बीते कुछ दिनों से अपने इस्तीफ़ों या नौकरी से निकाले जाने की वजह से चर्चा में हैं.

मीडिया सेंसरशिप

इमेज स्रोत, WAQT NEWS

आलम ने बीती 20 नवंबर को ट्वीट करते हुए लिखा था, "मैं एक दिसंबर से जियो टीवी और उसके कार्यक्रम रिपोर्ट का हिस्सा नहीं रहूंगा. आर्थिक संकट ने मीडिया में पसंद नहीं आने वाले नज़रिया पेश करने वाले पत्रकारों के ख़िलाफ़ कार्रवाई को बढ़ावा दिया है. मीडिया पेशा बहुत ही ख़तरनाक और स्कैंडल से भरा हो गया है और इसकी अश्लीलता और सेसंरशिप के साथ काम करना बहुत मुश्किल हो गया है."

छोड़िए X पोस्ट
X सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट X समाप्त

मातिउल्लाह जान भी मानते हैं कि उन्हें भी जान-बूझकर निकाला गया है.

भारतीय न्यूज़ वेबसाइट न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए मातिउल्लाह ने कहा है, "मेरी बर्खास्तगी आर्थिक संकट से जुड़ी हुई है. लेकिन ये राजनीतिक अत्याचार जैसा है जिसमें सेना ने हम कुछ पत्रकारों को निशाना बनाया है और एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में हमें अनचाहा व्यक्ति क़रार दिया."

लाइन
लाइन

आलोचना से घिरी इमरान सरकार

जियो न्यूज़ समूह से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार मज़हर अब्बास कहते हैं कि पत्रकारिता जगत आपस में बंटा हुआ है जहां प्रतिद्वंदी न्यूज़ चैनलों पर लग रहे प्रतिबंधों को फ़ायदे के रूप में देखा जाता है, सेल्फ़-सेंसरशिप, कमजोर कर्मचारी संघ और संविदा पर कर्मचारियों का रखना इस वित्तीय अस्थिरता की वजह बना है.

इस आर्थिक संकट को सरकारी विज्ञापनों की कमी और मीडिया की बदलती प्रकृति के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाता है.

मीडिया सेंसरशिप

इमेज स्रोत, TWITTER/OMAR QURAISHI

ऑल पाकिस्तान न्यूज़पेपर्स सोसाइटी कहती है कि पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के सत्ता में आने के बाद संघीय और प्रांतीय सरकारों की ओर से आने वाले सरकारी विज्ञापनों की संख्या में भारी गिरावट आई है. इससे क्षेत्रीय और छोटे अख़बारों पर गंभीर प्रभाव पड़ा है.

सरकार ने नौकरियों में जारी कटौती पर कहा है कि वह मीडिया को जल्द ही देय राशि अदा करेगी.

पाकिस्तान न्यूज़पेपर एडिटर काउंसिल ने सरकार के इस फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि भुगतान न होने से 'अनगिनत' कर्मचारी 'आर्थिक अस्थिरता का प्रभाव' झेल रहे हैं.

कुछ सोशल मीडिया यूज़र्स मानते हैं कि आर्थिक कमी और निचली टीवी रेटिंग्स की वजह से न्यूज़ एंकर्स की नौकरी जा रही है. वहीं, कुछ मानते हैं कि इसके लिए सरकार को दोष देना चाहिए.

पाकिस्तान

इमेज स्रोत, Getty Images

टिप्पणीकार शमा जुनेजो पूछती हैं, "ये आर्थिक संकट एक ही तरह के पत्रकारों को निशाना क्यों बना रहा है"

उन्होंने ट्वीट किया है, "ईमानदारी से कहें तो ये इतना ख़राब समय है कि इसकी तुलना में जनरल जिया उल हक़ के दौर वाला मार्शल लॉ वाला समय बेहतर नज़र आ रहा है."

लाइन
लाइन

सेंसरशिप से जुड़ी चिंताएं जारी

इस साल की शुरुआत में उदारवादी झुकाव वाले मीडिया आउटलेट जैसे जियो टीवी और डॉन न्यूज़पेपर को राजनीतिक रूप से प्रभावशाली सेना की आलोचना से जुड़ी ख़बरें और नवाज़ शरीफ़ की पार्टी के समर्थन वाली ख़बरें चलाने का अंजाम भुगतना पड़ा.

सरकार और सेना मीडिया पर किसी तरह की सेंसरशिप थोपने के आरोप का खंडन करते हैं. लेकिन विश्लेषक मानते हैं कि वर्तमान सरकार के दौरान कुछ विशेष आवाज़ों को निशाना बनाया जा रहा है.

पाकिस्तान

इमेज स्रोत, Getty Images

जब डॉन अख़बार से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार सिरिल अलमेडा को नवाज़ शरीफ़ पर लगे राज-द्रोह के मामले में उपस्थित होने को कहा गया तो उनका साप्ताहिक लेख कुछ दिनों के लिए नहीं छापा गया.

टिप्पणीकार उम्बर खैरी ने बीती 30 सितंबर को सिरिल अलमेडा के मामले पर द न्यूज़ में लिखा, "पीटीआई सरकार ने साफ़ कर दिया है कि वह उन पत्रकारों के बारे में क्या राय रखती है जो उनकी पार्टी और उनके नेता की आलोचना करने की हिम्मत करता है."

लाइन
लाइन

इमरान सरकार में मीडिया सेंसरशिप

बीते दो अक्टूबर को डॉन अख़बार की संपादकीय में लिखा गया, "कई मीडिया संस्थानों पर सरकारी संस्थाओं की हां में हां मिलाने का भारी दबाव है और इस दबाव की वजह से अब सेल्फ़-सेंसरशिप एक सामान्य बात हो गई है."

बीते सितंबर में जब इमरान ख़ान ने प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार पेशावर यात्रा की तो कई स्थानीय पत्रकारों को इस यात्रा से जुड़ी ख़बरें करने की इजाज़त नहीं दी गई.

इमरान ख़ान

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, इमरान ख़ान

सरकारी न्यूज़ एजेंसी एपीपी के पूर्व प्रबंध निदेशक मोहम्मद रियाज़ वर्तमान स्थिति को समझाते हुए कहते हैं, "पाकिस्तान में मीडिया को नियंत्रित करने की दिशा में ये पहला क़दम है".

सरकारी एजेंसियां पाकिस्तान मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी बनाकर मीडिया के नियमन को बदलना चाहती है ताकि इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और सोशल मीडिया पर नज़र रखी जा सके.

मीडिया संस्थानों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाएं मानती हैं कि इससे अलग-अलग स्तरों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ता है.

(बीबीसी मॉनिटरिंग दुनिया भर के टीवी, रेडियो, वेब और प्रिंट माध्यमों में प्रकाशित होने वाली ख़बरों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण करता है. आप बीबीसी मॉनिटरिंग की खबरें ट्विटरऔर फ़ेसबुकपर भी पढ़ सकते हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)