मुंबई के ईएसआईसी अस्पताल में आग लगने से 6 लोगों की मौत

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मुंबई के मरोल (अंधेरी पूर्व) इलाक़े में सोमवार को एक पांच मंज़िला अस्पताल में आग लगने से छह लोगों की मौत हो गई. इस दुर्घटना में घायल होने वालों की संख्या 130 से ऊपर पहुंच गई है.
ईएसआईसी कामगार अस्पताल में यह आग शाम को लगभग चार बजे लगी. फ़ायर ब्रिगेड के पहुंचने तक आग काफ़ी बढ़ चुकी थी. आग की घटना के बाद कुछ लोगों ने अस्पताल से छलांग लगा दी जिसके कारण भी लोग घायल हुए हैं.
दमकल विभाग ने शुरुआती आंकलन लगाते हुए कहा है कि आग सबसे पहले अस्पताल में निचले तल पर लगी.
एमआईडीसी दमकल विभाग के प्रमुख वी.एम. ओगले ने बीबीसी मराठी से कहा, "इमारत को जो नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफ़िकेट (एनओसी) दिया गया था वह अस्थायी था. कई समस्याएं थीं जिसके कारण अंतिम एनओसी नहीं दी गई थी. यह अस्पताल केंद्र सरकार के अंतर्गत आता है, ऐसा मुझे लगता है इसलिए इस कारण इस आग की ज़िम्मेदारी भी उनकी बनती है."
लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब मुंबई में इतनी भयंकर आग लगी हो. इस साल 12 से अधिक आग लगने की भयंकर घटनाएं हो चुकी हैं.
मुंबई में भीड़-भाड़ वाली जगहों पर ऊंची-ऊंची इमारतें होने के कारण क्या आग की घटनाओं को रोकना मुश्किल है? और आग लगने की इतनी घटनाओं के क्या कारण हैं?

'सबकुछ काग़ज़ों पर है'
इस क्षेत्र में काम करने वाले विक्रम माहुरकर से हमने बात की. वह आपदा प्रबंधन कंपनी चेकमेट ग्रुप के प्रमुख हैं और आग से बचने की ट्रेनिंग देते हैं.
माहुरकर कहते हैं, "आग के संदर्भ में कई क़ानून हैं लेकिन यह लागू नहीं होते देखे जाते. इमारतों, अस्पतालों को लेकर अलग क़ानून हैं."
"मुंबई में सड़कें तंग हैं इसके कारण दमकलकर्मियों को घटनास्थल तक पहुंचने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. दमकलकर्मियों को अच्छे साज़ो-सामान नहीं मिलते हैं."
"मुंबई में इमारतों की लंबाई तो बढ़ गई लेकिन उस पर फ़ायर ब्रिगेड की गाड़ियों का पहुंचना मुश्किल है. दमकलकर्मियों के विभिन्न विभागों पर ध्यान देने की ज़रूरत है. इन सबमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण प्रशिक्षण है. सिर्फ़ किताबी प्रशिक्षण नहीं देने चाहिए बल्कि असल में आग लगने पर क्या करना चाहिए इसकी ट्रेनिंग ज़रूरी है. इसे हमारी भाषा में 'रियल फ़्यूल रियल फ़ायर' यानी के लाइव फ़ायर ट्रेनिंग ऐसा कहा जाता है."

अफ़सरों की मिलीभगत?
आरटीआई एक्टिविस्ट अनिल गलगली कहते हैं, "फ़ायर ऑडिट के बारे में कोई कुछ नहीं कहता है. मैंने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी भी मांगी थी लेकिन मुझे जानकारी नहीं दी गई थी. यह जानकारी हर तीन महीने के बाद अपडेट करके ऑनलाइन उपलब्ध कराना ऐसी भी मांग मैंने बार-बार की है क्योंकि इसको लेकर हीला-हवाली होती है. दमकल विभाग कॉर्पोरेशन के लोकल अफ़सर की इनमें मिलीभगत है. इस वजह से आग से सुरक्षा करने वाले सिस्टम लगाए नहीं जाते हैं. यह मानव निर्मित दुर्घटना है."
इस पर हमने मुंबई के महापौर विश्वानाथ महाडेश्वर की प्रतिक्रिया लेनी चाहिए. उन्होंने कॉर्पोरेशन के अफ़सरों से जुड़े सवाल को टाल दिया और केंद्र सरकार पर इसका ठीकरा फोड़ा.
उन्होंने कहा, "फ़ायर ऑडिट होना ही चाहिए क्योंकि मुंबई के हर एक व्यक्ति की जान महत्वपूर्ण है. आज जिस ईएसआईसी अस्पताल में यह दुर्घटना हुई वह एमआईडीसी (महाराष्ट्र इंडस्ट्रियल डिवेलपमेंट कॉर्पोरेशन) के क्षेत्र में आता है. इस वजह से राज्य और केंद्र के अंतर्गत यह अस्पताल है."
"यहां पर 2009 से फ़ायर ऑडिट नहीं हुआ था जो होना ज़रूरी था जिसकी जांच की जाएगी. आग क्यों लगी इसकी भी जांच जारी है. इस विभाग के कॉर्पोरेशन के अंतर्गत नहीं होते हुए भी हमने वहां पर 12 गाड़ियां भेजीं. हमारे दमकल विभाग के जवान वहां पहुंचे और उन्होंने आग पर काबू पाया."
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