कमलनाथ के बहाने भोपाल में लगे संजय गांधी के पोस्टर

संजय गांधी

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    • Author, कुलदीप मिश्र
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पोस्टर-बैनरों पर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पुत्र और राहुल गांधी के चाचा संजय गांधी की तस्वीरें आम नहीं हैं.

ख़ास तौर से संजय की पत्नी मेनका और पुत्र वरुण गांधी के पारिवारिक खटपट के बाद भाजपा में चले जाने के बाद से संजय गांधी का चेहरा पार्टी के आधिकारिक बैनरों से लापता हो गया है.

मध्य प्रदेश में सोमवार को कमलनाथ ने कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेकर किसानों की कर्ज़माफ़ी का वादा पूरा करने का ऐलान कर दिया है. लेकिन भोपाल की सड़कों पर चर्चा एक बैनर की भी हो रही है, जिसमें नए मुख्यमंत्री कमलनाथ का अभिनंदन करते हुए साथ में संजय गांधी की तस्वीर लगाई गई है. यह तस्वीर सोमवार को अंग्रेज़ी अख़बार 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने छापी है.

संजय गांधी की यह तस्वीर अकारण नहीं है, क्योंकि कमलनाथ की कहानी संजय गांधी से उनकी क़रीबी के क़िस्से के बग़ैर अधूरी है.

कमलनाथ

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गांधी परिवार से क़रीबी

  • कई पत्रकार पुष्टि करते हैं कि इंदिरा गांधी के दौर में कुछ समय के लिए यह नारा भी लगा करता था कि 'इंदिरा गांधी के दो हाथ, संजय गांधी और कमल नाथ.'
  • कमलनाथ को 1980 में छिंदवाड़ा से गार्गी शंकर मिश्रा की जगह टिकट दिया गया था. जबकि गार्गी उन नेताओं में थे जो कांग्रेस के लिए बेहद मुश्किल 1977 के चुनाव में भी जीतकर आए थे. 1977 में जनता पार्टी की ऐसी लहर थी कि इंदिरा गांधी भी चुनाव हार गई थीं.
  • वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं कि कमलनाथ के पहले चुनाव के लिए इंदिरा गांधी प्रचार करने छिंदवाड़ा गई थीं और उन्होंने एक सभा में कहा था कि लोग उनके तीसरे बेटे कमलनाथ को चुनाव जिताएं.
  • 1980 के दशक में कांग्रेस की ओर से कई युवा सांसद जीतकर आए थे, जिनमें कमलनाथ भी थे. विपक्ष ने उन्हें सामूहिक तौर पर उन्हें 'संजय के छोकरे' में एक माना था.
संजय गांधी- कमलनाथ

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संजय गांधी और कमलनाथ: दून स्कूल का साथ

कांग्रेस पर नज़र रखने वाले पत्रकार पंकज वोहरा बताते हैं कि कमलनाथ, संजय गांधी और अकबर अहमद डंपी तीनों दून स्कूल में साथ में पढ़ते थे और उनकी गहरी मित्रता थी. इंदिरा गांधी के समय कमलनाथ कांग्रेस में शामिल हुए.

वोहरा के मुताबिक, "1977 में जब संजय गांधी पहली बार अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे तो अकबर अहमद डंपी और कमलनाथ दोनों उनके साथ ही रहते थे. कमलनाथ चुनाव प्रबंधन में मदद करते थे. वह लखनऊ के एक होटल में ठहरे हुए थे और वहां से हर रोज़ अमेठी आते-जाते थे. वह चुनाव प्रचार के समय संजय गांधी के साथ ही रहते थे."

संजय से मित्रता से पहले कमलनाथ की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी. लेकिन वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई बताते हैं कि कमलनाथ राजनीतिक तिकड़मों में माहिर थे और मुश्किल काम करवाना जानते थे. इसीलिए कांग्रेस में उन्हें औपचारिक पद भले ही जल्दी न मिला हो लेकिन वह संजय गांधी की मंडली में शामिल हो गए थे.

कमलनाथ

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कमलनाथ में ख़ास क्या था

संजय के व्यवहार-कौशल का उदाहरण देते हुए किदवई एक क़िस्सा सुनाते हैं.

किदवई बताते हैं, "जब 1978 में जनता पार्टी का शासन चल रहा था तब कमलनाथ को ख़बर मिली कि चौधरी चरण सिंह, प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से ख़ुश नहीं हैं. उन्होंने राजनारायण से संपर्क साधा और उनसे कहा कि अगर चरण सिंह जनता पार्टी से अलग हो जाते हैं तो कांग्रेस समर्थन देकर उन्हें प्रधानमंत्री बना देगी. बाद में यही हुआ. हालांकि वह सरकार लंबे समय तक नहीं चल पाई."

"कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया और दोबारा इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं. उस दौर में राजनीतिक तिकड़मों में कमलनाथ का अहम योगदान था. इंदिरा गांधी राजनारायण से मिलकर ये काम नहीं कर सकती थीं. कमलनाथ ने अपने सूत्रों के आधार पर ये काम किया था."

वह बताते हैं कि 1977 के बाद जो नई कांग्रेस बनी थी, जिसे कांग्रेस आई कहा गया, उसे बनाने में भी कमलनाथ का अहम योगदान था.

वहीं पंकज वोहरा मानते हैं कि कमलनाथ की असल ताक़त ये है कि वे सुनियोजित तरीक़े से काम करने वाले नेता हैं. उनके मुताबिक, "जितने योजनाबद्ध तरीक़े से कमलनाथ काम करते हैं, जिस तरह वह बारीक़ ब्यौरों में जाते है, वह आज कल दुर्लभ है. उनकी ये बात इंदिरा और संजय को पसंद आई."

कमलनाथ

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संजय के लिए जेल पहुंचे थे कमलनाथ

रशीद किदवई के मुताबिक, कमलनाथ ने संजय और इंदिरा का भरोसा इसलिए भी जीता क्योंकि उनमें फ़ैसले लेने की क्षमता थी और वह एक समांतर सिस्टम बनाने में सक्षम थे.

किदवई के मुताबिक, "2018 के चुनावों में उन्होंने सरकारी कर्मचारियों और सरकारी सिस्टम से जुड़े दूसरे वर्गों को जिस तरह गुपचुप तरीक़े से कांग्रेस से जोड़ा, यह कौशल उनमें शुरू से रहा है. लोगों से संबंध साधकर उनसे काम लेना उन्हें बहुत अच्छे से आता है."

पत्रकार विनोद मेहता ने अपनी किताब 'संजय गांधी - अनटोल्ड स्टोरी' में लिखा है कि यूथ कांग्रेस के दिनों में संजय गांधी ने पश्चिम बंगाल में कमलनाथ को सिद्धार्थ शंकर रे और प्रिय रंजन दासमुंशी को टक्कर देने के लिए उतारा था. इतना ही नहीं इमरजेंसी के बाद जब संजय गांधी गिरफ्तार किए गए तो उनको कोई मुश्किल न हो, इसका ख़्य़ाल रखने के लिए जज के साथ बदतमीज़ी करके कमलनाथ भी तिहाड़ जेल पहुंच गए थे.

कमलनाथ

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संजय के बाद भी

लेकिन संजय गांधी के बाद भी कमलनाथ कांग्रेस आलाकमान के प्रिय रहे.

रशीद किदवई कहते हैं, "जब राजीव गांधी ने कमान संभाली तो उन्हें राजनीति का उतना अनुभव नहीं था और वह कान के कुछ कच्चे थे. लिहाज़ा संजय गांधी के समय महत्वपूर्ण रहे बहुत से लोग हाशिए पर आ गए. राजीव गांधी की अपनी एक टीम बनी, जिसमें संजय के करीबियों की संख्या बहुत कम थी. ज़ाहिर है, दोनों भाइयों के काम करने का तरीका अलग था. लेकिन कमलनाथ निज़ाम में इस बदलाव से बेअसर रहे और उनकी ख़ूबियां राजीव गांधी को भी पसंद आईं."

वह कहते हैं, "ये बड़ी दिलचस्प बात है कि बहुत कम ऐसे कांग्रेसी नेता हैं जो संजय गांधी के समय जिनका पार्टी में दबदबा था और आज भी वे महत्वपूर्ण स्थिति में हैं. उनमें कमलनाथ जैसा कोई बड़ा उदाहरण नहीं दिखता है. अशोक गहलोत भी उसी सूची में आते हैं लेकिन संजय गांधी के समय गहलोत की स्थिति उतनी मज़बूत नहीं थी. ये कमलनाथ की उपलब्धि है कि संजय के बाद, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी के कार्यकाल में वह अपनी अहमियत बनाए हुए हैं. "

संजय गांधी

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तस्वीर का मक़सद?

रशीद किदवई कहते हैं कि संजय गांधी भले ही कांग्रेस के बैनरों में न दिखते हों लेकिन कांग्रेस के बहुत लोग उन्हें पसंद करते हैं मगर खुलकर इसका इज़हार नहीं कर पाते.

हालांकि किदवई कहते हैं कि कमलनाथ कभी संजय के साथ अपनी करीबी को लेकर रक्षात्मक नहीं रहे. वह कहते हैं, "कमलनाथ ने भी कभी संजय गांधी से अपनी वफ़ादारी और रिश्तों को छिपाया नहीं. दिल्ली के तुग़लक रोड में कमलनाथ का सरकारी आवास है. जिस कमरे में वह लोगों से मिलते हैं, उनकी कुर्सी के ठीक पीछे संजय गांधी की एक बड़ी तस्वीर है जो सबको दिखती है. मुझे लगता है कि यह बात सोनिया और राहुल को न सिर्फ़ पता है, बल्कि उनके इस नैतिक साहस को शायद वे पसंद भी करते हैं."

भोपाल के एमपी नगर चौराहे पर लगा यह बैनर किसने लगया है, यह साफ़ नहीं है. भोपाल के पत्रकार शुरैह नियाज़ी के मुताबिक, इस बैनर पर भी किसी कांग्रेसी कार्यकर्ता का नाम नहीं है.

हालांकि फिर भी मध्य प्रदेश कांग्रेस ने इस बैनर का बचाव किया है. प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता भूपेंद्र गुप्ता का कहना है कि यह तस्वीर किसने लगाई, यह उनकी जानकारी में नहीं है. उन्होंने कहा, "संजय गांधी जी उनके (कमलनाथ के) निजी मित्र थे. जब वह मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो अपने दफ़्तर में भी उन्होंने संजय गांधी की तस्वीर लगवाई. उनके घर में भी संजय जी की तस्वीर लगी है. यह उनका अधिकार है. इसमें क्या दिक्कत है? यह तस्वीर उस परिवार से उनके रिश्ते को दिखाती है. वह संजय जी को उस परिवार से अलग करके नहीं देखते हैं."

यह याद दिलाने पर कि संजय गांधी की पत्नी और पुत्र अब भाजपा में हैं, भूपेंद्र गुप्ता कहते हैं, "विचार और पारिवारिकता दोनों अलग-अलग विषय हैं. एक घर में रहकर भी लोग अलग-अलग तरीके से सोच सकते हैं."

पत्रकार पंकज वोहरा भी मानते हैं कि किसी कांग्रेस समर्थक की ओर से संजय गांधी की तस्वीर वाला बैनर लगाए जाने में कुछ भी असामान्य नहीं है.

उनके मुताबिक, "संजय गांधी कमलनाथ के क्लासमेट थे. दोनों का नाम एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है. तो संजय गांधी के समय जो लोग कांग्रेस में थे उन्हें दोबारा आकर्षित करने के लिए शायद कमलनाथ समर्थकों ने ये तस्वीर लगाई होगी. इस मक़सद से कि उन पुराने कांग्रेसियों की घर वापसी हो."

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