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छत्तीसगढ़ में कमज़ोर कांग्रेस को जीत की राह दिखानेवाले भूपेश बघेल
- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए
भूपेश बघेल की काले रंग की एसयूवी का माइलो मीटर इस समय बताता है कि यह गाड़ी अब तक 1,97,000 किलोमीटर चल चुकी है.
उनके ड्राइवर बताते हैं कि यह गाड़ी उनके पास मार्च 2015 से है. अध्यक्ष बनने के बाद जिन दो गाड़ियों का उपयोग उन्होंने किया उनको भी जोड़ दिया जाए तो वे अब तक 2,75,000 किलोमीटर से अधिक की यात्रा कर चुके हैं.
यह बताता है कि पिछले पांच वर्षों से प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष का पद संभाल रहे भूपेश बघेल ने किस तरह से इस छोटे से प्रदेश में बड़ी यात्राएं की हैं और ये यात्राएं सिर्फ़ वाहनों से नहीं हुई हैं.
उन्होंने पिछले पांच वर्षों में प्रदेश के विभिन्न मुद्दों पर लगभग एक हज़ार किलोमीटर की पदयात्राएं भी की हैं. जिसमें किसानों से लेकर आदिवासियों के लिए वनाधिकार का मुद्दा है तो जल जंगल ज़मीन से लेकर नोटबंदी से उपजी जनवेदना भी है.
मुश्किल वक़्त में संभाली ज़िम्मेदारी
भूपेश बघेल ने पार्टी के अध्यक्ष का पद उस समय संभाला था जब प्रदेश में कांग्रेस नेतृत्व के अग्रिम पंक्ति के शीर्ष नेता झीरम घाटी में एक कथित नक्सली हमले में मार दिए गए थे और कांग्रेस प्रदेश में 0.73 प्रतिशत के छोटे से अंतर से चुनाव हार गई थी.
दिसंबर, 2013 में जब कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें यह ज़िम्मेदारी सौंपी तो प्रदेश में कांग्रेस गहरी हताशा और निराशा में थी और लोकसभा के चुनाव सिर पर थे.
हालांकि लोकसभा चुनाव में वे कोई करिश्मा नहीं दिखा सके और चुनाव मोदी लहर में बह गया, लेकिन इसके बाद भूपेश बघेल ने प्रदेश में कांग्रेस की गाड़ी को एक नई पटरी पर लाने का काम शुरू किया.
चाहे वह राशन कार्ड में कटौती का मुद्दा हो या किसानों की धान खरीदी और बोनस का मुद्दा हो, वह नसबंदी कांड का विरोध हो या फिर चिटफंड कंपनियों के पीड़ितों के साथ खड़े होने का मामला हो, उन्होंने कांग्रेस को आंदोलनों के लिए सड़क पर उतार दिया.
कांग्रेस के एक महासचिव अटल श्रीवास्तव कहते हैं, "कांग्रेस कार्यकर्ता आंदोलन करना भूल चुके थे. भूपेश बघेल ने पूरे प्रदेश को आंदोलन करना सिखा दिया."
उनकी यह बात सही दिखती है क्योंकि पिछले पांच वर्षों में कांग्रेस के कार्यकर्ता जितने मुखर हुए और जिस तरह से सरकार की ग़लत नीतियों का विरोध करते हुए दिखे वैसा कम से कम रमन सिंह के पिछले दो कार्यकालों में तो हरगिज़ नहीं हुआ था.
आक्रामक शैली और बेबाक बयान
भूपेश बघेल की छवि प्रदेश में एक तेज़तर्रार और तीखे तेवरों वाले नेता की है. जब वे प्रदेश के दौरे पर निकलते हैं तो कांग्रेस के युवा कार्यकर्ता नारे लगाते हैं, "देखो देखो कौन आया, छत्तीसगढ़ का शेर आया."
इस नारे की वजह भी है. भूपेश बघेल ने पिछले पांच वर्षों में जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी की सरकार और ख़ासकर मुख्यमंत्री रमन सिंह के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी है उसने ज़मीनी स्तर तक के कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा दिया.
भूपेश बघेल ने जिस तरह से रमन सिंह और उनके परिवार के कथित भ्रष्टाचार के मामले एक के बाद एक उजागर किए, जिस तरह से उन्होंने शक्तिशाली नौकरशाहों को खुले आम चुनौती दी उससे राज्य में कांग्रेस की छवि बदली.
अंतागढ़ उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी की ख़रीद फ़रोख़्त के मामले में जिस तरह से उन्होंने अपनी ही पार्टी के कद्दावर नेता अजीत जोगी और उनके बेटे अमित जोगी को घेरा और फिर अमित जोगी को पार्टी से निष्कासित किया उसके बाद प्रदेश में यह धारणा बन गई कि भूपेश बघेल 'हिम्मत वाले' नेता तो है.
आज जब चुनाव परिणाम कांग्रेस के पक्ष में आ गए हैं तब भी प्रदेश में बघेल को छोड़कर कोई दूसरा नेता नहीं है जो रमन सिंह, भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस के ख़िलाफ़ खुला बयान देता हो.
कई नेता को पिछले पांच साल में भी मुख्यमंत्री रमन सिंह के मित्र बने रहे और सरकारी विमान और हेलिकॉप्टर का सुख भोगते रहे.
पत्रकार विनोद वर्मा का समर्थन
यह लड़ाई न भूपेश बघेल के लिए आसान रही न कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए. रमन सिंह सरकार ने भूपेश बघेल को तरह तरह से घेरने की कोशिश की.
भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) ने भूपेश बघेल के ख़िलाफ़, उनकी मां और पत्नी के ख़िलाफ़ एफ़आईआर तक दर्ज कर ली. इसके जवाब में भूपेश बघेल अपनी बीमार मां और पत्नी को लेकर गिरफ़्तारी के लिए एसीबी के दफ़्तर पहुंच गए.
प्रदेश के एक मंत्री राजेश मूणत की कथित अश्लील सीडी के मामले में जब पत्रकार विनोद वर्मा को गाज़ियाबाद में गिरफ़्तार किया गया तो उन्होंने रायपुर में एक पत्रवार्ता की और हाथ में एक सीडी लहराते हुए कहा, "यदि सीडी रखने पर गिरफ़्तारी होती है तो ये मेरे हाथ में भी सीडी है, मुझे भी गिरफ़्तार कर ले सरकार."
रमन सिंह सरकार ने उन्हें गिरफ़्तार तो नहीं किया लेकिन उनके ख़िलाफ़ सीडी बांटने की रिपोर्ट दर्ज़ करवाई और मामला आनन फानन में सीबीआई को सौंप दिया.
अब उनके ख़िलाफ़ एक मामला सीबीआई में दर्ज है कि उन्होंने अश्लील सामग्री का वितरण किया. इस राजनीतिक लड़ाई में जब चालान पेश हुआ तो उन्हें ज़मानत लेने से इनकार किया और जेल चले गए.
संगठन को ताक़तवर बनाने की कवायद
एक ओर जब भाजपा बूथ के स्तर पर पन्ना प्रभारी की बात कर रही थी तब कांग्रेस के पास संगठन के नाम पर ब्लॉक के नीचे कोई ढांचा ही नहीं था.
इस कमज़ोरी को भूपेश बघेल ने पहचाना और बूथ स्तर पर काम करना शुरू किया. भूपेश बघेल ने बीबीसी से कहा, "मैं जो कुछ हूं संगठन की वजह से हूं, मेरी वजह से संगठन नहीं है. इसलिए मैंने प्रदेश में संगठन को मज़बूत करने को ही अपना मूल लक्ष्य बना रखा था."
उन्होंने जून, 2017 में कांग्रेस संगठन को बूथ के स्तर पर ले जाने की प्रक्रिया शुरू की. शुरुआत हुई ट्रेनिंग यानी प्रशिक्षण से. चार सत्रों में छह सात घंटे चलने वाले इस प्रशिक्षण ने कार्यकर्ताओं को बूथ के स्तर पर पहुंचा दिया.
प्रशिक्षण के प्रभारी रहे पार्टी महासचिव राजेश तिवारी कहते हैं, "प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल ने एक नई शुरुआत की. पहली बार हमने नीचले स्तर के कार्यकर्ताओं को कांग्रेस की उपलब्धियों, भाजपा-आरएसएस के सच से वाकिफ़ करवाया तो बूथ के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्हें सोशल मीडिया पर लड़ाई के लिए भी तैयार किया."
राजेश तिवारी बताते हैं कि पहली बार प्रदेश के 23 हज़ार से भी अधिक बूथों में से लगभग 95 प्रतिशत बूथों पर कमेटियां बनाई गई और चुनाव में इन कमेटियों ने सक्रियता से भाग भी लिया है.
वे याद करते हैं, "इस प्रशिक्षण के बारे में जब राहुल गांधी जी ने सुना तो वे बस्तर में इसे ख़ुद देखने आए और दो दिनों में लगभग तीन घंटे उन्होंने प्रशिक्षण कार्यक्रम को ख़ुद देखा."
भूपेश बघेल की ही पहल पर देश में पहली बार कांग्रेस ने उम्मीदवारों के चयन में बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं की पसंद पूछी और अधिकांश जगहों पर उसी के अनुसार टिकट वितरण किया गया.
भूपेश बघेल कहते हैं, "परिणाम आ रहे हैं तो इसका श्रेय बूथ कमेटियों को भी उतना ही मिलना चाहिए जितना शीर्ष नेतृत्व को."
आरएसएस और भाजपा से खुली लड़ाई
राष्ट्रीय स्तर पर अगर आरएसएस से खुली लड़ाई लड़ते हुए सिर्फ़ राहुल गांधी दिखते हैं तो छत्तीसगढ़ में यह कमान अकेले भूपेश बघेल ने संभाल रखी है.
बघेल ने फ़ेसबुक पर खुली चिट्ठी लिखकर कहा, "आरएसएस देश का सबसे पाखंडी संगठन है." उन्होंने ही आरएसएस से पूछा कि भाजपा सरकार शराब बेच रही है तो संघ चुप क्यों है, क्या इससे भारतीय संस्कृति को ख़तरा नहीं है.
छत्तीसगढ़ में जब सरकारी सहायता से चलने वाली गौशालाओं में सैकड़ों गायें मर गईं और पता चला कि वहां से गायों की खाल और हड्डी का व्यापार होता था तब भी भूपेश बघेल ने संघ को चुनौती दी थी, "देश भर में गौ रक्षा के नाम पर राजनीति करने वाले संघ के नेता छत्तीसगढ़ में चुप क्यों हैं."
भूपेश बघेल बताते हैं कि दिसंबर, 1992 में जब बाबरी मस्जिद ढहाई गई तब वे युवक कांग्रेस के ज़िला अध्यक्ष थे. उस समय उन्होंने तत्कालीन दुर्ग ज़िले में 350 किलोमीटर की 'सद्भावना पदयात्रा' निकाली.
तीन दशक तक पत्रकारिता करने के बाद हाल ही में कांग्रेस में प्रवेश करने वाले पत्रकार रुचिर गर्ग कहते हैं, "कांग्रेस में ऐसे कम नेता होंगे जो भाजपा और आरएसएस की सांप्रदायिक नीतियों और उसके ख़तरे को इस तरह से देख रहे हों. आज समझ में आता है कि भूपेश बघेल की 26 साल पहले की उस यात्रा का महत्व कितना अधिक था."
लंबी राजनीतिक यात्रा
सद्भावना पदयात्रा के दौरान भूपेश बघेल की राजनीतिक प्रतिबद्धता और जुझारूपन को कांग्रेस नेतृत्व ने पहचाना और अगले ही वर्ष उन्हें विधानसभा चुनाव का टिकट दिया गया जिसमें वे विजयी भी हुए.
तब से अब तक वे चार बार विधानसभा का चुनाव जीत चुके हैं. इस बार वे पांचवीं बार विधानसभा में पहुंचने वाले हैं.
इस बीच वे 2008 में विधानसभा चुनाव भी हारे और दो बार लोकसभा चुनाव लड़कर पराजय का सामना कर चुके हैं. वर्ष 2003 से 2008 के बीच वे विधानसभा में उपनेता प्रतिपक्ष भी रहे.
किसान पुत्र और विज़न
पिछड़ा वर्ग से आने वाले भूपेश बघेल मूल रूप से किसान हैं. वे एक संपन्न किसान परिवार से आते हैं, उनके पूर्वजों ने भिलाई स्टील प्लांट के लिए अपनी अच्छी खासी ज़मीन दे दी थी.
उनके अपने मूल गांव कुरुदडीह में तब कोई स्कूल नहीं था इसलिए वे 30 किलोमीटर दूर बेलौदी गांव में रहने चले गए.
भूपेश बघेल बताते हैं कि वे छठवीं कक्षा में थे जब उनके पिता नंदकुमार बघेल ने उन्हें खेती बाड़ी संभालने का काम भी दे दिया था.
खेती किसानी पर भूपेश बघेल की अच्छी पकड़ है. तभी वे नारा देते हैं, "छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी, नरवा, गरवा, घुरुवा बारी" यानी वे छत्तीसगढ़ में नदी नालों के पानी को सहेजना चाहते हैं, पशुधन को उत्पादक बनाना चाहते हैं और जैविक खेती के भरोसे खेती बाड़ी को नया आयाम देना चाहते हैं.
वे छत्तीसगढ़ को औद्योगिक विकास के बारे में वे कहते हैं, "मेरी राय में छत्तीसगढ़ को बिजली उत्पादक राज्य से सबसे बड़ा बिजली खपत करने वाला राज्य बनाना होगा. तभी राज्य रोज़गार पैदा करेगा और ग़रीबी के कुचक्र से निकलेगा."
हम जानते हैं कि राजनीति और सत्ता की अपनी सीमाएं होती हैं. वादे और दावों का यथार्थ में बदलना इतना आसान तो नहीं होता. हालांकि विधानसभा चुनाव में उन्होंने जिस तरह से इस जीत को कांग्रेस की झोली में डाला है, वह भी आसान नहीं था.
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