राम मंदिर का मुद्दा मोदी को संकट में डालेगा या संकट से निकालेगा: नज़रिया

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- Author, सुहास पलशीकर
- पदनाम, समाजशास्त्री, बीबीसी हिंदी के लिए
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने सितंबर में दिल्ली में कई भाषण दिए थे.
इन भाषणों से प्रभावित होकर मीडिया के एक तबके ने ये तक कहा कि आरएसएस बदल गया है. इस आंकलन ने आरएसएस की मूल राजनीतिक स्थिति को नज़रअंदाज़ किया.
लेकिन फिर आता है दशहरा पर भागवत का दिया भाषण. भागवत ने साफ़ किया कि राम मंदिर के मुद्दे पर आरएसएस अपने स्टैंड पर कायम है.
इसके बाद से लेकर अब तक राम मंदिर एक बार फिर ख़बरों में है. अब देश में राम मंदिर के मुद्दे पर कॉन्फ्रेंस, रैली और कई कार्यक्रम हो रहे हैं.
आने वाले दिनों में राम मंदिर के मुद्दे पर कई कार्यक्रम अयोध्या में भी देखने को मिलेंगे.
ऐसे में सवाल ये है कि क्या देश में फिर ऐसे हालात पैदा हो रहे हैं, जो अब से क़रीब 30 साल पहले थे? अगर ऐसा हुआ तो इसके नतीजे क्या होंगे?

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कुछ सवाल, जिनके जवाब फिलहाल स्पष्ट नहीं हैं
अगर अतीत की ओर लौटते हैं तो कुछ सवालों के जवाब खोजना दिलचस्प हो सकता है.
मसलन, अयोध्या मुद्दे पर इस दौर के नए आडवाणी और वाजपेयी कौन होंगे? इस मुद्दे से होने वाले फ़ायदों को कौन भुनाएगा?
सबसे अहम बात ये कि अयोध्या के मुद्दे पर भारतीय राजनीति किस ओर बढ़ेगी?
30 साल पहले राम जन्म भूमि आंदोलन के नेतृत्व का ज़िम्मा आडवाणी के कंधों पर था.
आडवाणी के नेतृत्व में कारसेवा, रथ यात्राएं पूरे देश में निकाली गईं, जिनका मकसद हिंदुओं को राम मंदिर के मुद्दे पर एकजुट करना रहा.
नतीजा ये हुआ कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना करते हुए अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी गई.

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6 दिसंबर 1992 की वो तारीख़
1992 के दिसंबर महीने की छह तारीख़. अयोध्या में बाबरी विध्वंस के बाद राम जन्मभूमि आंदोलन की रफ़्तार कम हो गई.
इसकी एक वजह ये रही कि इस आंदोलन से जो राजनीतिक फ़ायदा मिल सकता था, वो बीजेपी उठा चुकी थी.
दूसरा इस आंदोलन के बावजूद बीजेपी को पूर्ण बहुमत हासिल नहीं हुआ था. तब ये तय हुआ दूसरे दलों से गठबंधन करने के लिए विवादित मुद्दों को ठंडे बस्ते में डाल देना चाहिए.
तीसरा ये कि भले ही छोटे स्तर पर हिंदू गौरव को सराहा गया लेकिन बाबरी विध्वंस के बाद आम लोग खुलकर सामने नहीं आए. मीडिया ने भी बाबरी विध्वंस की जमकर आलोचना की.
इसके बावजूद अयोध्या की यादों को बचाए रखने की कोशिशें हुईं. फिर चाहे नींव पूजन समारोह हो या मंदिर निर्माण के लिए योजना बनाना हो. हर साल छह दिसंबर को मनाया जाना वाला जश्न इसी कड़ी का अहम हिस्सा है.
राम मंदिर पर कोर्ट की तारीख़ें इस मुद्दे की यादें लोगों में बनाए रखती हैं.
लिब्राहन कमीशन को इस मामले की जांच सौंपी गई थी. ये जांच लंबी चली कि ये मुद्दा आए रोज़ ख़बरों में बना रहा.

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आरएसएस राम मंदिर का मुद्दा क्यों उछाल रहा है?
अब जब 2014 से केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, तब आरएसएस एक बार फिर राम मंदिर का मुद्दा उठाकर विवाद क्यों खड़ा करना चाह रहा है?
इस सवाल का एक मासूम जवाब ये हो सकता है कि आरएसएस और बीजेपी (ख़ासकर मोदी) के बीच तनातनी का माहौल है. ऐसे में ये विवाद मोदी को संकट में डालने के लिए है.
हो सकता है कि आरएसएस और बीजेपी के बीच मतभेद हों. लेकिन ये जवाब पर्याप्त नहीं है.
इस बार वो अपने दम पर सत्ता में हैं. ऐसे में ये बात असंभव है कि मोदी और आरएसएस अंदरूनी मतभेद के लिए एक-दूसरे के लिए संकट खड़ा करेंगे.
कुछ लोग इस सवाल के दूसरे पहलू की ओर ध्यान ले जाते हैं. वो ये कि बीजेपी और आरएसएस सत्ता में बने रहने के दौरान ही इस मसले को सुलझा लेना चाहते हैं ताकि राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ हो सके.
कुछ भोले भाले आरएसएस समर्थक ज़रूर ये सोचते होंगे कि केंद्र की ताक़तवर मोदी सरकार आसानी से राम मंदिर बना सकती है. लेकिन ये हक़ीक़त नहीं है.
ये संभव ही नहीं है कि इस मुद्दे को इतनी आसानी से सुलझा लिया जाए. ख़ासकर तब जब राम मंदिर से जुड़े कई केसों पर सुनवाई बाकी है.

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2019 से ठीक पहले ख़तरा लेगी मोदी सरकार?
इस पूरे मामले में ये सवाल जायज़ है कि साढ़े चार साल इस मुद्दे पर निर्जीव मुद्रा में रहने वाली मोदी सरकार अचानक सजीव हो जाएगी और खुद के लिए संकट खड़े करेगी?
ऐसे में फिर चुनाव से ठीक पहले ये मुद्दा क्यों ख़बरों में है? सवाल के जवाब में आपको तीन पहलुओं को समझना होगा.
बीजेपी और आरएसएस असल में ज़्यादा 'राम भक्त' नहीं हैं बल्कि वो इस मुद्दे का राजनीतिक फ़ायदा ध्यान में रखकर चलते हैं.
बीते चुनावों में मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को सफ़लता मिली. इन चुनावों में मोदी मैजिक कुछ कम हुआ है. साथ ही बीजेपी किसी नाकामी के लिए दूसरों को इस बार ज़िम्मेदार नहीं बता सकती, चूंकि सत्ता में वो खुद विराजमान है.
कांग्रेस कम ही जगहों पर सत्ता में है. ऐसे में बीजेपी जनता के सामने कांग्रेस को मुजरिम की तरह नहीं रख सकती. ऐसे हालात में बीजेपी-आरएसएस ने ये चुनावी गणित लगाया होगा कि भावनाओं का सहारा लेकर एक और चुनाव जीता जा सकता है.
बीते चार सालों से 'लव जिहाद' और गोरक्षा का मुद्दा लगातार हिंदू संगठनों के बीच सुलग रहा है. ये साफ़ गणित है कि सत्ता की नाकामियों को छिपाने के लिए अयोध्या के मुद्दे को आगे रखकर धार्मिक भावनाओं के ज़रिए हिंदुत्ववादी राजनीति की जाए.
भारत की बहुसंख्यक आबादी हिंदू है. ये पुराना सियासी गणित है कि अगर हिंदुओं को एकजुट रखकर अपने पाले में रखा जाए तो चुनावी नतीजे अपने पक्ष में आ सकते हैं.

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आडवाणी का गणित अब भी जारी...
रामजन्म भूमि आंदोलन के दौरान आडवाणी ने यही सियासी गणित लगाई थी.
हिंदू वोटबैंक की राजनीति ने 1989 के बाद से बीजेपी को काफ़ी फ़ायदा पहुंचाया है. ऐसे में अगर आगामी चुनाव हिंदू गौरव के नाम पर लड़े जाएं तो हैरानी नहीं होनी चाहिए.
देश, विकास और हिंदुत्व एक ही चीज़ है, बीते चुनावों में मोदी ये बात साफ़ कर चुके हैं.
मोदी हिंदू हृदयसम्राट और विकासपुरुष दोनों हैं.
'राम मंदिर यानी हिंदुओं का गौरव' संभव है कि ऐसी अपील की तरफ़ ज़्यादातर धार्मिक हिंदू अगले चुनावों में आकर्षित हो सकते हैं.
राम के नाम पर अचानक शुरू हुई राजनीति यकीनन अगले चुनाव को ध्यान में रखते हुए शुरू हुई है. इससे ये बात भी साफ़ होती है कि बीजेपी अगले चुनावों में जीत को लेकर आत्मविश्वास से भरी हुई नहीं है.

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विवादित मुद्दों पर किसने डाला हाथ?
याद कीजिए. साल 2014 के बाद जितने भी विवादित मुद्दे हैं, वो किन लोगों की तरफ से उठाए गए.
ये छोटे या बड़े उन संगठनों के उठाए हुए मुद्दे थे, जो सरकार या बीजेपी के पार्टी स्ट्रक्चर का हिस्सा नहीं हैं.
गोरक्षा जैसे कई अहम मुद्दों पर मोदी वैसे भी मौन व्रत रखते हैं. अगर वो कुछ कहते भी हैं तो एक संत की तरह...'सारे काम संविधान के तहत होने चाहिए.'
कुछ विश्लेषक इस ऐसे बयानों को अलग ही तरह से देखते हैं. वो कहते हैं कि मोदी अब हिंदू और मुस्लिम के बीच भेद नहीं करते.
हक़ीक़त ये है कि सत्ता में आने के बाद बीजेपी और आरएसएस के बीच काम का बंटवारा किया है.
आर्थिक कार्यक्रमों से जुड़े कामों का नेतृत्व का काम पार्टी और सरकार करेगी. आरएसएस ऐसे मामलों में दखल नहीं देगी. दूसरी तरफ आरएसएस संस्कृति से जुड़े मुद्दे उठाएगी. संघ के ज़िम्मे उग्र मुद्दों पर स्टैंड लेना और लोगों की राय को बनाने का काम रहा.
इन मुद्दों पर सरकार ने बस चुप्पी बरती. सरकार ने ये कोशिश की कि संघ की राजनीति को नज़रअंदाज़ करे और इसके ख़िलाफ़ कोई एक्शन न ले.

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विवादों से दूरी
इसी काम के बँटवारे का नतीजा ये रहा कि बीजेपी या सरकार गोरक्षा, लव जेहाद और गैर-मुस्लिमों की हत्या से जुड़े लोगों से दूरी बनाती दिखती है.
सरकार ये दावा कर सकती है कि देश के विकास में जुटी है. लेकिन आख़िर में ये एक सच है कि वो बीजेपी की जड़ें आरएसएस में हैं.
आरएसएस के लिए सांस्कृतिक सत्ता पर काबिज होना सरकार चलाने जितना ही महत्वपूर्ण है. इस एजेंडे के तहत काम करने के मामले में संघ फिलहाल अभूतपूर्व स्थिति में है.
फिलहाल जो कोशिशें होती दिख रही हैं, वो राम मंदिर के मुद्दे पर आडवाणी स्टाइल की राजनीति को आगे बढ़ाने जैसी हैं.
कोई भी उलझी हुई राजनीतिक हलचल अपने लक्ष्यों और काम को लेकर स्पष्ट नहीं रहती है. ऐसे में मौजूदा हलचल की कई और परतें हैं.
हिंदुत्ववादी ढांचे और संघ में कई तरह के लोग होते हैं. एक वो जो सियासी गणित को ध्यान में रखकर राजनीति करते हैं. ऐसे भी लोग हैं, जो शांति से काम करते हुए संस्कृति की राजनीति करते हैं. लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो राष्ट्रवादी हिंदू हैं. ऐसे लोगों के लिए बीजेपी का सत्ता में आना हिंदू राष्ट्र का रास्ता साफ़ होने जैसा है.
ऐसे भी लोग हैं, जो वाक़ई ये मानते हैं कि राम मंदिर सिर्फ़ बीजेपी सरकार के दौरान ही बन सकता है. ये लोग राम मंदिर को बीजेपी सरकार की ज़िम्मेदारी मानते हैं. इसे श्रेणी में ज़्यादातर लोग शहरी हिंदुत्ववादी हैं.

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संघ और बीजेपी दोनों पर दबाव
इन लोगों की उम्मीदों का दबाव बीजेपी और संघ दोनों पर है. कुछ बीजेपी कार्यकर्ता राम मंदिर के मुद्दे पर सक्रिय हो गए हैं. ये लोग ज़्यादा से ज़्यादा हिंदुओं को एकजुट करने की कोशिश करेंगे.
राम मंदिर आंदोलन की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि आरएसएस और बीजेपी कैसे इन स्वघोषित समर्थकों से निपटेगी?
हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति का एक अहम पड़ाव तब पूरा हुआ था, जब बीजेपी-आरएसएस ने रामजन्म भूमि के मुद्दे को आगे बढ़ाया था. इस दौर में 'हिंदू आइडेंटिटी' जाति से ऊपर रही.
अब राम मंदिर का मुद्दा एक नए दौर से गुज़र रहा है. हिंदुत्व की राजनीति की बात करने वाले लोगों के सामने भी नई चुनौती है.
इन लोगों को धर्म की विरासत और दूसरे के धर्म को लेकर पागलपन ऐसी पीढ़ी के सामने लेकर जानी है जो कम्युनिकेशन, टेक्नोलॉजी में माहिर है.
जब अयोध्या आंदोलन का आख़िरी चरण चल रहा था, वो दौर आर्थिक सुधारों के बाद का दौर था. तब भारत भूमंडलीकरण की शुरुआती सीढ़ियां चल रहा था.
इसके चलते नए मौके, नई चिंताएं और नई परेशानियां भी पैदा हुईं थीं. ऐसा माना जाता है कि भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में लोग तकनीक और आर्थिक तौर पर तो विकसित हुए लेकिन संस्कृति के मामले में वो अब भी अतीत से जुड़े हुए हैं.
भूमंडलीकरण के साये में पलने वाली पीढ़ी को भी इससे अलग नहीं रखा जा सकता.

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दूसरे को लेकर पागलपन यानी गौरव का दौर
ऐसे में जो लोग अयोध्या के मुद्दे को उठा रहे हैं, हालात उनके पक्ष में हो सकते हैं. अभी ऐसा माहौल है, जिसमें दूसरे को लेकर पागलपन को गौरव से जोड़कर देखा जाता है.
'हम हिंदू हैं.' 'हमारे साथ अन्याय हो रहा है' जैसी बातें आसानी से फैलाई जा रही हैं. इस मद्देनज़र अयोध्या आंदोलन का ये नया चरण नई और युवा पीढ़ी के दिमाग में साम्प्रदायिक राजनीति के बीज बो सकता है.
राम मंदिर के मुद्दे के साथ हिंदू धर्म, परंपराओं और भारतीय इतिहास को इस नई पीढ़ी के सामने पेश किया जाएगा. चुनाव आकर चले जाएंगे. बीजेपी जीतेगी या हारेगी.
लेकिन इस पूरे दौर से 18 की उम्र पार करने वाले युवाओं के दिमाग में जो छवि बनेगी, वो रह जाएगी. ये भारत के भविष्य को भी प्रभावित करेगा.
ज़ाहिर है कि इसका फायदा आरएसएस की सांस्कृतिक राजनीति को मिलेगा. इस मामले में जो लोग हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं की राजनीति करेंगे, उनकी नज़र भविष्य में राजनीतिक सत्ता और सांस्कृतिक सत्ता पर होगी.
अयोध्या को लेकर जिस कदर राजनीति बढ़ रही है, ये साफ़ है कि धर्म की राजनीति की काट मुश्किल है. मंदिर बनेगा या नहीं, ये अलग मुद्दा है लेकिन आरएसएस की शुरू की इस लड़ाई में कोई दूसरा प्रतिद्वंदी नहीं है.
आरएसएस ने अपनी राजनीतिक दिशा 30 साल पहले तब साफ़ कर दी थी. अब जब ये राजनीति एक बार फिर कदम बढ़ा रही है, इसे रोकने वाला कोई नहीं है.
ऐसे में ये सवाल मन में रह जाता है कि क्या ये सब भविष्य में भारतीय लोकतंत्र के बिगड़ने के लक्षण नहीं हैं?
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