मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2018: क्या 'आदिवासियों के हिन्दूकरण' से जीत रही बीजेपी?

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इटारसी से
समाजवादी जनपरिषद के उम्मीदवार फागराम पिछले तीन चुनावों से खड़े हो रहे हैं, लेकिन दो से पाँच हज़ार वोटों में ही सिमट कर रह जाते हैं.
फागराम इस बार होशंगाबाद ज़िले के सिवनी मालवा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में हैं. वो जानते हैं कि इस बार भी चुनाव नहीं जीतेंगे, लेकिन फिर भी लड़ रहे हैं. फागराम आदिवासी हैं और एक मोटरसाइकिल से अपने इलाक़े में प्रचार करने निकलते हैं.
एक तरफ़ जहां कांग्रेस और बीजेपी के करोड़पति उम्मीदवार हैं तो दूसरी तरफ़ एक झोले के साथ प्रचार पर निकलने वाले फागराम. फागराम आख़िर क्यों चुनाव लड़ते हैं?
वो कहते हैं, ''मैं इन्हें जिस हद तक चुनौती दे सकता हूं और आदिवासियों के बीच जितनी जागरुकता फैला सकता हूं उसे करने से बाज नहीं आऊंगा. भले कभी ना जीत पाऊं.''
मध्य प्रदेश में आदिवासी लगभग 23 फ़ीसदी हैं और इनके लिए 47 सीटें सुरक्षित हैं.
पिछले तीन विधानसभा चुनावों से आदिवासियों के लिए रिज़र्व सीटों पर बीजेपी जीत हासिल कर रही है.

आदिवासी सीटों का गणित
2013 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने आदिवासियों के लिए सुरक्षित 47 में से 31 सीटों पर जीत दर्ज की थी.
2008 में भी 47 में से 31 आदिवासी सीटें बीजेपी की झोली में गईं. 2003 में परिसीमन से पहले आदिवासियों के लिए 41 सीटें रिज़र्व थीं और बीजेपी ने 37 सीटें जीती थीं.
1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण हो रहा था, लेकिन दिलचस्प है कि मध्य प्रदेश के 1993 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की सीटें कम हो गई थीं.
1990 में मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को कुल 320 में से पूर्ण बहुमत से भी ज़्यादा 220 सीटों पर जीत मिली थी जो 1993 में 116 पर आकर सिमट गई.
1993 में आदिवासियों के लिए रिज़र्व सीटों पर बीजेपी के महज़ तीन प्रत्याशी ही जीत पाए थे. 1993 में ही दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बने और 2003 तक रहे.
आख़िर बीजेपी ने आदिवासियों के लिए ऐसा क्या कर दिया है कि लगभग सुरक्षित सीटें पिछले तीन चुनावों से उसी की झोली में जा रही हैं? ऐसा तब है जब आदिवासी आज भी वन अधिकार के लिए लड़ रहे हैं. शिक्षा और रोज़गार के मामले में पिछड़े हुए हैं और बड़े बांधों के कारण आज भी विस्थापन का दंश झेल रहे हैं.
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बीजेपी की जीत के कारण
सिवली मालवा के ही केसला गांव के इक़बाल बालू जेएनयू से पीएचडी कर रहे हैं.
फागराम भी इसी गांव के हैं. इक़बाल बीजेपी की जीत के कई कारण बताते हैं.
वो कहते हैं, ''पिछले तीन चुनावों में कांग्रेस ज़मीनी स्तर पर बुरी तरह से बिखर गई है. आदिवासियों की एक पार्टी गोंडवाना गणतंत्र पार्टी बनी भी तो वो जल्द ही राजनीतिक सौदेबाज़ी में लिप्त हो गई. गोंडवाना गणतंत्र के नाम से ही ऐसा लग रहा था कि यह केवल गोंड आदिवासियों के लिए है जबकि मध्य प्रदेश में भील आदिवासी भी भारी तादाद में हैं.''
इक़बाल कहते हैं, ''इस दौरान आरएसएस के संगठन वनवासी कल्याण परिषद ने भी आदिवासियों के बीच अपने एजेंडों को फैलाया. वनवासी कल्याण परिषद ने कई धार्मिक अनुष्ठानों का बड़े पैमाने पर आयोजन कराया. इसमें सबरी के किरदार को इन्होंने आगे किया. इन्होंने बताया कि कैसे सबरी ने राम को जूठा बेर खिलाया था और राम ने बेर प्रेमवश खाए थे. ये सबरी कुंभ का आयोजन करने लगे. आदिवासियों को दूसरे राज्यों में धार्मिक यात्राओं पर भेजने लगे. इन्होंने हाशिए के आदिवासी इलाक़ों में छात्रावास और पुस्तकालय खोले. पुस्तकालय में मिलने वाली किताबें हिन्दूवादी विचारों की ओर प्रेरित करने वाली होती हैं और छात्रावास में जो छात्र रहते हैं, आरएसएस उन्हें अपने हिसाब से प्रशिक्षित करता है.''
इक़बाल कहते हैं कि मसला केवल आरएसएस का ही नहीं है बल्कि मीडिया ने भी सवर्ण मूल्यों और हिन्दू रीति-रिवाज को स्थापित करने में अपनी भूमिका अदा की है. मध्य प्रदेश में आदिवासी इलाक़ों में काम करने वाले अनुराग मोदी भी इक़बाल से सहमत दिखते हैं.
आरएसएस के लोग आदिवासियों को वनवासी कहना पसंद करते हैं. 2002 में जब बिहार का विभाजन हुआ था तो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार इसका नाम वनांचल रखना चाहती थी न कि झारखंड. आरएसएस का कहना है कि जो भी वन में रहते हैं सब वनवासी हैं.
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आख़िर आदिवासी कहने में आरएसएस को क्या दिक़्क़त है?
अनुराग मोदी कहते हैं, ''आदिवासी कहने का मतलब हुआ कि वैसी आबादी जो यहां की मूल निवासी है. यानी आदिवासी के अलावा बाक़ी लोग बाहर से आकर बसे हैं. मतलब कि आर्य बाहर से आए हैं और ये यहां के मूल निवासी नहीं हैं. ऐसे में आरएसएस के लोग फिर किस मुंह से कहेंगे कि मुसलमान बाहरी हैं और हिन्दू यहां के मूल निवासी हैं. इसीलिए ये आदिवासियों को वनवासी कहते हैं.''
भोपाल में वनवासी कल्याण परिषद के कार्यालय प्रबंधक मधु धनकड़ से पूछा कि वो आदिवासी को वनवासी क्यों कहते हैं?
इसके जवाब में उन्होंने कहा, 'वन में रहने वाले सारे लोग वनवासी हैं. ये सब भगवान राम के वंशज हैं. हम सब आदिवासी हैं. सबरी माता ने भगवान राम को जूठा बेर खिलाया था और राम खाए थे. हमारे भगवान राम के साथ सबरी माता भी पूजनीय हैं.''
मध्य प्रदेश में वनवासी कल्याण परिषद के प्रांत प्रमुख योगीराज परते कहते हैं, ''हमलोग वनवासी क्षेत्र में काम सर्वांगीण विकास के लिए कर रहे हैं. हम लोग तो ख़ुद चाहते हैं कि वनवासियों की मूल परंपरा सुरक्षित रहे. वनवासी समाज की पूजा पद्धति हिन्दुओं से अलग नहीं है. हम वनवासी कल्याण का हिन्दूकरण नहीं कर रहे हैं बल्कि वो हिन्दू समाज से ही हैं. ये हमारे ही लोग हैं इसलिए हम काम कर रहे हैं. इस देश में हम सब आदिवासी ही हैं. आर्य भी आदिवासी ही हैं. मुसलमान भी यहीं के हैं क्योंकि बाद में सब हिन्दू से मुस्लिम बने थे.''
मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाक़ों में काम करने वाली स्मिता गुप्ता बताती हैं कि पिछले कुछ दशकों में आदिवासी इलाक़ों में संघ और उससे जुड़े संगठनों की पैठ बढ़ी है और इसका प्रभाव भी पड़ा है.
वो कहती हैं, ''मध्य प्रदेश में जब से बीजेपी सरकार आई है तब से सरकार के कई संस्थानों का ढांचा बदला है. सरकारी स्कूलों को इन्होंने सरस्वती शिशु मंदिर की तरह बना दिया है. वनवासी कल्याण परिषद को फंडिग किया है. पैसे के बल पर इन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को तैयार किया है. पहले यहां के आदिवासी कांग्रेस को वोट करते थे.''

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आदिवासियों को क्यों नहीं लुभा पाई कांग्रेस?
स्मिता कहती हैं कि कांग्रेस ने भी आदिवासियों के लिए कुछ नहीं किया.
वो कहती हैं, ''अगर कांग्रेस आदिवासियों के लिए कुछ करती तो यहां उसकी ये हालत नहीं होती. मैं यहां 1985 में आई थी तो देखा था कि महिलाएं मांग में सिंदूर नहीं लगाती थीं. अब वो सिंदूर लगाने लगी हैं. आदिवासियों की जो अपनी चीज़ें थीं उनकी जगह हिन्दू रीति-रिवाज तेज़ी से फैले हैं. अब तो आदिवासियों के बीच गणपति की पूजा भी होने लगी है.''
फागराम भी कहते हैं कि आदिवासियों की ग़रीबी और मज़बूरी का फ़ायदा बीजेपी और आरएसएस ने उठाया है और पैसे के दम पर अपने लोगों और संगठन को मज़बूत बनाया है.
वो कहते हैं, ''वनवासी कल्याण परिषद के लोग शुरू में आदिवासियों के ज़रूरी मुद्दों को उठाते हैं. ऐसे में आदिवासी भी आकर्षित होते हैं. पैर जमाने के बाद ये अपना एजेंडा लागू करना शुरू करते हैं. इन्होंने आदिवासियों के बीच ही एक अच्छी टीम बना ली है. ये पहले पानी, खेती, स्वास्थ्य और सिंचाई के मुद्दे उठाते हैं, लेकिन ये सब हिन्दू राष्ट्र के आसपास ही होता है.''
स्मिता कहती हैं कि आदिवासी इलाक़े में संघ का पूरा काम हिन्दू राष्ट्र के एजेंडों के तहत ही होता है.
वो कहती हैं, ''यहां कई गो सेवा संघ है. किसी गाय को सड़क पर गाड़ी से चोट लग जाती है तो ये गाड़ी वालों को मारने लगते हैं जबकि सारी गाय सड़कों पर ही घूमती रहती हैं. हिन्दू राष्ट्रवाद का इनका पूरा पैकेज है और उसी के तहत काम कर रहे हैं. जो ग़रीब हैं वो नहीं समझ पाते हैं कि इनका एजेंडा क्या है. वन अधिकार क़ानून को इन्होंने कमज़ोर किया है.''
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'घर बनाने के लिए ईंट नहीं थी और कहां अयोध्या'
फागराम याद करते हुए बताते हैं कि जब 1992 में बाबरी मस्जिद टूटी तो राम मंदिर के निर्माण के लिए यहां से भी आदिवासी गए थे.
वो कहते हैं, ''अब हम लोग सोचते हैं कि अपने घर बनाने के लिए एक ईंट नहीं थी और कहां अयोध्या ईंट लेकर जा रहे थे राम मंदिर बनाने.''
1991 में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (जीजीपी) का गठन हुआ था और इनकी मांग महाकौशल इलाक़े में अलग राज्य गोंडवाना राज्य की थी.
जीजीपी जल्द ही राजनीतिक सौदेबादी की शिकार बन गई. अगर जीजीपी गोंड आदिवासियों की पार्टी बनी थी तो पिछले एक साल में भील आदिवासी युवाओं ने जय आदिवासी युवा शक्ति को खड़ा किया था. जब चुनाव में उम्मीदवार उतारने की बारी आई तो इसके संस्थापक हीरा लाल अलावा ने कांग्रेस का दामन थाम लिया और संगठन बिखर गया.
सबसे दिलचस्प है कि सामन्य सीटों यानी ग़ैर-आरक्षित सीटों पर बीजेपी या कांग्रेस आदिवासी उम्मीदवारों को टिकट नहीं देती है.
कांग्रेस प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी कहते हैं, ''ये बहुत अजीब है कि हमने आदिवासियों को सुरक्षित सीटों तक सीमित कर रखा है. अगर हम इनके लिए कुछ करना चाहते हैं या मुख्यधारा में लाना चाहते हैं तो क्यों नहीं सामान्य सीटों से टिकट देते हैं?''
पंकज चतुर्वेदी कांग्रेस के प्रवक्ता हैं और उनके पास भी इस सवाल का कोई उत्तर नहीं है.
मध्य प्रदेश के बीजेपी प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल से पूछा कि क्या कभी बीजेपी ने ग़ैर-आरक्षित सीटों पर आदिवासी व्यक्ति को टिकट दिया तो उन्होंने कहा कि नहीं ऐसा नहीं हुआ है.
उनका कहना है कि इसकी कोई ज़रूरत भी नहीं है क्योंकि उनके लिए 47 सीटें पहले से ही रिज़र्व हैं. लेकिन रजनीश अग्रवाल के पास इस सवाल का उत्तर नहीं है कि 36 फ़ीसदी आदिवासी-दलित आबादी वाले प्रदेश में ज़्यादातर मुख्यमंत्री ब्राह्मण, ठाकुर और बनिया क्यों हुए जबकि मुख्यमंत्री का पद आरक्षित नहीं है.
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