‘खाते-कमाते बालक को मार डाला, भाजपा का पोस्टर भी न लगने देंगे’: BBC SPECIAL

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- Author, प्रियंका दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, उत्तर प्रदेश से लौटकर
"जब योगी जीते थे तब मेरे लड़के ने पांच हज़ार इकट्ठा करके पूरे गांव में मिठाई बंटवाई थी. इतना ख़ुश था वो. अकेले 900 वोट तो योगी के लिए उसी ने पड़वाए थे घर-घर जाकर. और देखो क्या किया भाजपा ने हमारे साथ. नब्बे किलो का बालक था मेरा - उसकी हड्डी-हड्डी तोड़ कर मार डाला बिना किसी क़सूर के."
दिल्ली से तक़रीबन 85 किलोमीटर दूर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चिरचिटा गांव के सुमित गुर्जर के पिता काफ़ी ग़ुस्से में थे. उनके बेटे की पुलिस एनकाउंटर में मौत हुई और वो अब सीबीआई जाँच की माँग कर रहे हैं.
गांव के मुहाने पर ही एक बाइक सवार हमारा इंतज़ार कर रहा था. इसी बाइक सवार के पीछे चलते हुए हम गांव के दूसरे छोर पर मौजूद सुमित गुर्जर के घर पहुंचे.
आंगन में क़दम रखते ही 22 साल के सुमित की मां श्यामवती मेरे सामने हाथ जोड़ कर खड़ी हो जाती हैं. 55 साल की श्यामवती के सिर पर एक पुराना दुपट्टा था और उनकी आँखों में आँसू भरे थे.
"मुझे न धन चाहिए न दौलत, मुझे किसी से कुछ भी नहीं चाहिए. सिर्फ़ मेरे बेटे को सीबीआई जाँच दिलवा दो. उसे पुलिस ने झूठा फँसा के मारा है. नक़ली एनकाउंटर में मार डाला मेरे लड़के को", कहते हुए श्यामवती सिसकने लगती हैं.
तीन अक्टूबर 2017 की रात चिरचिटा गांव से लगभग 60 किलोमीटर दूर ग्रेटर नोयडा में हुई एक पुलिस मुठभेड़ में सुमित की मौत हो गई थी. अपने परिवार और गांव में एक सीधे-साधे किसान युवक के तौर पर पहचाने जाने वाले सुमित पर उनके एनकाउंटर के एक दिन पहले हत्या, चोरी, डकैती और लूटपाट के कई आरोपों के साथ-साथ पचास हज़ार का इनामी अपराधी होने का ठप्पा भी लगा दिया गया था.

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घटना के दिन से ही सुमित के परिजनों ने इस मुठभेड़ को पुलिस के हाथों हुई 'हत्या' बताते हुए उच्च स्तरीय जांच की मांग करना शुरू कर कर दिया था. उनकी मांगों के साथ-साथ सुमित को गुज़रे हुए भी एक साल बीत चुका है. लेकिन अभी तक मामले में पुलिस या प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है.
लेकिन सुमित गुर्जर एनकाउंटर पर आने से पहले पाठकों को यह बताना ज़रूरी है कि बीते एक साल के दौरान मेरठ पुलिस ज़ोन में 860 पुलिस एनकाउंटर हुए हैं.
इन 860 मुठभेड़ों में 384 तथाकथित 'अपराधी' ज़ख़्मी हुए जबकि 40 मारे गए. मेरठ जोन के इन आंकड़ों को पूरे उत्तर प्रदेश के एनकाउंटर से जुड़े आंकड़ों की पृष्ठभूमि में पढ़ने की कोशिश करें तो पता चलता है कि बीते एक साल में राज्य के 32 प्रतिशत एनकाउंटर अकेले मेरठ ज़ोन में ही हुए हैं.
लेकिन मात्र 32 प्रतिशत एनकाउंटरों में मारे गए ये 40 'तथाकथित अपराधी' पूरे राज्य में एनकाउंटरों के दौरान हुई अभियुक्तों की मौतों का 60 प्रतिशत हिस्सा हैं.
साथ ही पूरे राज्य में बीते एक साल के दौरान हुए एनकाउंटरों में घायल हुए 681 अभियुक्तों के भी कुल 60 प्रतिशत अभियुक्त अकेले मेरठ ज़ोन में हुई मुठभेड़ों में घायल हुए.

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एक 'ग़लत पहचान'
चश्मदीद ग्रामीण बताते हैं कि 30 सितंबर की दोपहर 22 वर्षीय सुमित चिरचिटा से तक़रीबन आठ किलोमीटर दूर बसे एक छोटे से बाज़ार में एक चाय की दुकान पर खड़ा चाय पी रहा था. वह बाज़ार अपने गाजर के खेतों में पड़ने वाली कीटनाशक दवाई ख़रीदने आया था. अचानक एक सफ़ेद टोयोटा गाड़ी आकर बाज़ार में खड़ी हुई और सादे कपड़ों में तैयार 4-5 आदमी सुमित की तरफ़ झपटे.
ग्रामीण गोपीचंद बताते हैं, "बाज़ार में खड़े लोगों को लगा की सुमित का अपहरण हो रहा है. सुमित को भी यही लगा..इसलिए जब उसके हाथ-पैर पीछे की तरफ़ बांध कर उसे गाड़ी में धकेला जा रहा था, तब वो मदद के लिए चिल्ला रहा था. हमें तो बाद में पता चला की पुलिस वाले उसे खूंखार अपराधी बताकर उठा ले गए हैं."
बीबीसी को तहक़ीक़ात में पता चला कि चिरचिटा में सुमित गुर्जर नाम का एक हिस्ट्री शीटर रहता तो था- पर वह श्यामवती और कर्म सिंह का बेटा 22 वर्षीय सुमित गुर्जर नहीं बल्कि शीशपाल नामक व्यक्ति का बेटा और लगभग 35 साल की उम्र का था.
इस 35 वर्षीय सुमित गुर्जर पर वह सभी मामले दर्ज हैं जिनके आरोप में पुलिस इसी गांव के 22 वर्षीय सुमित गुर्जर को उठा कर ले गई थी. सूत्रों के अनुसार यह पैंतीस वर्षीय सुमित गुर्जर नोएडा तथा आस-पास के इलाक़ों में सक्रिय रहा है. चोरी, फ़िरौती और हत्या के कई मामलों में नामज़द यह अभियुक्त फ़िलहाल फ़रार है.
श्यामवती और कर्म सिंह के छोटे बेटे सुमित गुर्जर का अपने इस हिस्ट्री शीटर हमनाम से कोई सम्बन्ध नहीं था. सुमित के ताऊ कमरवीर गुर्जर बताते हैं कि सुमित सीधा-साधा किसान था.
"नया लड़का था और बहुत ही काबिल किसान. हमलोग कभी मक्का नहीं बोते थे. लेकिन उसने पिछली फ़सल में तीन एकड़ मक्का बोया और मुनाफ़े में बेचा. इस बार उसने गाजर बोई थी और बहुत ख़ुश था. उसे उम्मीद थी कि हमें गाजर में भी मुनाफ़ा होगा. एकदम सीधा लड़का था. कोई ज़्यादा शौक़ नहीं. सादे कपड़े पहनता, खेती करता और घर-परिवार में रहता. पूरे गांव-जवार में पूछ लीजिए...उसने आज तक किसी पर एक उंगली तक नहीं उठाई थी."
सुमित गुर्जर एनकाउंटर: परिवार का पक्ष
सुमित की मौत के घटनाक्रम को याद करते हुए उनके चचेरे भाई प्रवीण बताते हैं, "30 सितम्बर को जब हमें ख़बर लगी कि पुलिसवाले सुमित को उठाकर ले गए हैं, तब हमने तुरंत हाथ-पैर मारना शुरू किया. पास के थाने गए, बागपत एसपी (पुलिस अधीक्षक) के पास गए, मुख्यमंत्री पोर्टल से अपनी शिकायत मुख्यमंत्री जी को फ़ैक्स की. सबके हाथ जोड़े, लेकिन किसी ने हमारी शिकायत तक न दर्ज की.''
''फिर एक दिन बाद पुलिस ने हमारे घर पर रेड डाली और सुमित का आधार कार्ड और बाक़ी सारे काग़ज़ ले गए. हमारे एक रिश्तेदार को पता चला की वो नोएडा में है. तो हम भाग कर नोएडा एसपी से मिलने गए. वहां से जवाब मिला कि पुलिस किसी सिससिले में पूछताछ कर रही होगी...सुमित वापस आ जाएगा क्योंकि 'पुलिस को उस लड़के को अपने पास रखकर उसका अचार नहीं डालना'. लेकिन फिर 2 अक्टूबर को शाम साढ़े पांच बजे सुमित का एफआईआर में नाम डाला गया और रात तक नोएडा पुलिस ने उसे एक फ़रार आरोपी घोषित कर दिया.''
''कुछ ही घंटों में अचानक उसपर पचास हज़ार का इनाम भी घोषित हो गया. इसी दौरान दो की ही रात को हमारे घर दूसरी रेड हुई. अब हमें शक हो गया था कि वो सुमित का एनकाउंटर न कर दें...इसलिए हम पुलिस और प्रशासन में जितने लोगों को जानते हैं, सबको फ़ोन करने लगे. बहुत कोशिश की, लेकिन तीन तारीख़ को शाम आठ बजे नोएडा पुलिस ने उसका एनकाउंटर कर ही दिया."

एनकाउंटर के बाद लगभग दो दिनों तक परिजनों को सुमित का पार्थिव शरीर नहीं दिया गया.
प्रवीण कहते हैं, "हमने ग्रेटर नोएडा के पोस्टमॉर्टम हाउस के सामने धरना दिया और महामाया हाइवे जाम कर दिया...फिर जब मीडिया की टीमें आने लगीं, तब कहीं जाकर पुलिस ने हमें सुमित की बॉडी सौपीं. लेकिन पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट अब भी नहीं दी गई."
परिवार ने तत्काल राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और प्रदेश के राज्य मानवाधिकार आयोग से सम्पर्क कर अपनी शिकायत दर्ज करवाई.
14 अक्टूबर 2017 को चिरचिटा में मृतक सुमित के परिजनों से मिलने आई राष्ट्रीय मानवाधिकार की एक टीम ने उत्तर प्रदेश पुलिस से अपनी शक्तियों के अतिरेक में इस्तेमाल पर जवाब मांगते हुए पूछा कि 'पुलिस एनकाउंटरों के सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार पुलिस टीम ने अब तक एक मजेस्ट्रीयल जांच के लिए प्रयास क्यों नहीं किया.'
उत्तर प्रदेश पुलिस को नोटिस भेजते हुए आयोग ने परिजनों को अब तक पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट न दिए जाने पर भी राज्य पुलिस को फटकार लगाई और नियमों के अनुसार पुलिस टीम द्वारा ख़ुद मानवाधिकार आयोग को संपर्क न किए जाने पर भी सवाल किया.
इस घटना के कुछ वक़्त बाद सुमित के परिजनों को पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट दे दी गई. रिपोर्ट के अनुसार सुमित की मौत पेट के दाएं हिस्से में लगी गोली की वजह से हुई थी.
सुमित का पार्थिव शरीर मिल जाने के बाद भी परिजनों ने अगले दो दिनों तक अंतिम संस्कार नहीं किया. परिवार के रिश्तेदार गोपीचंद बताते हैं, "हम सुमित की इस ग़ैरक़ानूनी हत्या की सीबीआई जांच की मांग कर रहे थे. विरोध में हमने बच्चे का अंतिम संकार दो दिन रोके रखा और धरने पर बैठे रहे. बहुत बुरी तरह मारा था जी बालक को. रीढ़ की हड्डी तीन जगह से तोड़ रखी थी. एक आँख फोड़ रखी थी. सिर फूटा हुआ था..दांत तोड़े हुए थे. ऐसा लग रहा था जैसे इंसान को नहीं किसी जानवर को पहले पीट-पीट के तोड़ दिया हो और फिर गोली मार दी हो."

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परिवार के पुलिस कार्यवाई के ख़िलाफ़ बागपत और नोएडा की अदालतों में आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 156(3) के तहत मुक़दमा दर्ज करवाया है. लेकिन परिजनों का कहना है कि कोर्ट जाने के बाद से स्थानीय पुलिस ने उन पर हर तरह से दबाव बनाने की कोशिश की.
प्रवीण बताते हैं, "इन्होंने तो हमें तोड़ने के लिए हर तरह के जाल बिछाए. जनवरी 2018 में मेरे साथ-साथ और दो भाइयों पर रेप के साथ-साथ हत्या, लूट, गाली-गलौच और मार-पीट जैसी आठ धाराओं में हम पर केस डाल दिए गए. एक साथ परिवार के तीन भाइयों पर! फिर हमने हाईकोर्ट से स्टे ऑर्डर लेकर केस लड़ा.
''रेप का चार्ज लगाने वाली लड़की गोरखपर से थी और उसने तो हम भाइयों को देखा तक नहीं था. मामला कोर्ट में खड़ा ही नहीं हो पाया और सुनवाई के बाद जज साहब ने हमें छोड़ते हुए केस बंद कर दिया. लेकिन इस बीच हम सारे लोग चिंता में पागल हो गए. केस लड़ने में हमारे 3-4 लाख रुपए लग गए वो अलग. पुलिस के लोग हम पर लगातार दबाव बनाते रहे कि हम अपने भाई की हत्या के मामले में समझौता कर लें तो तीनों भाइयों पर लगे ये फ़र्ज़ी मुक़दमे हटा लिए जाएंगे. लेकिन हम डटे रहे."
सुमित के पिता कर्म सिंह गुर्जर का आरोप है कि स्थानीय पुलिस के लोग उनके रिश्तेदारों तक पैसे लेकर मामले को रफ़ा-दफ़ा करने का दबाव बना रहे हैं.
वो रोते हुए कहते हैं, "दो करोड़ तक तो पहुंच गए हैं ये लोग, बीस करोड़ भी देंगे तब भी मैं पीछे नहीं हटूँगा. अपने बालक का केस तो लड़ूंगा मैं. इन लोगों ने हमारा बुढ़ापा तो ख़राब कर ही दिया है. लेकिन मैं चुप बैठकर अन्याय सहने वालों में से नहीं हूं."
पुलिस का पक्ष
पुलिस के अनुसार तीन अक्टूबर 2017 की रात बैंक की एटीएम कैश वैन को लूट कर भाग रहे चार बदमाशों को पकड़ने के लिए पुलिस ने नोएडा की एटीएस क्रॉसिंग पर एक चेकपॉइंट बनाया. सफ़ेद स्विफ्ट डिज़ायर गाड़ी में आ रहे बदमाशों ने पुलिस बैरीकेड तोड़ कर भागने का प्रयास किया. पुलिस ने गाड़ी का पीछा किया और भगदड़ में बदमाशों की गाड़ी एक आवासीय कॉलोनी की दीवार से जा टकराई. पुलिस के अनुसार इसके बाद तीन बदमाश भाग निकले, लेकिन चौथे बचे सुमित ने पुलिस पर गोली चलाई जिसमें एक सब-इंस्पेक्टर घायल हुआ. आत्मरक्षा के लिए हुई जवाबी फ़ायरिंग के दौरान सुमित की मौत हो गई.
पुलिस की मानें तो 30 सितम्बर की दोपहर को सुमित का चाय की दुकान से 'अपहरण' हुआ ही नहीं. गांव वालों और बाज़ार के चश्मदीदों ने जो भी देखा वो कभी घटित ही नहीं हुआ. साथ ही 2 अक्टूबर की रात जब सुमित को पचास हज़ार का इनामी घोषित किया गया था, तब पुलिस के अनुसार वह 'फ़रार' था जबकि परिवार के अनुसार वह पुलिस कस्टडी में था.
इस बारे में और बात करने के लिए जब हमने मेरठ ज़ोन के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक प्रशांत कुमार से बात की तो उन्होंने पुलिस पर लग रहे सुमित की फ़र्ज़ी मुठभेड़ में हत्या करने से जुड़े सभी आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया.
क्षेत्र में क़ानून व्यवस्था को बेहतर बनाने का श्रेय पुलिस को देते हुए उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "2012 से 2017 तक तो यहां के थाने अपराधी ही चला रहे थे. पुलिस ने अब काम करना शुरू किया है तो देखिए क़ानून व्यवस्था पहले से कितनी बेहतर हुई है."

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जब मैंने राष्ट्रीय मानवाधिकार द्वारा भेजे गए नोटिस, कोर्ट में चल रहे केस और पुलिस का परिवार पर समझौता करने के लिए दबाव बनाने से सम्बंधित सवाल पूछे तो उन्होंने कहा, "कोर्ट जाना परिवार का अधिकार है. और एनकाउंटर में अपराधी को मारना हमारी स्टेट पॉलिसी नहीं है. यह आत्मरक्षा में लिया गया आख़िरी उपाय होता है.''
''पुलिस ने कभी किसी पर भी किसी भी तरह का दबाव डालने का प्रयास नहीं किया. इस तरह की सभी बातें बेबुनियाद हैं. और अगर कोर्ट के फ़ैसले में इस एनकाउंटर से सम्बंधित कोई भी पुलिस अफ़सर दोषी पाया गया तो उसके ख़िलाफ़ उचित कार्रवाई की जाएगी. सुमित गुर्जर पैसा लूट कर और हत्या करके भाग रहा था. बाकी ह्यूमन राइट्स तो इंसानों के होते हैं, क्रिमिनल्स के नहीं."
एनकाउंटर करने की होड़
सवाल यह भी उठता है कि बीते एक साल में पश्चिमी उत्तरप्रदेश और ख़ासकर मेरठ ज़ोन में सबसे ज़्यादा एनकाउंटर क्यों हुए?
इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने कई पुलिस अधिकारियों से बात की. क्षेत्र की एनकाउंटर स्पेशलिस्ट टीम में लम्बे समय से शामिल एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि दरअसल यहां सरकार की नज़र में बेहतर अफ़सर साबित होने की होड़ में एनकाउंटर किए गए हैं.
वह बताते हैं, "सुशील मूँछ और बदन सिंह बद्दो जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पुराने हिस्ट्री शीटर्स आज भी फ़रारी काट रहे हैं. इन पर कोई टीम काम नहीं कर रही. लेकिन छिनैती या लूटपाट में शामिल छोटे स्तर के स्थानीय गुंडों को मार कर एनकाउंटरों की संख्या बढ़ाने की होड़-सी लगी हुई है. कोई दो हज़ार- एक हज़ार का इनामी हो - तब भी उसे मार दिया जा रहा है.''
''इस होड़ की शुरुआत सबसे पहले बहुजन समाज पार्टी की सरकार में हमारे पुलिस महानिदेशक रहे ब्रिजलाल जी ने की थी. उन्होंने कहा था कि एनकाउंटर करने वाले अफ़सरों को प्रमोशन दिए जाएँगे और अवॉर्ड भी. इसके बाद समाजवादी पार्टी की सरकार आई और एनकाउंटर पर मिलने वाले प्रमोशन बंद हो गए. फिर अब भाजपा आई है और आउट ऑफ़ टर्न प्रमोशन फिर से शुरू कर दिए गए.''
''इसके बाद तो आइपीएस अफ़सरों में होड़ लग गई. एनकाउंटर करके सरकार की नज़र में अच्छा अफ़सर बनने की होड़. यही होड़ नीचे बहती हुई थानों तक आ गई. सरकार की तरफ़ से नोटिस आया जिसमें बाक़ी बातों के साथ आख़िरी लाइन में लिखा था कि अधिकारी चाहें तो अपने विवके के अनुसार बढ़िया काम करने पर सब-इंस्पेक्टर को भी थाने का चार्ज दे सकते हैं. बस, फिर क्या था. एनकाउंटर करो और थाने का चार्ज लो जैसा माहौल हो गया था."

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राजनीतिक विरोध
सुमित के परिजनों का कहना है कि सुमित कट्टर भाजपा समर्थक था. पिता कर्म सिंह गुर्जर कहते हैं, "पुलिस को शक था तो अदालत ले जाती, हमसे कहती, कुछ तो करती. अरे, हमारे खाते-कमाते बालक को फंसा के मार डाला इस सरकार ने. अबके आएं भाजपा वाले- पोस्टर नहीं लगने देंगे हम यहां. मैं बागपत और नोएडा में गुर्जरों की महापंचायत बुलाऊँगा. 20 गांव हैं यहां गुर्जरों के - एक वोट नहीं पड़ने देंगे भाजपा को. अबकि जब वोट मांगने आएंगे तो पत्थर पड़ेंगे उन्हें यहां."
सरकार का पक्ष
चिरचटा के गुर्जरों के इस राजनीतिक विरोध के बारे में जब हमने राज्य के ऊर्जा मंत्री और प्रदेश में सरकार के आधिकारिक प्रवक्ता श्रीकांत शर्मा से लखनऊ में बात की तो उन्होंने बाक़ी सभी एनकाउंटरो पर दिया अपना पुराना जवाब एक बार फिर दोहराते हुए कहा,
"सरकार की पहली प्राथमिकता प्रदेश में सुरक्षा का वातावरण बनाना है. पूर्व में जो यहां सपा-बसपा और कांग्रेस का कॉकटेल था - वह आपराधियों को संरक्षण देता था. लेकिन इस सरकार में अपराधियों को कोई संरक्षण नहीं दिया जाएगा. अगर कोई अपराध करेगा... तो उसको उसी की भाषा में पुलिस जवाब देगी. साथ ही अगर कोई वर्दी पहनकर दादागिरी करेगा तो उसको भी बख़्शा नहीं जाएगा."


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