नज़रियाः मोहन भागवत नोटा के इस्तेमाल न करने पर बार-बार क्यों बोल रहे हैं?

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- Author, प्रोफ़ेसर संजय कुमार
- पदनाम, सीएसडीएस, बीबीसी हिंदी के लिए
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को विजयदशमी के कार्यक्रम में कहा कि चुनावों में नोटा का इस्तेमाल करना राष्ट्रहित में नहीं है.
उन्होंने कहा कि मतदान न करना या नोटा के अधिकार का उपयोग करना, मतदाता की दृष्टि में जो सबसे आयोग्य उम्मीदवार है, उसी के पक्ष में जाता है.
इसलिए राष्ट्रहित सर्वोपरि रख कर सौ प्रतिशत मतदान आवश्यक है.
यह पहली बार नहीं है जब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवन ने नोटा पर ऐसा बयान दिया है. इससे पहले भी उन्होंने दिल्ली के विज्ञान भवन में संघ के तीन दिनों के राष्ट्रीय व्याख्यान माला के दौरान भी ये बातें कही थी.
उन्होंने तब कहा था कि चुनावी व्यवस्था में नोटा किसी चीज़ का हल नहीं है.
मोहन भागवत आख़िर बार बार नोटा को न इस्तेमाल करने की बात क्यों कह रहे हैं. और वो इस बात पर जोर क्यों डाल रहे हैं कि नोटा का इस्तेमाल करना सबसे आयोग्य उम्मीदवार का समर्थन करने जैसा है.
इसकी वजह साफ़ है कि मध्य प्रदेश में सवर्ण वोटर भाजपा के कट्टर समर्थक रहे हैं और वे कुछ मामलों के लेकर पार्टी से नाराज़ चल रहे हैं.
भागवत का डर
कई विधानसभा क्षेत्रों में यह देखने को मिल रहा है कि वो इस बात के लिए अभियान चला रहे हैं कि उन्हें भाजपा से नाराजगी है और दूसरी पार्टी उन्हें पसंद नहीं है, इसलिए वो इस चुनावों में नोटा का बटन दबाएंगे.
वे अपने अभियानों में यह स्पष्ट कर चुके हैं कि नोटा की बात वो लोग कर रहे हैं जिनका आरोप है कि बीजेपी ने उनकी शिकायतों की अनदेखी की है.
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के मन में इस बात का कहीं न कहीं अंदेशा है कि अगर भाजपा से सवर्ण वोटर नाराज़ होते हैं और वो नोटा का बटन दबाते हैं तो इससे भाजपा को नुकसान होगा.
उन्हें यह भी डर है कि अगर ऐसा होता है तो मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सत्ता उनके हाथ से निकल सकती है.
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नोटा की ही बात क्यों कर रहे हैं वोटर
लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि उनके कट्टर समर्थक रहे वोटर नोटा को ही क्यों चुनने की बात कर रहे हैं? वो यह भी अपने पार्टी को संदेश दे सकते थे कि वो उनके प्रतिद्वंदी पार्टी का समर्थन करेंगे.
इसका जवाब यह है कि जिन सवर्ण समुदायों में यह चर्चा ज़्यादा है वो पारंपरिक तौर पर भाजपा के कोर सपोर्टर रहे हैं और उन्हें वोट देते आए हैं.
पिछले दिनों कांग्रेस ने कुछ ऐसा किया नहीं है कि वो कहें कि वो भाजपा को वोट न देकर कांग्रेस को वोट देंगे.
मेरी समझ से यह ऐसी स्थिति है कि वो यह जताना चाहते हैं कि वो भाजपा के साथ हैं और भाजपा नहीं तो कोई दूसरा भी नहीं.
इसलिए वो नोटा का ऑप्शन चुनने की बात कर रहे हैं. उनकी ये बातें भाजपा के ख़िलाफ़ नाराज़गी को जताती है ताकि सामने वाला प्रतिद्वंदी मजबूत भी महसूस न करे और घर की नाराज़गी घर में ही रह जाए.
उनकी सीधी सी रणनीति यह है कि घर का कलेश घर में रह जाए और उससे प्रतिद्वंदी पड़ोसी को मजबूती न मिल पाए.
एक बात और भी हो सकती है. सवर्ण समाज इस बात का प्रचार नहीं करना चाहता है कि वो भाजपा को छोड़कर कांग्रेस का साथ देना चाहता है, क्योंकि इस बात का भय बना रहेगा कि अगर भाजपा दोबारा सत्ता में आ जाती है तो शायद उन्हें नुकसान का सामना करना पड़े.
इसलिए मुझे लगता है कि नोटा की बात करने वाले वोटर अपने पत्ते साफ़ नहीं करना चाहते हैं.
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नोटा चुनावों को कितना प्रभावित कर पाएगा
देश का मतदाता यह कभी नहीं चाहता है कि उसका वोट बेकार जाए. नोटा के लिए अभियान पहले भी हुए हैं पर उसका बहुत असर नहीं दिखा है.
कर्नाटक के विधानसभा चुनावों के दौरान एक विधानसभा क्षेत्र में जोर शोर से नोटा के लिए प्रचार किया गया था और उसका बहुत असर मतदान पर नहीं पड़ा.
महज तीन चार प्रतिशत वोट ही नोटा को गया था. आमतौर पर भारत के मतदाता यह नहीं सोचते हैं कि वो नोटा का बटन दबाएंगे.
भारत में नोटा से चुनाव में हार जीत प्रभावित नहीं होते हैं. यह भी स्पष्ट नहीं है कि कितने प्रतिशत नोटा होने पर मतदान फिर से कराया जाएगा.
जब तक यह स्पष्ट नहीं होता, नोटा चुनावों को प्रभावित नहीं कर पाएगा. ऐसें में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का बयान कहीं न कहीं भाजपा की ताकत को कायम रखने और अपने कोर सपोर्टर को बनाए रखने के लिए कही गई है.
(बीबीसी संवाददाता आदर्श राठौर से बातचीत पर आधारित)


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