मोहन भागवत के वचन का सार क्या रहा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्मेलन में

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दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तीन दिवसीय व्याख्यान माला का बुधवार को सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत के भाषण के साथ समापन हुआ.
इस कार्यक्रम में मोहन भागवत ने 'भविष्य का भारत: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' विषय पर 'आम लोगों के सवालों के जवाब' दिये.
मोहन भागवत ने दावा किया कि संघ ने वक़्त के साथ ख़ुद को काफ़ी बदला है. वो बोले, 'संघ कोई बंद संगठन नहीं है कि डॉक्टर हेडगेवार ने कुछ वाक्य बोल दिये तो हम उन्हें ही लेकर चलते रहें. डॉक्टर हेडगेवार से हमें बदलने की अनुमति मिलती है. इसलिए वक्त के साथ हमने ख़ुद को बदला है.'
कार्यक्रम के अंतिम दिन मोहन भागवत ने हिंदुत्व समेत गौरक्षा, मॉब-लिंचिंग, आरक्षण, अंतरजातीय विवाह, शिक्षा और हिन्दी भाषा पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार रखे.

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पढ़िए, उनके भाषण के मुख्य अंश, उन्हीं के शब्दों में:
एससी/एसटी कानून
अत्याचार दूर करने के लिए एक कानून बना, यह अच्छी बात है. लेकिन इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए. उसका दुरुपयोग होता है, इसलिए संघ मानता है कि उस कानून को ठीक से लागू करना चाहिए और उसका दुरुपयोग रोकना चाहिए.
ये सिर्फ कानून से नहीं होगा. समाज की समरसता की भावना इसमें काम करती है. सद्भावना जागृत करने की बहुत आवश्यकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा और सरकार ने क्या किया, मैं इस बारे में कुछ नहीं बोलूंगा. संघ की इच्छा ये है कि कानून का संरक्षण हो, उसका दुरुपयोग न हो.
आरक्षण
सामाजिक विषमता को हटाकर समाज में अवसरों की बराबरी सबको प्राप्त हो, इसलिए सामाजिक आरक्षण का प्रावधान संविधान में किया गया है. संविधान सम्मत सभी आरक्षणों का संघ समर्थन करता रहा है, करता है और समर्थन करता रहेगा.

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आरक्षण कब तक रहेगा, इसका फ़ैसला वो लोग ही करेंगे जिन्हें आरक्षण दिया गया है. जब उन्हें लगेगा कि आरक्षण की ज़रूरत नहीं, वो इसे समाप्त कर देंगे. संघ के अनुसार, आरक्षण समस्या नहीं है, आरक्षण की राजनीति एक समस्या है.
नोटा (NOTA)
चुनाव प्रणाली में नोटा का प्रयोग बिल्कुल नहीं करना चाहिए. नोटा में बेस्ट की उम्मीद में जो लोग किसी को भी वोट नहीं देते, इसका मुनाफ़ा अंतत: सबसे ख़राब चुनावी उम्मीदवार को ही होता है. चुनावी व्यवस्था में नोटा किसी चीज़ का हल नहीं है.
अल्पसंख्यक
अंग्रेज़ों के आने से पहले हमने कभी अल्पसंख्यक शब्द का इस्तेमाल नहीं किया.
मैं अल्पसंख्यक शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहता. मातृभूमि, संस्कृति और परंपराओं के हिसाब से सभी अपने हैं. ये सच है कि लोगों में मनमुटाव बढ़ा है. लेकिन हमारा आह्वान राष्ट्रीयता का है.

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हम कहते हैं उनसे जो हमारे प्रति रिज़र्वेशन रखते हैं. वो आयें हमारे पास, हमें पास से जानें.
धारा-370
धारा 370 और अनुच्छेद 35-ए पर हमारे विचार साफ़ हैं. ये दोनों नहीं रहने चाहिए, ये हमारा मत है. जम्मू-कश्मीर के तीन टुकड़े होने चाहिए या नहीं, इसपर प्रशासन विचार करे. लेकिन समाज में सुरक्षा रहनी चाहिए.
धर्म-परिवर्तन
जो लोग कहते हैं कि सभी धर्म एक समान हैं, वही धर्म परिवर्तन भी करवा रहे हैं. जब सभी धर्म एक समान हैं तो सवाल उठता है कि आप लोगों को इधर से उधर क्यों ले जा रहे हैं.
धर्म-परिवर्तन किसी भी इंसान की आध्यात्मिक उन्नति के लिए नहीं होता. संघ धर्म-परिवर्तन के ख़िलाफ़ है.
गौ-रक्षा और मॉब लिंचिंग
न सिर्फ़ गाय के लिए, बल्कि अन्य किसी भी वजह से क़ानून को अपने हाथ में लेना अपराध है. गाय के जितने सारे उपयोग हैं, उन्हें कैसे अपनाया जाये, इसपर काम होना चाहिए. जो लोग इस तरह से सोच रहे हैं वो लिंचिंग करने वाले नहीं है.

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अच्छी गौशालायें चलाने वाले, भक्ति से चलाने वाले लोग हमारे यहाँ हैं, मुस्लिम भी इसमे शामिल हैं. जो लोग तस्करी कर रहे हैं, वो ही गाय के नाम पर हिंसा कर रहे हैं.
संघ का मानना है कि गाय ही ऐसा पशु है जो देश में ग़रीब लोगों के लिए आर्थिक सहायक साबित हो सकती है.
महिला सुरक्षा
अपनी पत्नी को छोड़कर सभी महिलाओं को माँ के रूप में देखें. ये हमारी परंपरा में है. इसका पालन करना हमें अपने पुरुषों और लड़कों को सिखाना होगा. याद रहे कि महिलाएं तभी असुरक्षित होती हैं जब पुरुष उनके लिए अपनी दृष्टि बदलता है.
समलैंगिकता
समाज में कुछ लोगों में समलैंगिकता है. ऐसे लोग समाज के अंदर ही हैं, इसलिए उनकी व्यवस्था समाज को करनी चाहिए.

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मुद्दा बनाकर हो हल्ला करने से फ़ायदा नहीं होगा. समाज बहुत बदला है इसलिए समाज स्वस्थ रहे ताकि वे (समलैंगिक) अलग-थलग पड़कर गर्त में न गिर जाएं.
जाति-व्यवस्था
संघ का विचार है कि 'जाति-व्यवस्था' को 'जाति-अव्यवस्था' कहा जाना चाहिए. जाति-व्यवस्था को भगाने में लगे रहेंगे तो वो नहीं जायेगी.
उसके बदले कोई बेहतर व्यवस्था लायेंगे, तो उसका अंत होगा. इसलिए अंधेरे में लाठी चलाने से बेहतर है, दीप जलाये जाएं. इसी आधार पर 'रोटी-बेटी व्यवहार' का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थन करता है.
रोटी व्यवहार तो कुछ लोग अब मजबूरी में भी रखने लगे हैं, लेकिन ये मन से होना चाहिए. बेटी व्यवहार को लेकर अभी कई तरह की चुनौतियाँ हैं.
हालांकि, भारत में गणना करवाकर प्रतिशत निकाला जाये तो संघ के स्वयंसेवकों में अंतरजातीय विवाह करने वालों का प्रतिशत सबसे ज़्यादा मिलेगा.
हिंदुत्व
गांधी जी ने कहा है कि सत्य की अनवरत खोज का नाम हिंदुत्व है. सतत चलने वाली प्रक्रिया है. हिंदुत्व को हिंदुइज़्म नहीं कहना चाहिए. भारत में जो लोग रहते हैं वो सभी राष्ट्रीयता और पहचान की दृष्टि से हिंदू ही हैं.
जनजातीय समाज भी हिंदू ही हैं. हिंदुत्व ही है जो सबके साथ तालमेल का आधार हो सकता है. हिन्दुत्व को लेकर दुनिया भर में सम्मान का भाव है और उसकी स्वीकृति है जबकि भारत में हिंदुत्व को लेकर आक्रोश है.
राममंदिर
राम मंदिर पर अध्यादेश का मामला सरकार के पास है और आयोजन का मामला राम जन्मभूमि मुक्ति संघर्ष समिति के पास है और दोनों में मैं नहीं हूँ. आंदोलन में क्या करना है वह उच्चाधिकार समिति को तय करना है.

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अगर वह सलाह मांगेगी तो मैं बताऊंगा. मैं संघ के नाते चाहता हूँ कि राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर जल्द बनना चाहिए. भगवान राम अपने देश के बहुसंख्य लोगों के लिए भगवान हैं, लेकिन वे केवल भगवान नहीं हैं. उनको लोग इमामे हिंद मानते हैं. इसलिए जहाँ राम जन्मभूमि है वहाँ मंदिर बनना चाहिए.
शिक्षा
परंपराओं पर आधारित शिक्षा प्रणाली ज़्यादा प्रभावी थी जिसे हमने छोड़ दिया. इसलिए अपनी परंपरा के मुताबिक़ एक नई शिक्षा नीति बनानी चाहिए. देश में नई शिक्षा नीति आने वाली है, उम्मीद है उसमें हमारी परंपरा समाहित होगी. ग्रंथों का अध्ययन शिक्षा में अनिवार्य है, ऐसा संघ का मत है.
हिन्दी भाषा
मातृभाषाओं को सम्मान देना ज़रूरी है. अपनी भाषा का पूरा ज्ञान होना चाहिए. किसी भाषा से शत्रुता नहीं करनी चाहिए. अंग्रेजी हटाओ नहीं, यथास्थान रखो. देश की उन्नति के नाते हमारी राष्ट्रभाषा को स्थान मिले, यह ज़रूरी है. हिंदी में काम करना पड़ता है, इसलिये अन्य प्रांतों के लोग हिंदी सीखते हैं. हिंदी बोलने वालों को भी दूसरे प्रांत की एक भाषा को सीखना चाहिये. इससे लोगों में मन मिलाप जल्दी होगा.
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