ग्राउंड रिपोर्ट: नशाबंदी वाले गुजरात से हिंदीभाषी लोगों के पलायन का सच

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- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, हिम्मतनगर (गुजरात) से
खेतों को चीरती एक सिंगल लेन सड़क के दाईं ओर सिर्फ़ फैक्ट्रियां ही फ़ैक्ट्रियाँ दिखती हैं. यह रास्ता गुजरात के साबरकांठा ज़िले का है.
हिम्मतनगर शहर के आगे बसा ढूंढर गाँव, पांच किलोमीटर भीतर चलने पर एक चाय और पान का ढाबा मिलता है, जिसके बाहर कुर्सियों पर गुजरात पुलिस के सिपाही बैठे हैं.
ठीक सामने एक सेरामिक पाउडर बनाने वाली फ़ैक्ट्री के बड़े गेट पर पुलिस का ताला है और भीतर जली हुई कारें पड़ी हैं. साइकिल या स्कूटी से निकलने वाला हर शख़्स, एक नज़र इस फ़ैक्ट्री और दूसरी नज़र ढाबे पर मारे बिना आगे नहीं जाता.
अगर कोई रुकता है तो पुलिसवाला चिल्लाता है, "आगे बढ़ो. तमाशा नहीं चल रहा". वजह 28 सितंबर की एक घटना है जिसने पूरे गुजरात को झझकोर कर रख दिया है.
प्रदेश में रोज़गार की वजह से रह रहे हज़ारों उत्तर भारतीय प्रवासियों को आनन-फानन में घर लौटना पड़ा है.

शराब और कथित बलात्कार
हमेशा की तरह उस दिन भी इस फ़ैक्ट्री में शिफ़्टों में काम चल रहा था. काम करने वाले मज़दूर बिहार और उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे, जिन्हें आम तौर पर कैम्पस में रहने के लिए कमरे भी दिए जाते हैं.
उस शाम छह बजे जब शिफ़्ट ख़त्म हुई तब बिहार के रहने वाले एक 19 वर्षीय मज़दूर ने रोज़ की तरह बाहर के ढाबे का रुख किया. ढाबे पर नियमित रूप से बैठने वाले कुछ लोगों के मुताबिक़, "ज़्यादातर मज़दूर अपना काम खत्म कर पान-बीड़ी और देसी शराब की फ़िराक में बाहर निकलते हैं".
उस शाम भी ढाबे के पास कुछ लोगों ने देसी शराब पी थी जिसे पास के ढूंढर गाँव से नशाबंदी के बावजूद आसानी से "जुगाड़ लिया जाता है".
इस गाँव में हम सुबह साढ़े दस बजे पहुंचे थे और चार-पांच ऐसे लोगों से बात हुई जिनके मुँह से शराब की गंध आ रही थी.
"बापू, हमारे यहाँ कोई नहीं पीता. अगर आप को चाहिए तो दिलवाने की कोशिश कर देंगे", 61 साल के एक गाँव वाले ने मुझसे कहा.

तो वारदात की शाम जब कुछ लोगों ने कथित तौर पर शराब पी, उसके करीब एक घंटे बाद ढाबे के मालिक की 14 महीने की नातिन गायब हुई थी. चारों तरफ़ खोज की गई और परिवार वालों ने पुलिस थाने का रुख किया.
पुलिस आई और जांच शुरू होने तक रात के आठ बज चुके थे, किसी को कोई सुराग नहीं मिल रहा था. इस ठाकोर बहुल जनसंख्या वाले ढूंढर गाँव के लोग भी जमा हो गए क्योंकि ढाबे के मालिक इसी समुदाय से हैं और उसी गाँव के रहने वाले भी.
साढ़े आठ बजे के आस-पास कुछ लोगों को 19 वर्षीय मज़दूर एक दूसरी सड़क से पैदल आता दिखा. शक तब बढ़ा जब एक व्यक्ति ने कथित तौर पर उस मज़दूर के कपड़े पर खून के धब्बे देखे.
पूछताछ शुरू हुई और पुलिस के मुताबिक़ थोड़ी देर में उस मज़दूर ने "हमें वो जगह भी दिखाई जहाँ बच्ची घायल अवस्था में पड़ी थी. फिर उसे गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया".
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मामले पर गर्माहट
इसके बाद उग्र भीड़ ने ढाबे के सामने वाली फ़ैक्ट्री में घुस कर आग लगाई, गाड़िया जलाईं और मज़दूरों के रहने वाले कोठरियों को भी तहस-नहस कर दिया.
सोशल मीडिया पर ख़बर आग की तरह फैली थी उस रात. अगले दिन ठाकोर समुदाय के लोगों ने आंदोलन की घोषणा भी कर दी. घटनास्थल से करीब 10 किलोमीटर दूर शक्ति नगर में आज भी लोगों के पास वो व्हाट्सऐप मैसेज हैं जिनमें कहा गया था, "भैयाजी लोगों को यहाँ से निकालना होगा".
गुजरात और महाराष्ट्र में उत्तर भारतीय, मूलतः उत्तर प्रदेश और बिहार से आए प्रवासी लोगों को अक्सर 'भैयाजी" कहा जाता है.
सोशल मीडिया पर कथित तौर से ऐसे संदेश भी फैलने लगे जिसमें कहा गया, "बाहरी लोगों की बुरी नज़र गुजराती महिलाओं पर पड़ चुकी है".
शायद यही वजह है कि गुजरात के गृह मंत्री ने बीबीसी को बताया कि, "ग़लत और भड़काऊ खबरें फैलाने के आरोप में हमने साइबर क्राइम सेल में 21 मामले दर्ज किए हैं और जांच जारी है".
अगले तीन दिन के भीतर ही उत्तर भारतीयों पर हमले शुरू हो चुके थे. साबरकांठा, मोरबी, बनासकांठा और मेहसाणा जैसे गुजरात के कई ज़िलों में डेढ़ हफ्ते के भीतर दो दर्जन से भी ज़्यादा हमले की वारदातें हुईं.
हज़ारों मज़दूरों को गुजरात छोड़कर भागना पड़ा और जो नहीं भागे, वे घरों में डरकर बैठे रहे.
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शक्तिनगर इलाके के पूरन चंद उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर के रहने वाले हैं और दो हफ्ते बाद भी उन दिनों को याद कर सिहर उठते हैं.
"हमने अपना सामान एक गुजराती मित्र के यहाँ पहुंचा दिया, ताकि लोग अगर घर में आग दें तो नुकसान कम हो. परिवार को यूपी में हर दो घंटे पर फ़ोन कर बता रहे थे कि सब ठीक है, चिंता न करो. लेकिन मन काँप रहा था कि अगर गुस्साई भीड़ पहुँच गई, तो कहाँ भागेंगे".
इलाके में आज भी दर्जनों घरों में ताला लगा है और गलियां वीरान हैं. ऐसा ही मंज़र उत्तर गुजरात के कई ज़िलों की दूसरी बस्तियों में भी है, जहाँ उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे प्रदेशों से आए लोग रहते आए हैं.
राजधानी अहमदाबाद, जिसे सुरक्षा के लिहाज़ से सबसे महफूज़ माना जाता है, वहां भी कई इलाकों में उत्तर भारतीय या हिंदी-भाषी लोगों पर हमले की खबरें आती रही हैं.

उत्तर भारतीय विकास परिषद के प्रमुख श्याम सिंह ठाकुर ने बताया, "जिस तरह से लोगों को भागना पड़ा वो पहले कभी नहीं देखा-सुना गया. लोग अपनी नौकरियां और कारोबार छोड़ कर भागे हैं. बहुतों के पास तो लौटने का किराया तक नहीं था. यूपी और बिहार लौट चुके लोगों से मेरी बात हो रही है लेकिन वे वापसी पर कुछ भी बात नहीं करना चाहते".
प्रदेश की भाजपा सरकार ने मामले पर लगातार सफाई दी है और उप-मुख्यमंत्री नितिन पटेल ने बीबीसी हिंदी से कहा, "हालात पर काबू पा लिया गया है और अगर कुछ लोग प्रदेश छोड़ कर गए भी हैं तो वे त्योहारों-छुट्टियों के बाद वापस लौट भी आएँगे. हमारी सरकार उन्हें सुरक्षा प्रदान करेगी".
प्रदेश के गृह मंत्री प्रदीप सिंह जाडेजा का दावा है कि उत्तर भारतीय प्रवासियों के ख़िलाफ़ हिंसा करने के आरोप में "अब तक 541 गिरफ्तारियां हुई हैं और 67 मामले दर्ज किए गए हैं. व्हाट्सएप ग्रुप्स पर हमारी निगरानी है और पूरे प्रदेश में सुरक्षा स्तर बढ़ा दिया गया है".
बात बढ़ी कैसे
कहा जा रहा है कि इस बलात्कार के बाद 1 अक्टूबर को ओबीसी ठाकोर समुदाय के नेता और कॉंग्रेस के विधायक अल्पेश ठाकोर के एक 'भड़काऊ भाषण' से हिंसा बढ़ गई.
खुद अल्पेश ठाकोर ने बाद में इसका खंडन किया और बीबीसी से कहा कि, "मुझ पर गलत आरोप लगाए जा रहे हैं. हम और हमारा समुदाय तो चाहता है कि उत्तर भारतीय प्रवासी हमेशा की तरह यहाँ खुश रहे और हम लोग उनके अंदर इस बात का भरोसा जताने की ही कोशिश करते रहे हैं".
मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया और आरोपों का जो लंबा दौर शुरू हुआ वो आज भी जारी है.
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी सरकार अल्पेश की 'ठाकोर सेना' पर इल्ज़ाम लगा रही है जबकि कॉंग्रेस को लगता है कि भाजपा ने राजनीतिक लाभ के लिए ऐसा किया है.

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काँग्रेस में शामिल हो चुके अल्पेश ठाकोर ने 2011 में क्षत्रिय ठाकोर सेना नाम का संगठन बनाया था और उत्तर गुजरात के चार ज़िलों में बहुसंख्यक ठाकोर समुदाय के हितों की बात करनी शुरू कर दी थी.
जानकारों का मानना है कि अल्पेश ठाकोर के लोकप्रिय होने में इस समुदाय की महिलाओं का बड़ा हाथ है क्योंकि अल्पेश ने अवैध और ज़हरीली शराब पीने और बनाने के ख़िलाफ़ ज़ोर-शोर से अभियान चलाया है.
लेकिन माना जाता है कि गुजरात के कई दूसरे ज़िलों की तरह ही ठाकोर बहुल ज़िलों में भी अवैध देसी शराब का काफ़ी धंधा फल-फूल रहा है.
साबरकांठा के तीन स्थानीय पत्रकारों ने हमें बताया, "उस रात और अगले कुछ दिनों तक फ़ैक्ट्रियों पर जो ताबड़तोड़ हमले हुए, हमले करने वाली भीड़ में कई लोग देसी शराब के नशे में थे".
बीबीसी ने अल्पेश ठाकोर से इस घटना और ठाकोर इलाके में अवैध शराब की बिक्री के बारे में सवाल किया.
उनका जवाब था, "हमारे समुदाय ने अपनी मांगें सरकार तक पहुंचाई थीं और आंदोलन एक दिन बाद वापस ले लिया था जब सरकार ने मांगें स्वीकार कर ली थीं. उसके तीन दिन बाद जिन लोगों ने हिंसा की उससे ठाकोर समुदाय का लेना-देना नहीं है. मैं खुद अवैध शराब के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ता आया हूँ और आगे भी लड़ता रहूंगा. ख़ास तौर से बताना चाहूँगा कि अब ठाकोर समुदाय के 80 प्रतिशत लोग इस लत को छोड़ चुके हैं".
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अफ़सोस
इधर, ढाबा चलाने वाले उस बुज़ुर्ग नाना को आज इस बात का अफ़सोस है कि 14 महीने की नातिन को, "चारपाई पर छोड़ वे दुकान का बल्ब जलाने के लिए पीछे क्यों मुड़े थे".
दरअसल, उनकी बेटी अपनी दूध पीती बच्ची के साथ उसी सुबह पड़ोस वाले गाँव से मिलने के लिए ढूंढर आई थी.
घटना के दो हफ़्ते बाद पास की कुछ फ़ैक्ट्रियों मे राजस्थान के मूल निवासी और घटना के बाद भाग गए सेरामिक टाइल बनाने वाले कुछ मज़दूर वापस लौट आए हैं.
नाम न लिए जाने की शर्त पर एक ने कहा, "साहब पूरे फ़साद की जड़ शराब है. यहाँ अवैध शराब की भट्टियां आए दिन पकड़ी जाती हैं. झगडे-फ़साद इसी वजह से होते हैं. उस ढाबे पर शाम को लगभग सभी लोग शराब पिए बैठे मिलते हैं जहाँ पर ये वारदात हुई है".
हालाँकि ढाबे के मालिक उस बुज़ुर्ग ने इस बात की जानकारी होने से इनकार किया और कहा, "मुझे नहीं पता कौन पीता था और कौन नहीं. कुछ लोग कभी-कभार पीकर आते ज़रूर थे. इलाके में इतने सारे बाहरी मज़दूर हैं, मैं सबको नहीं पहचानता".
हालाँकि गुजरात में शराब बेचने या पीने पर पाबंदी है. सिर्फ बाहरी व्यक्ति कागज़ी कार्रवाई पूरी करने के बाद परमिट हासिल करके, सीमित मात्रा में शराब ख़रीद सकता है.
लेकिन इसका एक दूसरा पहलू ये भी है कि सरकार पिछले कई वर्षों से शराब की अवैध तस्करी से निबटने की कोशिशें करती रही है.
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प्रदेश के गृह मंत्री प्रदीप सिंह जाडेजा ने बीबीसी से कहा, "हमने शराबबंदी को ज़्यादा सख़्त किया है और इसके लिए क़ानून में संशोधन किया है. व्हाट्सऐप ग्रुप्स के ज़रिए जागरुगता बढ़ाने और नियमित मॉनिटरिंग के ज़रिए इसके अवैध कारोबार पर अंकुश लगाना हमारा उद्देश्य रहा है".
28 सितंबर को हुई कथित बलात्कार की इस घटना के दो दिन बाद इलाके में देसी शराब की अवैध भट्टी पर छापा मारा गया.
वायड विधानसभा से कांग्रेसी विधायक तवलसिंह जाला और परवाली के पूर्व विधायक महेंद्र सिंह बोरैया पीड़ित बच्ची के परिवार से मिलने हिम्मतनगर पहुँचने वाले थे.
करीब सात किलोमीटर पहले दोनों ने NH-8 के किनारे बसे एक गाँव में चल रही अवैध शराब की भट्टी पर खुद ही रेड डाली और पुलिस ने पहुँच कर ज़हरीली शराब बनाने वाली इस भट्टी को ज़ब्त किया. लेकिन जानकारों का कहना है कि पूरे राज्य में ऐसी भट्टियां सैकड़ों की तादाद में हैं.


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