'पीटने वाले कह रहे थे, गुजरात खाली करो'

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- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
अहमदाबाद और पटना के बीच चलने वाली अजीमाबाद एक्सप्रेस बुधवार करीब सवा दो घंटे की देरी से सुबह सात बजे पटना जंक्शन पहुंची.
इस ट्रेन के साधारण डब्बों से कई ऐसे यात्री भी उतरे जिनको गुजरात में बीते करीब एक हफ्ते से हिंदी भाषी लोगों के ख़िलाफ़ हो रहे हिंसा के कारण अचानक ही घर लौटना पड़ा.
इन लोगों ने गुजरात के अलग-अलग इलाकों से अहमदाबाद आकर अजीमाबाद एक्सप्रेस ट्रेन पकड़ी थी.
इनमें से कई को पटना से आगे भी अलग-अलग ज़िलों की ओर जाना था.
बीबीसी ने इस ट्रेन से उतरने वाले कुछ ऐसे लोगों से बात की जो या तो खुद हिंसा के शिकार हुए थे या जिन्होंने अपनी आखों के सामने मार-पीट होते देखा.
पढ़िए ऐसे लोगों की आप-बीती उनकी ही जुबानी:

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'बंगाली-आसामी को वे छोड़ देते थे'
मुजफ्फरपुर जिले के रहने वाले दिनेश कुमार गुजरात के बीयनडार इलाके में इंडियन ऑयल के एक रिफाइनरी में काम करते हैं.
वे बताते हैं, "मैं भागते हुए किसी तरह अपना सामान लेकर बिहार लौटा हूँ. चौदह महीने की बच्ची से दुष्कर्म के बाद से गुजरात में हल्ला-बवाल हुआ और वहां के लोगों ने बिहारियों को मारना-पीटना शुरू कर दिया."
"मेरे साथ और हमारे भाई-बंधु के साथ छह तारीख को मार-पीट हुई. हमें भी सर पर हल्का-फुल्का चोट लगा. बाकी लोगों को गहरी चोट आई."
"इसके बाद हम अपना रूम छोड़ के गिरते-पड़ते वहां से भाग गए. मारने वाले सबसे पता पूछ रहे थे."
"जो खुद को बंगाली और आसामी बता रहे रहे थे उनको वे छोड़ देते थे जबकि बिहारी और यूपी वालों को वे पीट रहे थे."
"इसकी वजह से हमलोगों को भाग-भाग के यहाँ आना पड़ा. वहां हमलोग बिहार के करीब पचास लोग साथ रहते थे."
"सब लोग वहां से कॉलोनी छोड़ कर चले गए. उनमें से अपने गाँव के सात-आठ आदमी आज लौटे हैं. बाकी लोगों को जहाँ नजदीकी लगा वहां चले गए."
"कोई मुंबई गया तो कोई कहीं और. आगे देखेंगे, वहां ठीक (माहौल ठीक) होगा तो जाएंगे नहीं तो नहीं जाएंगे."
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'लोकल लोग डंडे और तलवार से हमला कर रहे थे'
बेगूसराय ज़िले के मटिहानी प्रखंड के रहने वाले रणजीत सिंह दो दिन पहले तक मणिनगर के यशोदानगर इलाके में रहते थे.
वे बताते हैं, "मेरे साथ तो कोई घटना नहीं हुई लेकिन मैंने खुद देखा कि लोकल लोग भैयाजी लोगों के साथ मार-पीट कर रहे थे."
"मैं वहां आठ साल से रह रहा हूँ और मुझे गुजराती आती है. अब किसी के सर पर तो लिखा नहीं है कि वह भैयाजी है."
"भाषा, पहनावा से लोगों की पहचान कर या लोगों को अकेले में पाकर उनके साथ मार-पीट की गई. गुजरात खाली करने की बात कहते हुए उनको पीटा गया."
"कालूपुर स्टेशन पर मैंने लोकल लोगों को डंडे और तलवार से हमला करते देखा. दूसरे लोग सर पर बोरी-अटैची रख दौड़ते हुए ट्रेन पकड़ रहे थे."
"मैंने ये सब प्लेटफार्म के ऊपर ओवर ब्रिज से देखा. कोई लोकल लोग देखते तो मैं ही गुजराती में पूछ लेता कि सू छे."
"ऐसा करने पर उन्होंने मुझे अपना भाई-बहन समझ कर कुछ नहीं किया. जो हिंदी या भोजपुरी बोलने लगे वो पकड़ में आ गए."

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'ऑटो वाले ने समझाया कि यूपी-बिहार का नाम नहीं लेना'
मोहम्मद इसराफिल मूल रूप से सहरसा ज़िले के पचहारी गाँव से हैं और अहमदाबाद से करीब बीस किलोमीटर दूर गयासपुर में निर्माण क्षेत्र में मजदूर के रूप में काम करते हैं. वे अपने गाँव के चार लोगों के साथ वापस लौटे हैं.
उन्होंने बताया, "मैं कुछ महीने पहले ही घर पर ईद मनाकर काम पर लौटा था. ऐसे मैं आठ-दस महीने पर घर वापस आता था लेकिन अभी डर कर तीन महीने में ही लौट रहा हूँ."
"जहाँ मैं काम कर रहा था वहां प्रोजेक्ट और छह-सात महीने चलता. जब तक माहौल ठंढा नहीं हो जाता तब तक को नहीं लौटेंगे और लौटने के बाद भी डर बना रहेगा."
"हिम्मतनगर के पास टाटा कंपनी के मेट्रो प्रोजेक्ट में काम करने वाले खगड़िया जिले के मेरे साथियों ने छह तारीख़ को बताया कि उनके यहाँ रात में मारपीट की गई."
"लोकल लोगों ने पहले कंपनी में घुसने की कोशिश की. गार्ड ने उनको रोक दिया तो फिर उन्होंने लेबर कॉलोनी में घुस कर मार-पीट की."
"हम लोग जब लौट रहे तो ऑटो वाले ने बोला कि यहाँ पर मारपीट हुआ है. तुम लोग यूपी-बिहार का नाम नहीं लेना, नहीं तो तुमलोगों के साथ भी मारपीट और छिन-छोर करेगा. ऑटो वाले ने समझाया कि कोई पता पूछे तो कोलकाता बताना."


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