एनआरसी: पहचान के लिए असम से आकर झारखंड में भटक रहे लोग

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- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, रांची (झारखंड) से, बीबीसी हिंदी के लिए
राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के मौजूदा ड्राफ़्ट के मुताबिक़ 39 साल के रविकांत दत्ता असम के निवासी हैं, लेकिन उनकी माँ सुजला देवी दत्ता भारत की नागरिक नहीं हैं.
अगर 23 नवंबर तक वो अपनी 'पहचान' साबित नहीं कर सकीं, तो उन्हें देश छोड़ना पड़ सकता है.
और उनकी 'पहचान' की तलाश इन दिनों झारखंड में की जा रही है.
झारखंड सरकार ने उन्हें ज़मीन के कागज़ात (साल 1926 में हुए सर्वे सेटलमेंट के कागज़ात) दिए हैं. इसके बावजूद उनका नाम एनआरसी में नहीं जोड़ा जा सका है.
कुल 20 लोगों के उनके परिवार के कुछ सदस्यों के नाम एनआरसी की सूची में नहीं हैं.
इस कारण पूरा परिवार परेशान है. दुर्गा पूजा उत्सव के माहौल में भी वो खुलकर जश्न नहीं मना पा रहे हैं.

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रविकांत दत्ता असम के बोंगाईगाँव ज़िले के गारुभाषा गाँव में रहते हैं. यहीं उनका जन्म भी हुआ था.
लेकिन उनके पुरखे झारखंड के साहिबगंज ज़िले के बोरियो कस्बे में रहते थे.
काम की तलाश में वो सालों पहले असम चले गए और फिर वहीं के होकर रह गए.
असम में उनका पक्का मकान है, बिज़नेस है और नाते-रिश्तेदार भी हैं. हालांकि उनके कुछ संबंधी आज भी बोरियो में ही रहते हैं.
बेटा इंडियन, माँ विदेशी!
रविकांत दत्ता कहते हैं, "यह कैसा क़ानून है जो बेटे को भारतीय लेकिन माँ को विदेशी मानता है. हम तो इंडियन हैं. झारखंड के हैं. असम के वोटर हैं. फिर भी मेरी माँ का नाम एनआरसी में शामिल नहीं है."
"हमने असम में झारखंड सरकार द्वारा दिया गया लैंड डॉक्युमेंट और वंशावली का कागज जमा कराया है."

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रविकांत बताते हैं, "मेरे बड़े पापा खुदीराम दत्ता का साल 1971 में असम में खोला गया पोस्ट ऑफ़िस खाता भी है. उसको भी जमा कराया है लेकिन सरकार ने मेरी माँ और घर के कुछ और लोगों के नाम एनआरसी में नहीं जोड़े."
"सरकार ने ठान लिया है कि किसी तरह 40-50 लाख लोगों को विदेशी बताकर असम से निकाल दिया जाए."
"इन लोगों ने पहले कहा कि साल 1971 और 1966 के वोटर लिस्ट और एलआईसी के कागजात में अगर हमारा पता भारत का होगा, तो उसे मान लेंगे."
वो सवाल करते हैं, "हम लोगों ने वोटर लिस्ट जमा करा दिया. अब सरकार कह रही है कि वो ये डॉक्युमेंट नहीं मानेगी. अब बताइए, हम लोग क्या करें. कहा जायें?"
रविकांत दत्ता अकेले ऐसे शख़्स नहीं हैं, जो एनआरसी की लिस्ट को लेकर परेशानी में हैं.

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हज़ारों लोग परेशान
हज़ारों लोगों ने अपनी ज़मीन से जुड़े कागजात और दूसरे दस्तावेज़ों के लिए झारखंड के विभिन्न ज़िलों में संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों से संपर्क किया है.
ऐसे ही एक शख़्स हैं पंकज मंडल जो गोड्डा ज़िले की दामा पंचायत के कुंडा करणपुर गाँव के निवासी हैं.
उनकी बुआ झालो देवी असम के कोकराझार ज़िले के गोसाईगाँव इलाके में रहती हैं.
पंकज मंडल का कहना है, "मेरे दादाजी असम काम करने गए थे. तब मेरी बुआ भी उनके साथ चली गईं. उनकी शादी भी वहीं हुई. वो अपने बाल-बच्चों के साथ वहाँ रहती हैं."
"लेकिन, उनका नाम एनआरसी में नहीं है. उनकी देवरानी का नाम भी लिस्ट से गायब है. हम लोगों ने गोड्डा डीसी ऑफ़िस से उनकी ज़मीन की जमाबंदी का कागज़ लेकर असम भेजा है, ताकि उनका नाम एनआरसी में आ जाए."

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कहाँ से लाएं वोटर लिस्ट
झालो देवी के बेटे अशोक मंडल ने बताया कि गोड्डा (झारखंड) से हासिल ज़मीन का कागज़ जमा कराने के बावजूद उनकी माँ और चाची का नाम एनआरसी में नहीं जोड़ा गया.
उनसे साल 1966 या 1971 का वोटर लिस्ट मंगवाने के लिए कहा गया है. वो फिलहाल उपलब्ध नहीं है.
इस मामले में झारखंड सरकार के भूमि सुधार व राजस्व मंत्री अमर कुमार बाउरी ने बीबीसी को बताया, "हमारे पास कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है, जिससे हम आपको ये बता सकें कि एनआरसी से बाहर हो चुके कितने लोगों ने झारखंड में अपने प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया है."
"हमें कई जिलों से सूचनाएं मिल रही हैं कि अफसरों ने ऐसे लोगों को ज़रूरी कागज़ात उपलब्ध करा दिए हैं. बाकी लोगों को भी हम उनके कागज़ात दिलाएंगे. झारखंड से माइग्रेट हुए लोगों को ज़रूरी कागज़ात उपलब्ध कराने से हमारी सरकार कभी पीछे नहीं हटेगी."

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रिकॉर्ड रूम में रखे हैं कागज़ात
असम जाकर बसने वाले लोगों में अधिकतर संख्या संथाली आदिवासियों या संथाल परगना इलाक़े के गैर-आदिवासियों की थी.
ऐसे कई लोगों ने गोड्डा, दुमका, साहिबगंज और जामताड़ा ज़िलों में अपनी ज़मीन के कागज़ातों के लिए आवेदन दिए हैं.
ऐसे लोगों के ज़मीन संबंधी कागज़ात विभिन्न ज़िलों के रिकार्ड रूम में रखे गए हैं.
हालांकि, काफ़ी पुराने हो जाने के कारण उनका रख-रखाव मुश्किल होता जा रहा है.
सैकड़ों आवेदन मिले
गोड्डा समाहरणालय (कलक्ट्रेट) के ज़िला अभिलेखपाल (रिकार्डकीपर) मदन मोहन मिश्र ने बताया कि सिर्फ़ गोड्डा ज़िले में ऐसे सैकड़ों लोगों ने संपर्क किया है, जिनके नाम एनआरसी में नहीं आ सके हैं.
उनके पूर्वज क़रीब डेढ़ सौ साल पहले काम की तलाश में असम चले गए थे.
मदन मोहन मिश्र कहते हैं, "हमने कई लोगों के ज़मीन के कागज़ात और कुछ के वोटर लिस्ट की अभिप्रमाणित नकल (सर्टिफ़ाइड कॉपी) उन्हें उपलब्ध करा दी है."
"इसके बावजूद सैकड़ों लोग अभी चक्कर काट रहे हैं. उनके कागज़ात नहीं मिल सके हैं. हम लोगों ने उन्हें 1926 में हुए ज़मीन के सर्वे सेटलमेंट का कागज़ दिया है लेकिन साल 1966 और 1971 के वोटर लिस्ट पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं. ऐसे लोगों को दुमका जाकर वोटर लिस्ट तलाशने की सलाह दी गई है."

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वे घुसपैठिए कहे जाएंगे
मदन मोहन मिश्र बताते हैं, "मुझे दुख है कि अगर हम लोग उन्हें कागज़ उपलब्ध नहीं करा पाये, तो वो बांग्लादेशी करार दे दिए जाएंगे. इनमें आदिवासी, गैर-आदिवासी, हिंदू-मुसलमान सब लोग शामिल हैं."
"इनमें से कोई टीचर है, कोई गो-पालक है, कोई मेडिकल के धंधे में हैं या फिर कोई अपना बिज़नेस करता है. इनके सगे-संबंधी रोज़ मेरे पास आ रहे हैं. इन्हें कागज़ नहीं मिला, तो असम सरकार उन्हें घुसपैठिया बता देगी."
दरअसल, ब्रिटिश हुक़ूमत के दौरान झारखंड के संथाल परगना, सिंहभूम और छोटानागपुर इलाक़े के आदिवासियों को तत्कालीन सरकार असम लेकर गई, ताकि वहाँ चाय के बगानों में इनसे मज़दूरी कराई जा सके.
इनके अलावा झारखंड, छत्तीसगढ़, बंगाल, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के खेतिहर मज़दूरों की भी बड़ी संख्या असम बुलाई गई.
बाद के दिनों में ये लोग वहीं बस गए. इनमें से अधिकतर लोगों के नाम एनआरसी में शामिल नहीं हैं.

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