नज़रिया: क्या ये अपराध और अपराधियों का उत्सव काल है?

हिंसा
    • Author, सुधीश पचौरी
    • पदनाम, वरिष्ठ लेखक, बीबीसी हिंदी के लिए

एक औरत डूब रही है, दो लोग बचा रहे हैं फिर उसका रेप कर रहे हैं...

दूसरे वीडियो बना रहे हैं. मित्र सोशल मीडिया में शेयर कर वायरल कर रहे हैं.

यह है समकालीन नए अत्याचारियों की 'वीडियो वायरल व्याधि'!

इन दिनों रेपिस्ट, हत्यारे और दंगाई सब हीरो बनने पर उतारू हैं, ये नए नायक हैं. नए यथार्थ के नए हीरो!

उक्त रेपकांड के नायकों को देखिएः पहले 'रक्षक' बने फिर वे ही 'भक्षक' बन गए और फिर वे ही तमाशाई बन गए.

फिर वे और उनके मित्र और उनके भी मित्र मंडल इस बर्बर रेप के तमाशाई बन गए!

यह एकदम नया 'आखेट' है, शिकार करने का नया तरीका है, जिसे बचाते हैं उसे ही रेप करते हैं.

इन दिनों वहशी लंपटता भी कृपालु होकर आती है.

यह कैसी रक्षणशीलता है कि जिसे बचाया उसे ही अपनी हवस का शिकार बनाया, यह कौन सी करुणा है जो भक्षित करने के लिए किसी की रक्षा करती है.

औरत न हुई मछली हो गई कि जाल डाला, मछली फांसी और भूनकर खा गए!

खाने का वीडियो बनाया ताकि सनद रहे और कोई न कहे कि मछली असली नहीं थी!

rape

राक्षसों की संस्कृति

ये है नए दरिंदों की दीदादिलेरी!

नई शिकार कला, नया आखेट, इसके जनक नए आखेटक हैं जो पिछले कुछ बरसों के दौरान किसी 'व्याध' की तरह प्रकट हुए हैं.

डायन भी सात घर छोड़कर शिकार करती है, लेकिन नए दस्युओं से कुछ नहीं बचने वाला.

दया, ममता, करुणा, कमजोर की रक्षा करने से जो सच्चा वीरत्व प्राप्त होता था उसकी अब किसी को ज़रूरत नहीं.

सावधान! नए राक्षस आ चुके हैं. कभी, राक्षसों की संस्कृति 'रक्ष-संस्कृति' कहलाती थी.

'रक्ष' का मतलब था रक्षा करना. लेकिन इन नए राक्षसों ने तो राक्षसों तक को बदनाम कर दिया.

वे 'रक्ष' की जगह 'भक्ष' संस्कृति के 'भाक्षस' हैं यानी नए किस्म के 'राक्षस' हैं!

वे उसे डूबने भी दे सकते थे, लेकिन एक औरत को कैसे डूबने देते?

कुछ दया भाव उमड़ा होगा जो उसके बचाते ही वासना में बदल गया और रेप कर दिया जिसे वीडियो बनाकर 'रेप परफॉरमेंस' में बदल दिया गया.

हाय! रेपिस्टों ने रेप को भी एक एहसान और एक 'परफॉरमेंस' की तरह बना दिया.

हिंसा

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रियल टाइम में अनकट शूट

'लीला' बना दिया. 'शो' बना दिया. तमाशा बना दिया और उसके तमाशाई भी जुट गए.

अब दुनिया भर की 'पॉर्न साइटों' और 'रेप साइटों' के 'हॉल आफ फे़म' में इसे भी जगह मिल जाएगी.

और क्या चाहिए? मोबाइल क्रांति इसीलिए तो हुई है. आज सब वीडियोग्राफ़र हैं. सब कैमरामैन हैं.

लिंचिंग हो, बर्बर हत्या हो या रेप हो, रोकने की जगह उनको रियल टाइम में अनकट शूट करना और दिखाना ही नई कला है.

फे़सबुक है, ट्विटर है, व्हॉटसऐप है, फ्रेंड्स लिस्ट हैं, मित्र मंडली है.

'लाइसेंस टू किल' से लेकर...

मित्र मंडली के हर मित्र की मंडलियां हैं. उनके बीच एक रेप-वीडियो 'रेप शो' है.

एक अखिल भारतीय लंपटता समारोह मना रही है. यह 'लाइसेंस टू किल' से लेकर 'लाइसेंस टू रेप' का ज़माना है.

अब तक सिर्फ़ जेम्स बॉण्ड का नाम 'लाइसेंस टू किल' था.

अब इन नए 'रेप-बॉण्डों का नाम 'लाइसंस टू रेप' है!

ये नए रेप-हीरो हैं. लाख क़ानून बना लें. सख्त सज़ा की तजबीज कर दें. फिर भी रेप क्यों नहीं रुक रहे?

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सोशल मीडिया पर वायरल

इसलिए कि सोशल मीडिया पर वायरल होकर हर रेप वीडियो नया 'रेप हीरो' बनाता है और आज के लपंट-समाज के बीच उन्हीं का पव्वा पुजता है.

रेपिस्ट को अब रेप से संतोष नहीं होता. उसकी रेप-लीला जब तक वायरल होकर लाखों दर्शक और लाखों लाइक्स न ले ले, तब तक कैसा रेप?

रेप अब एक बड़ा शो है- बड़ी 'परफॉरमेंस' है! लीला है!!

एक घृणा वीर एक निरीह मुसलमान को एक कुल्हाड़ी से काटता जाता है. दोस्त वीडियो बनाता है.

काटना छोड़ कैमरे के आगे आकर वह अपनी 'वीरता' का बखान करता है और फिर काटता जाता है.

इसका वीडियो वायरल होता है. मीडिया हल्ला करता है तो जेल जाता है.

लेकिन ये क्या कि एक उत्सव के दौरान निकलती झांकियों में उस हत्यारे जैसे चेहरे वाले एक डुप्लीकेट को रथ के सिंहासन पर बिठाया जाता है.

पुलिस इस झांकी को भी अलाउ करती है. फिर एक दिन खबर टूटती है कि उसे एमपी का चुनाव लड़ाया जा सकता है.

हिंसा

पुलिस देखती रहती है...

एक दिन वह जनप्रतिनिधि भी हो सकता है.

दिन दहाड़े एक युवा भीड़ एक दाढ़ी वाले को एक खेत में घेर कर पीट रही है.

पुलिस देखती रहती है. वह शायद वहीं मर जाता है. वीडियो बनता है. वायरल होता है.

कुछ दिन बाद एक लिंचर कहता है कि उसने पानी मांगा मैंने नहीं दिया.

सोशल मीडिया में ऐसा हर अत्याचार वायरल होकर एक 'शो' तब्दील हो जाता है.

उसको 'लाइक' करने वाले जुट जाते हैं.

हत्या करके या रेप करके वीडियो बनाकर, उसे सोशल मीडिया पर वायरल करने से जघन्य हिंसा या रेप भी एक तमाशे में बदल जाता है.

रेप

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रेपिस्ट को या हिंसक को अब न किसी की शर्म है न किसी का डर है.

आप कैसी भी बर्बरता करें, कैसा भी अतिचार करें, बस उसका वीडियो बना दें और इस तरह उसे एक तमाशे में बदल दें.

बदल दें. तमाशा बनते ही हर हत्या, हर खूनखराबा, हर रेप या गेंग रेप अपने 'नैतिक' या 'सामाजिक अर्थ' (सोशल मीनिंग) खो देगा.

उलटे वह 'मजेदार' हो उठेगा. उसको भी लाइक करने वाले जुट जाएंगे.

अत्याचारी के भी प्रशंसक बन उठेंगे. लोग उसे शाबासी देंगे.

उसके मुकदमे के लिए पैसा इकठ्ठा करने लगेंगे.

उसके भी मानवाधिकार की मांग की जाने लगेगी.

और इस तरह एक दिन हर अत्याचारी सहनीय और पूजनीय बन जाएगा.

मी टू

'अति चंचल यथार्थ'

इन दिनों हम तरह-तरह के अत्याचारों के 'रंगीन तमाशों' में, 'स्पेक्टेकलों' में रहते हैं.

हर अत्याचार तमाशा बनते ही अपने कड़वे तीखे संदर्भ खो देता है.

'अति चंचल यथार्थ' (हायपर रीयल) में दाखिल हो कर वह एक फ़ास्ट-फॉरवर्ड सीन भर रह जाता है.

बार-बार दिखाया जाकर उसका असर कमतर हो जाता है और अंततः असली घटना ही गायब हो जाती है.

वीडियो के बार बार रिपीट किए जाने से दर्शक ऊब जाता है. हमदर्दी मर जाती है.

हर तमाशा, हर स्पेक्टकिल हमें संवेदनहीन बनाता है.

हम ऐसी बर्बरता को देख-देख उसके आदी हो जाते हैं.

वही जीवन का 'न्यू नॉर्मल' यानी 'नया तरीका' बन जाता है.

आजकल हम ऐसे ही नए माहौल में यानी 'नए नॉर्मल्स' में रहते हैं.

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)

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