अहिंसा दिवस पर 'जय जवान जय किसान' करते किसानों पर हिंसा की आंखों देखी

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- Author, विकास त्रिवेदी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
2 अक्टूबर. जब पूरा देश अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी और 'जय जवान, जय किसान' का नारा देने वाले लाल बहादुर शास्त्री का जन्मदिन मना रहा है, तब दिल्ली से सटे यूपी बॉर्डर पर अपनी मांगों के साथ आए हज़ारों किसानों पर पुलिस रबर की गोलियां, आंसू गैस के गोले चला रही थी.
कई बार सूखा झेल चुके इन किसानों पर पानी की तेज़ बौछार का इस्तेमाल किया गया ताकि ये लोग दिल्ली में न घुस सकें.
अपने साथियों के पैरों और हाथों से बहते खून को दिखाते ये किसान कहते हैं, ''चुनाव के वक़्त कर्ज़माफ़ी का वादा करते हैं, लेकिन बाद में भूल जाते हैं. किसानों के साथ मज़ाक बना रखा है. साढ़े चार साल हो गए. किसानों पर क़र्ज़ सरकार की ग़लत नीतियों की वजह से है. झूठ बोल के वोट हासिल किए. अगले चुनाव में कतई स्वीकार नहीं करेंगे. ये हम पर गोलियां चला रहे हैं.''
भारतीय किसान यूनियन के झंडे तले ये किसान अलग-अलग राज्यों से जुटे. यूपी बॉर्डर पर दिल्ली में घुसने का इंतज़ार करते ट्रैक्टरों में बैठी महिलाएं अपनी-अपनी भाषा में लगभग एक ही बात कहती हैं- क़र्ज़माफ़ी, बिजली का बिल, गन्ने का भुगतान और किए वादों को पूरा करो.
किसान यूनियन के राकेश टिकैत कहते हैं, ''लाठी, पानी और आंसू गैस के गोले आंदोलन के प्रसाद हैं. किसी-किसी को नसीब होए है ये.''
जब ये हज़़ारों किसान दिल्ली के बॉर्डर पर रुके हुए थे, तब किसान यूनियन का एक प्रतिनिधि मंडल गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिल रहा था. ख़बर है कि सरकार और किसानों के बीच अहम मांगों को लेकर सहमति बन गई है. लेकिन एयरकंडीशन कमरों में हुई इन बैठकों की ख़बर सड़क पर बैठे हज़ारों किसानों को नहीं है. वो मुझ समेत कई पत्रकारों से उम्मीद भरी नज़रों से सवाल पूछते हैं- दिल्ली में कोई बात बनी कि नहीं?

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किसानों की अहम मांगें क्या हैं?
इस रैली में आप किसी भी राज्य से आए किसान से उनकी मांगों के बारे में पूछें तो स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों का ज़िक्र ज़रूर करते हैं. अब से 14 बरस पहले 2004 में स्वामीनाथन की अध्यक्षता में 'नेशनल कमिशन ऑन फ़ॉरमर्स' बना था.
इस आयोग ने किसानों की बेहतरी के लिए कुछ सिफारिशें की थीं, जिनका ज़िक्र संभवत: सिर्फ़ चुनावी मंचों पर हुआ. फ़सल उगाने वाले किसान के लिए ज़मीन पर हालात नहीं बदले.

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ये हैं स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशें...
- कम दाम में अच्छी क्वालिटी के बीज
- किसानों के लिए ज्ञान चौपाल
- प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए कृषि जोखिम फंड
- बेकार पड़ी ज़मीन को भूमिहीन किसानों में बांटना
- वनभूमि को कृषि से इतर कामों के लिए कॉरपोरेट को न दें
- सबको मिले फसल बीमा की सुविधा
- एग्रिकल्चर रिस्क फंड बनाया जाए

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'किसी चैनल ने ना ली हमारी ख़बर'
स्वामीनाथन आयोग की ये सिफारिशें अब तक सरकारी फाइलों में ही सीमित हैं. एक पांच सितारा होटल के सामने सड़क पर फुटओवर ब्रिज की परछाईं में किसानों की भीड़ सुस्ता रही है.
सरकार ने किसानों के लिए किसान चैनल भी शुरू किया था. मैंने कई किसानों से ये सवाल किया कि किसान चैनल से कभी कोई मदद नहीं मिली? ज़्यादातर इस सवाल पर हँसते और गुस्साए हुए बोले, 'हां बड़ी मदद हो रई है चैनल से... 10 दिन से चल रहे हैं, तब तो किसी चैनल ने ना ली हमारी ख़बर.'

प्रदर्शन में बैठे राकेश टिकैत कहते हैं, ''गन्ना भुगतान को 14 दिन में करने का वादा था. आठ महीने हो गए, कुछ न हुआ. 10 साल पुराने ट्रैक्टर बंद कर दिए हैं. देश के संगठन अलग हो सकते हैं, लेकिन सारे किसानों के मुद्दे एक ही हैं. अभी किसानों का दर्द है. भारत सरकार डॉक्टर है. इलाज के लिए आए हैं. दवाई लेने आए हैं, लेकिन दवाई नहीं मिल रही है. हमारी मांगें केंद्र सरकार से ज़्यादा है. आश्वासन चार साल से मिल रहे हैं, लेकिन काम नहीं हो रहा. सरकार कोई भी हो, ढंग का काम नहीं हो रहा.''

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किसानों पर रबड़ बुलेट, आंसू गैस....पर क्यों?
इन किसानों को रोकने के लिए क़रीब एक हज़ार सुरक्षाबल तैनात किए गए हैं. हालांकि किसानों और सुरक्षाबलों की संख्या को लेकर दोनों ही पक्ष कोई सही तस्वीर सामने नहीं रखते हैं.
राकेश टिकैत कहते हैं, ''संख्या का क्या है जी. हम कोई गिनने थोड़ी जा रहे हैं.'' सुरक्षाबलों की सही संख्या बॉर्डर पर बताने से ज़्यादातर अधिकारी बचते दिखे.
लेकिन ये संख्या इतनी तो थी कि कुछ जगहों पर किसान कम और रेपिड एक्शन फोर्स या पुलिस के लोग ज़्यादा नज़र आ रहे थे.
किसानों की इस रैली का मिज़ाज सुबह पुलिस की फायरिंग के बाद कुछ बदला. जो किसान अब तक अपनी मांगों को लेकर विरोध कर रहे थे, अब उनकी आवाज़ और बातों में आक्रोश था.
मीडिया के कैमरों को देखते हुए वो ये कहने से ना चूकते- ये नेता हमारी बातें कर-करके दिल्ली पहुंच लेते हैं, लेकिन हमारी मांगों को सुनने के लिए हमें दिल्ली में नहीं आने देते, उल्टा हमारा ही खून बहाते हैं.
मेरठ के एडीजी (ज़ोन) प्रशांत कुमार बताते हैं, ''यूपी पुलिस की ओर से कोई फायरिंग नहीं हुई है. दिल्ली पुलिस ने कुछ आंसू गैस के गोले छोड़े हैं, रबड़ बुलेट फायर किए गए हैं. कुछ किसानों का कहना है कि फायरिंग की गई है, जांच के बाद चीज़ें बेहतर तरीके से पता चलेंगी. किसानों के आरोपों की जांच की जाएगी.''
जिन किसानों के पैरों में चोट आई है, वो अपने ज़ख़्मों के साथ उस फ्लाईओवर के नीचे लेटे हुए हैं, जो यूपी और दिल्ली को बांटती है. पुलिस की ओर से इलाज के लिए उठने की बात कहने पर किसान पुलिस पर गरजते नज़र आते हैं.
हालांकि ज़मीन पर अन्न उगाने वाले किसानों की इस लड़ाई में बुनियादी फर्क पुलिस बैरिकेट्स के दोनों तरफ़ देखा जा सकता है. जहां एक तरफ़ सुबह से ड्यूटी कर रहे पुलिसवाले खाने की लाइन में लगे नज़र आते हैं और दूसरी तरफ़ टुकड़ियों में बैठे किसान अपने-अपने बस्ते से रोटी आचार निकालकर खा रहे थे.

किसानों की रैली पर सियासी प्रतिक्रियाएं...
यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ किसानों की रैली में हिंसा के कुछ घंटे बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं.
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केंद्र और यूपी सरकार की उपलब्धियों को गिनाते हुए वो कहते हैं, ''हमने क़र्ज़माफ़ी की. मोदी जी के नेतृत्व में काफी काम हुआ है. यूरिया की कालाबाज़ारी रुकी है. किसानों के लिए सरकार काफी गंभीर है. सालों से उपेक्षित पड़े किसानों को हमने राहत देने की कोशिश की है. किसानों को भारी राहत मिली है.''
कांग्रेस के रणदीप सिंह सुरजेवाला ने ट्वीट किया, ''लाठी गोली की है भरमार. किसानों से बर्बरता पूर्ण व्यवहार, बदलेंगी ऐसी मोदी सरकार!''
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राहुल गांधी ने ट्वीट किया, ''अब किसान देश की राजधानी आकर अपना दर्द भी नहीं सुना सकते.''
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इस ख़बर को लिखे जाने तक कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह की तरफ से ट्विटर पर कोई ट्वीट नहीं किया गया है.
हालांकि गांधी जयंती और लाल बहादुर शास्त्री के जन्मदिन पर 'जय जवान, जय किसान' के ट्वीट कृषि मंत्री की फीड में देखे जा सकते हैं.

किसानों का गुस्सा...किसके ख़िलाफ़?
70 की उम्र पार कर चुकीं हरियाणा की सोनबरी किसान यूनियन से हैं. वो कहती हैं, ''म्हारा कई महीने का पेमेंट रुक रहा है. बिजली का बिल घटाने की बजाय बढ़ा दिया. हम हटेंगे नहीं. दिल्ली जाए बिना मानेंगे नहीं. हर साल छूट मिलती थी, इस साल छूट भी नहीं मिली.''
किसान रैली में आए भूपेंद्र प्रधान कहते हैं, ''झूठ बोलने के अलावा कोई काम नहीं है. किसानों का शोषण करते हैं. हम इस सरकार को बिल्कुल पसंद नहीं करते. हम तो सरकार के भंडे कर देंगे.''
पंजाब से आए सुरजीत सिंह कहते हैं, ''मोदी सरकार ने जो वादे किए थे, वो पूरा नहीं किया. कर्जमाफी का वादा किया था, वो पूरा नहीं हुआ, पंजाब में हर रोज़ पांच किसानों की मौत होती है. गन्ना के बकाया तक नहीं चुकाया.''

'अपना हक लेकर रहेंगे' नारा लगाते इन किसानों की शिकायतों का अंबार रुकता नहीं है. जिला मुज़फ्फरनगर से आए मंजोत सिंह कहते हैं, ''ऐसी लुटाई वाली सरकार आज़ादी के बाद कभी नहीं आई. बिजली के बिल इतने बढ़ा दिए. यूपी का जो मुख्यमंत्री है, इनने ज़्यादा थका लिया. मोदी-योगी की जोड़ी है. बेइमान इकट्ठे हो रहे हैं.''
पास खड़े कई किसान भी कहते हैं, ''शांतिपूर्वक अपनी बात रखने आए थे. रबड़ की गोलियां चला रहे हैं, पानी की बौछार कर रहे हैं. अरे सीने पे गोली चला रहे हैं. बताओ. अपनी गाल बजाई में लगे रहे हैं. बीते चुनाव में इसी मोदी को वोट दिया था जिनको भाजपा भी लिखना नहीं आता था, उनको वोट दे देकर जिताया. अब आने दो 2019, सबक सिखा देंगे. इनका ऐसा बिगुल बजाएंगे कि याद रखेंगे.''

चार साल पहले देश में गांधी जयंती को स्वच्छ भारत अभियान शुरू हुआ था. चार साल बाद इस अभियान की एक तस्वीर यूपी-दिल्ली बॉर्डर पर किसान रैली से लौटते हुए मिलती है.
जहां स्वच्छ भारत अभियान स्टिकर के आस-पास किसानों के झंडे गिरे पड़े हुए हैं और पानी के टैंक से पानी पीते पुलिसवाले कहते हैं- अरे हम भी ड्यूटी कर रहे हैं और ये भी, कोई दुश्मन थोड़ी हैं. रात को हम भी घर चले जाएंगे और ये भी.
इसके बाद किसान नेताओं का और मैं इस पुलिसवाले का आश्वासन लेकर लौटने की ओर बढ़ चलते हैं.
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