पंजाब में अफ़ीम को लेकर हंगामा है क्यों बरपा!

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- Author, अरविंद छाबड़ा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पंजाब में अफ़ीम की खेती और बिक्री की मांग धीरे-धीरे ज़ोर पकड़ रही है.
पटियाला से आम आदमी पार्टी के लोकसभा सांसद डॉक्टर धर्मवीर गांधी ने इसे लेकर सबसे पहले आवाज़ उठाई और फिर किसान यूनियनों ने भी इसका समर्थन किया.
कुछ दिनों के लिए मामला शांत हुआ लेकिन बाद में पंजाब सरकार में मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ने भी डॉक्टर गांधी की मांग का समर्थन किया.
अपने बेबाक बयानों के लिए जाने वाले सिद्धू ने कहा कि अफ़ीम हेरोइन से बेहतर है और उनके ताऊ जी भी इसका दवाई की तरह सेवन करते थे और उनकी उम्र भी काफ़ी लंबी रही.
उधर अहमदगढ़ मंडी के किसानों ने पिछले साल छप्पार मेला के दौरान अफ़ीम के बीज खेतों में डालकर अपनी मंशा भी साफ़ कर दी.
इस मुद्दे पर बीबीसी पंजाबी से बात करते हुए डॉक्टर धर्मवीर ने कहा कि सरकार को एक नीति बनाते हुए पंजाब के पारंपरिक पदार्थों, जिनमें अफ़ीम और भुक्की शामिल हैं, को कानूनी रूप से मान्यता देनी चाहिए.
वे कहते हैं कि पंजाब सरकार को मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों की तरह नीति बनानी चाहिए ताकि अफ़ीम और भुक्की की बिक्री सरकारी निगरानी में हो.

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पंजाब में नशे यानी ड्रग्ज़ की समस्या अत्यंत गंभीर मानी जाती है. डॉक्टर धर्मवीर गांधी कहते हैं, ''सरकार ने नशा ख़त्म करने के लिए कई कड़े कानून बनाने के साथ-साथ कई कदम उठाए, पर नशे की समस्या अभी भी ज्यों की त्यों है.''
''कई देशों ने समय के साथ अपनी नीतियों को बदला है, और गांजे को वैध करार किया है और वे सफल भी हुए हैं.''
पंजाब में आज भी अफ़ीम मिलती है लेकिन वो दवा माफ़िया के नियंत्रण में हैं. उन्होंने तर्क दिया कि प्रति 300 रुपये प्रति किलोग्राम वाली भुक्की 5000 रुपये में मिलती है और वो भी मिलावट वाली. सरकार को समय के अनुसार खुद को बदलना चाहिए. लगभग 20,000 लोग जिनसे मामूली नशीली पदार्थ मिले हैं, वे जेलों में बंद हैं.
डॉ गांधी ने तर्क दिया कि वे पहले ही संसद में अफ़ीम की बिक्री और खेती के बारे में बिल ला चुके हैं. इसके अलावा उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से भी मुलाकात की है. लेकिन दुर्भाग्यवश पंजाब सरकार ने इस मांग पर कोई जवाब नहीं दिया है.

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डॉक्टर गांधी ने कहा कि पिछले महीनों में उन्होंने इसके बारे में शिक्षित करने के लिए छह रैलियों का भी आयोजन किया है.
उन्होंने अपनी बातचीत में नवजोत सिंह सिद्धू की प्रशंसा की और कहा कि उन्होंने अफ़ीम और भुक्की के बारे में बात करके बुद्धिमानी की बात की है.
पंजाब सरकार के तर्क
पंजाब सरकार का कहना है कि इस मुद्दे पर एक ठोस नीति बनाने की आवश्यकता है और उन्होंने इस बारे में केंद्र सरकार से आग्रह भी किया है.
पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के मीडिया सलाहकार रवीन ठुकराल ने कहा, "मुख्यमंत्री का कहना है कि देश के कुछ प्रांतों में अफ़ीम की पैदावार का प्रावधान है जबकि बाक़ी राज्यों में इस पर प्रतिबंध है. राज्य से बात करके केंद्र को इस पर एक पुख्ता नीति बनानी चाहिए."
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दूसरी ओर, शिरोमणि अकाली दल के प्रवक्ता डॉ दलजीत सिंह चीमा ने कहा कि पंजाब में अफ़ीम की खेती और बिक्री नशे की समस्या को नियंत्रित करने का एक निश्चित समाधान नहीं है.
बीबीसी पंजाबी से बात करते हुए चीमा ने कहा कि यदि यह सरकार इसे खोलती है तो यह क़दम राज्य के लोगों को अंधेरे में धकेलने जैसा होगा.
उन्होंने कहा ''यदि सरकार सोचती है कि दवा की समस्या का समाधान केवल अफ़ीम की खेती को खोलना है, तो सरकार को जनता के सामने इस पर स्पष्ट नीति लानी चाहिए.''
पंजाब में अफ़ीम की खेती कब अवैध थी?
चंडीगढ़ में पीजीआई के डी-ऐडिक्शन सेंटर के डॉक्टर देबाशीष बासु कहते हैं कि 1985 तक अफ़ीम की खेती पंजाब में होती थी. फिर 1985 में एनडीपीएस अधिनियम आया जिसमें अफ़ीम की खेती अवैध घोषित की गई थी. हालांकि भांग को कानून से बाहर रखा गया था.
पंजाब की नशे की लत के बारे में अध्यन करने वाले डॉक्टर देबाशीष बासु ने कहा कि दवा के लिए देश के कुछ राज्यों में अफ़ीम की खेती की जा रही है.

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डॉक्टर धर्मवीर गांधी और अन्य लोगों की मांग पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि इस मांग का आधार यह है कि अफ़ीम या कम नशे वाले पदार्थ आसानी से नहीं मिलते. और नशे की लत वाले लोग हेरोइन और अन्य सिंथेटिक दवाओं की ओर बढ़ते जो अधिक खतरनाक है.
अफ़ीम और भुक्की का शरीर पर कम घातक प्रभाव पड़ता है. लेकिन वे इस माँग का समर्थन नहीं करते हैं क्योंकि इसका प्रभाव क्या होगा इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है.
उधर अमृतसर के दवा प्रतिरोध केंद्र के प्रभारी डॉक्टर पीडी गर्ग ने डॉक्टर गांधी और अन्य लोगों की मांग को खारिज कर दिया, और ऐसे बयान को बचकाना बयान करार दे दिया.
उन्होंने कहा ''इससे राज्य में दवाओं की समस्या में वृद्धि हो सकती है क्योंकि लोग खुलेआम इनका सेवन करेंगे.''
वे इस बात पर तो सहमत हैं कि "दवा से छुटकारा पाने के लिए वे जिस दवा का उपयोग करते हैं वह ओपिएट से बना है यानी अफ़ीम पर आधारित है."
जाहिर है, राजनीतिक दलों और विशेषज्ञों की अफ़ीम की खेती और बिक्री को लेकर राय अलग-अलग है. लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस की मांग की जा रही है और पहले से यह अधिक चर्चा की जा रही है.
कुछ किसान संघ इस के पक्ष में हैं, लेकिन इसे तब तक लागू नहीं किया जा सकता जब तक कि सरकार इस संबंध में कानून को संशोधित न करे.
ऐसा होगा फ़िलहाल कहना मुश्किल है.
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