'घर की ऐसे तलाशी ली गई, जैसे मैं कोई खूंखार चरमपंथी हूं'

आनंद तेलतुंबड़े

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पुणे पुलिस ने मंगलवार को भीमा-कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में देश के अलग-अलग हिस्सों से मानवाधिकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया.

पुलिस ने वरनॉन गोंजाल्विस को मुंबई, अरुण फ़रेरा को ठाणे, गौतम नवलखा को दिल्ली, सुधा भारद्वाज को हरियाणा और वरवर राव को हैदराबाद से गिरफ़्तार किया.

इसके अलावा पुलिस ने सिविल राइट्स एक्टिविस्ट और बुद्धिजीवी डॉक्टर आनंद तेलतुंबड़े के गोवा स्थित घर में भी छापेमारी की.

डॉक्टर आनंद गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट में पढ़ाते हैं और इसी के क्वार्टर में रहते हैं.

पुलिस ने जिस वक़्त उनके घर पर छापा मारा, घर में ताला लगा हुआ था और वो बाहर थे.

डॉ. आनंद का आरोप है कि पुलिस ने क्वार्टर के सिक्योरिटी गार्ड को धमकाकर चाबी ली और उन्हें बिना सूचित किए घर में तलाशी ली.

उन्होंने कहा, "मेरे घर की तलाशी इस तरह ली गई, जैसे मैं कोई खूंखार चरमपंथी या अपराधी हूं. वो किसी एक पुलिस अफ़सर को भेजकर मुझसे पूछताछ कर सकते थे या मुझे ही पुलिस स्टेशन बुला सकते थे. लेकिन इस पूरी कार्रवाई का मक़सद डर का माहौल पैदा करना था और ये दिखाना था कि मैंने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया है."

आनंद तेलतुंबड़े

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उन्होंने बीबीसी तमिल सेवा के संवाददाता एम नियास अहमद के सवालों के जवाब ई-मेल से भेजे.

देशभर में बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के यहां हो रही छापेमारी और गिरफ़्तारियों के बारे आपका क्या कहना है?

इस तरह की कार्रवाई मौजूदा सरकार की बेताबी को दिखाती है. सरकार ने गिरफ़्तारी के लिए उन लोगों को चुना है जो लोगों के हक़ों की लड़ाई लड़ने के लिए जाने जाते हैं.

गिरफ़्तार किए गए हर शख़्स का एक बेहतरीन सार्वजनिक जीवन रहा है, जिसकी तुलना किसी नेता से नहीं हो सकती. इन सारी प्रक्रियाओं का मक़सद देश में उठ रही मतभेद और असहमति की आवाज़ों को दबाना है. वर्तमान फासीवादी सरकार चाहती है कि सभी लोग बिना सवाल किए उसके निर्देशों का पालन करें.

इन गिरफ़्तारियों को भीमा-कोरेगांव से जानबूझकर जोड़ा गया. दरअसल, सरकार भीमा-कोरेगांव के उन असली अपराधियों को बचाना चाहती है, जिन्होंने 1 जनवरी 2018 को दलितों के खिलाफ हिंसा की. सरकार उन अपराधियों के साथ मिली हुई है. कई आम लोगों ने पहले ही शक ज़ाहिर किया था कि मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े आयोजन में कुछ गड़बड़ करने की योजना बना रहे हैं, इसके बावजूद वहां बहुत कम पुलिस बल तैनात किया गया.

उन लोगों से ध्यान हटाने के लिए सरकार ने पहले तो जिग्नेश मेवाणी और उमर खालिद के भाषणों को हिंसा के लिए ज़िम्मेदार बता दिया. इसके बाद उन्होंने कुछ दलित कार्यकर्ताओं को निशाने पर लिया. हालांकि, न्यायमूर्ति कोल्शे पाटिल ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि आयोजन उन्होंने और न्यायमूर्ति पीबी सावंत और सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायमूर्ति ने मिलकर किया था.

प्रधानमंत्री

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इसके बाद सरकार ने कहना शुरू कर दिया कि माओवादी 'यलगार परिषद' की फंडिंग करते हैं, जबकि न्यायमूर्ति कोल्शे पाटिल ने इसे ख़ारिज किया और कहा कि आयोजन के लिए उन्हें एक रुपए की भी ज़रूरत नहीं पड़ी थी. जब वो यहां भी कामयाब नहीं हुए तो उन्होंने लोगों के घर छापे मारने शुरू कर दिए और माओवादी नेताओं के कुछ ख़त जारी किए.

उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री को मारने की साज़िश रची जा रही है. ऐसी ही कहानी तब भी गढ़ी गई थी जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. जब भी उनकी लोकप्रियता कम होने लगती है ऐसी कहानियां सामने लाई जाती हैं. उस वक़्त ऐसी ही योजना का हवाला देते हुए कई लोगों को मुठभेड़ में मार गिराया गया लेकिन बाद में उनमें से कई लोग निर्दोष साबित हुए.

साफ़-साफ़ दिख रहा है कि सरकार क्या कर रही है. इसे देखते हुए न्यायपालिका को मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के पक्ष में फ़ैसला लेना चाहिए. उम्मीद है कि ऐसा ही होगा."

सुधा भारद्वाज (बाएं)

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क्या आपको लगता है कि भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी खतरे में है? सरकार बुद्धिजीवियों की आवाज़ों को दबा रही है?

जी, बिल्कुल. अभिव्यक्ति की आज़ादी सिर्फ उन्हीं के पास है, जो सरकार का गुणगान करते हैं. जो लोग सरकार की आलोचना करते हैं, कुछ टीवी चैनल उनके पीछे पड़ जाते हैं और उनकी साख को मिट्टी में मिलाकर छोड़ते हैं.

ये सरकार चाहती ही नहीं है कि देश में कोई बुद्धिजीवी रहे, क्योंकि बुद्धिजीवी सवाल करते हैं और सरकार को जवाब देना पसंद नहीं है. सवाल ना पूछने वालों को भक्त बनाना भी आसान भी होता है.

हाल ही में प्रधानमंत्री ने कहा था कि 'जिस तरह का सम्मान हमने आंबेडकर को दिया है, ऐसा सम्मान किसी और सरकार ने नहीं दिया' और ये ग़रीबों की सरकार है. आप इसपर क्या कहेंगे? क्या आपको लगता है कि बीजेपी दलित विरोधी है?

उन्हें ये भी कहना चाहिए था कि जितना अत्याचार दलितों पर इस सरकार में हुआ है, किसी और सरकार में कभी नहीं हुआ. आंबेडकर को देवता की तरह पूजना और उनके स्मारक बनाना इस सरकार की एक रणनीति है ताकि वो दलितों की आज़ाद आवाज़ों को दबा सकें. आंबेडकर दलितों को प्रेरणा देते थे लेकिन ये चाहते हैं कि दलित आंबेडकर को पूजने लगें. इसी लिए वो आंबेडकर के बड़े-बड़े स्मारक बना रहे हैं.

नरेंद्र मोदी की सरकार में सिर्फ उद्योगपतियों का विकास हुआ है. साफ़ नज़र आता है कि ये किसकी सरकार है. ग़रीबों और अमीरों के बीच बढ़ती खाई ने इस देश को दुनिया का सबसे असमान देश बना दिया है. ग़रीबों के लिए इस सरकार ने कुछ नहीं किया है. पूरे विश्वास से झूठ बोलना और उस झूठ को दोहराते रहना, ये इस हिंदुत्ववादी सरकार को बहुत अच्छे से आता है.

राइट्स एक्टिविस्ट

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दलित राजनीति का आप क्या भविष्य देखते हैं?

नई दलित पीढ़ी जागरुक हो रही है. वो अपना भूमि अधिकार, शिक्षा का अधिकार, सम्मान से जीने का अधिकार मांग रही है. आज का दलित सतर्क है, जो वो आरक्षण के आकर्षण में भूल गया था. देश के अलग-अलग इलाक़ों में सैकड़ों छोटे-छोटे आंदोलन हो रहे हैं और मुझे उम्मीद है कि एक दिन ये मिलकर बड़े आंदोलन का रूप ले लेंगे.

क्या सरकार ख़ुद से असहमत लोगों को राष्ट्रद्रोही और माओवादी बता रही है?

जी, सरकार ने देशद्रोहियों या माओवादियों की परिभाषा को सरल कर दिया है. अब उससे असहमत लोगों का मतलब यही है. उन्होंने एक और नई टर्म खोजी है 'अर्बन नक्सल', जिनमें सरकार की अंधभक्ति ना करने वाले सभी कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी शामिल हैं.

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