'और बुलंद हुई अभिव्यक्ति की आज़ादी'

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भारत के जाने-माने क़ानूनविद सोली सोराबजी ने आईटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को ये कहते हुए सराहा कि ये प्रावधान अनिश्चितता से भरा था और इसका मतलब कोई भी अपने मुताबिक निकाल सकता था.
बीबीसी के इक़बाल अहमद से बात करते हुए पूर्व अटॉर्नी जनरल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने बेहतरीन तरीके से स्पष्ट कर दिया है कि नाराज़गी और आपत्ति मात्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित नहीं कर सकते हैं.सुप्रीम कोर्ट बेहतरीन तरीके से
सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट के सैक्शन 66ए को रद्द किया जिसके तहत पिछले दिनों सोशल मीडिया पर 'आपत्तिजनक' पोस्टिंग करने पर लोगों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामले दर्ज हुए और उन्हें ज़ेल भी भेजा गया.
सोली सोरबाजी ने क्या कहा

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"यह एक शानदार फ़ैसला है. यह एक ऐसा क़ानून था जिसके आधार पर लोगों को इसलिए सजा दी जा सकती थी कि उनके कथन से कोई नाराज़ हुआ या उसे आपत्तिजनक लगा.
ये बहुत अस्पष्ट अवधारणा थी. सुप्रीम कोर्ट का फैसला बहुत तर्कसंगत और शोधपरक है. मुझे लगता है कि इस फैसले से अभिव्यक्ति की आज़ादी को और व्यापक मान्यता मिली है.

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इस फ़ैसले के बाद अब 66ए के तहत कार्रवाई नहीं हो सकती. क्योंकि जो बात मिस्टर ए को नाराज़ कर सकती है, हो सकता है मिस्टर बी को उससे नाराज़गी न हो. इसलिए यह बहुत घालमेल वाला विचार था.
अभिव्यक्ति की आज़ादी
सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा है कि इस तरह के अस्पष्ट और मनोगत विचारों के आधार पर आप अभिव्यक्ति की आज़ादी पर रोक नहीं लगा सकते.

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इस प्रावधान को दुरुपयोग किया जा सकता था, जैसा कि आप जानते हैं कि <link type="page"><caption> एक कार्टूनिस्ट पर केस दर्ज</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/09/120909_cartoon_aseem_pa.shtml" platform="highweb"/></link> कर जेल भेज दिया गया था.
भारतीय संविधान और अभिव्यक्ति की आज़ादी कोई निरपेक्ष चीज़ नहीं है. संविधान में बताए गए कुछ विशेष मामलों के तहत इस पर रोक लगाई जा सकती है, जैसे मानहानि या उकसावे वाला भाषण या फिर अदालत की अवमानना.
आलोचना से हर किसी को दुख होता है. लेकिन अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सिर्फ इस आधार पर रोक नहीं लग सकती कि कोई असहज महसूस कर रहा है."
(सोली सोराबजी के साथ बीबीसी के इक़बाल अहमद की बातचीत पर आधारित)
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