BBC SPECIAL: क्या मरने के बाद … मुझे सुरक्षा देंगे?- उमर ख़ालिद

- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
अंदर को धंसी लेकिन चमकीली आंखोंवाले उस युवक पर एक दिन पहले ही जानलेवा हमला हुआ है, लेकिन उसके दो मंज़िला घर या आसपास दूर-दूर तक पुलिस का नामो-निशां तक नहीं.
किस चीज़ का इंतज़ार कर रही है दिल्ली पुलिस, हमले के तक़रीबन 24 घंटे बाद तक सुरक्षा मुहैया न करवाए जाने के सवाल पर छात्र नेता और जेएनयू के पूर्व छात्र उमर ख़ालिद गंभीर अंदाज़ में कहते हैं.
"क्या मरने के बाद … मुझे सुरक्षा देंगे?" वो अपनी बात पूरी करते हैं.
लेकिन उमर ख़ालिद की आवाज़ में किसी तरह का ग़ुस्सा नहीं है, हां, चेहरे पर हादसे के बाद की थकान ज़रूर झलक रही है. धमकियां तो उन्हें लंबे समय से मिल रही थी, लेकिन सोमवार को मौत पिस्तौल की शक्ल में उमर ख़ालिद के सीने पर आ टिकी थी.
उमर ख़ालिद और उनके दोस्तों- शारिक़ हुसैन और ख़ालिद सैफ़ी का कहना है कि सफ़ेद शर्ट पहने हुए ह्रष्ट-पुष्ट हमलावर ने गोली भी दाग़ी, हालांकि पुलिस कह रही है कि भरी हुई पिस्तौल जाम हो गई थी और गोली चली या नहीं इसकी जांच हो रही है.
उमर ख़ालिद के पिता एसक्यूआर इलियास ने इस बात पर आश्चर्य प्रकट किया कि हमला सुरक्षा की दृष्टि वाले इतने संवेदनशील इलाक़े में हुआ (घटनास्थल संसद भवन से महज़ आधा किलोमीटर की दूरी पर है), फिर भी पुलिस हादसे के 15 मिनट बाद वहां पहुंची.
एसक्यूआर इलियासी वेलफेयर पार्टी ऑफ़ इंडिया नाम के एक राजनीतिक दल के कर्ता-धर्ता हैं और जमाते इस्लामी से जुड़े रहे हैं.
हालांकि उमर ख़ालिद ख़ुद को नास्तिक बताते हैं और उनका ताल्लुक़ वामपंथी विचारधारा से रहा है.

महज़ एक स्टंट!
दक्षिणी दिल्ली में उमर ख़ालिद के घर में टीवी चैनल्स और वेबसाइट्स के पत्रकार इंटरव्यू के लिए पहुंचे हुए हैं जिनमें से कुछ उस सवाल को भी उमर ख़ालिद पर उछालते हैं जो सोशल मीडिया पर ख़ूब दोहराया जा रहा है कि 'ये हमला महज़ एक स्टंट था.'
ठहरे हुए अंदाज़ में छात्र नेता कहते हैं कि मौत उतनी डरावनी नहीं जितना आजकल एक विशेष वर्ग का मौत को लेकर जश्न मनाना है.
उन सोशल पोस्ट पर जिनमें उन (उमर ख़ालिद) से कहा गया है कि वो बच क्यों गए, उमर ख़ालिद जानी-मानी पत्रकार गौरी लंकेश का ज़िक्र करने लगते हैं जिन्हें बैंगलुरू में गोली मारे-जाने के बाद कुछ लोग सोशल मीडिया पर उनकी मौत को जायज़ ठहरा रहे थे, उन्हें 'कुतिया' तक कह रहे थे, ऐसा अपशब्द कहनेवाले एक व्यक्ति के तो ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ट्विटर पर फॉलोवर रहे हैं.
कर्नाटक पुलिस ने गौरी लंकेश हत्या मामले में 14 लोगों को गिरफ़्तार किया है जिनमें से अधिकतर का संबंध कथित तौर पर हिंदुत्ववादी विचारधारा वाले संगठनों से है.
कहा जा रहा है कि जिस तरह से गौरी लंकेश की हत्या हुई वो एमएम कलबुर्गी, गोविंद पंसारे और नरेंद्र डाभोलकर की हत्याओं के तरीक़े से काफी हद तक मेल खाती है.
ये सभी लोग हिंदुत्ववादी राजनीति के विरोधी रहे थे.
सुपरमैन नहीं
उमर ख़ालिद कहते हैं कि "वो सुपरमैन या शक्तिमान नहीं कि उन्हें मौत से डर नहीं लगता है लेकिन ये उतना भी नहीं है कि डर के चुप हो जाएं."

इमेज स्रोत, Tarendra
वो कहते हैं कि फ़रवरी 2016 के बाद का वक़्त उनके लिए बहुत मुश्किलों भरा था जब उनपर भारत-विरोधी नारे लगाने के आरोप लगे थे, लेकिन "मुश्किलों ने उन्हें मुश्किलों से लड़ना सिखाया और वो अपनी पीएचडी यूनिवर्सिटी में दाखिल कर पाये."
उनके मुताबिक़ उनके लिए पीएचडी दाख़िल करना इसलिए भी बहुत अहम था क्योंकि इस तरह का दुष्प्रचार फैलाया जा रहा था कि जेएनयू में पढ़ाई नहीं राजनीति होती है और वहां टैक्स देनेवालों का पैसा उड़ाया जाता है.
"मैं राजनीतिक हूं लेकिन अपनी पढ़ाई को लेकर भी उतना ही सीरियस हूं," वो कहते हैं.
उमर ख़ालिद पर देशविरोधी नारे लगाने के मामले को हालांकि ढाई साल बीत गए हैं लेकिन अभी तक इस केस में आरोपपत्र तक दाखिल नहीं हुआ है, जिसके बारे में उमर का कहना है कि ये दर्शाता है कि पूरा मामला बस दुष्प्रचार का था और इसे लेकर पुलिस या सरकार कभी सीरियस थी ही नहीं.
इन्हीं बातों के बीच उमर ख़ालिद छोटी बहन से कहते हैं कि वो सबके लिए चाय बनवाएं, बहन के ये पूछने पर कि कितनी, हंसते हुए उनका जवाब होता है कि भई जितने लोग हैं उतनी बनवा लीजिए न.
वहां बैठे एक पत्रकार मुस्कुराते हुए कहते हैं कल के इतने बड़े हमले के बाद भी आप हंस बोल रहे हैं, उमर ख़ालिद अंग्रेज़ी में जवाब देते हैं मैं जीवित हूं इसलिए ख़ूश हूं, लेकिन मैंने फैसला किया है कि मैं जब तक जीवित हूं तब तक खुश रहूंगा.
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