ब्रितानी हुकूमत के दौरान अपनी ‘सरकार’ चलाने वाले क्रांतिकारी

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    • Author, प्राजक्ता ढेकळे
    • पदनाम, संवाददाता, बीबीसी मराठी सेवा

साल 1942 में ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ देश में चल रहा 'भारत छोड़ो' आंदोलन अपने चरम पर था.

उस वक़्त तक महाराष्ट्र के सतारा ज़िले में क्रांतिकारी नेता क्रांति सिंह नाना पाटिल 'समानांतर सरकार' का बीज बो चुके थे. महाराष्ट्र में लोग इस आंदोलन को 'पत्री सरकार' के रूप में जानते थे.

क्रांति सिंह नाना पाटिल ने इससे पहले महात्मा गांधी के विचारों के प्रभाव में आकर अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी थी और राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हो गये थे.

गांधी के नेतृत्व में 'असहयोग आंदोलन' में भाग लेने के बाद, साल 1942 में क्रांति सिंह ने महाराष्ट्र के सतारा ज़िले में समानांतर सरकार की स्थापना की.

उन्होंने सभी गाँवों में जाकर लोगों को स्वदेशी उत्पादों के महत्व के बारे में समझाया. उन्होंने लोगों को ब्रिटिश शासन के अधिकार को उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरित किया.

उन्होंने अपनी समानांतर सरकार के तहत हर गाँव में कमेटियों का गठन किया था. ये समितियां निःस्वार्थ रूप से काम करती थीं और समानांतर सरकार के सिद्धान्तों का पालन करते हुए स्वतंत्र रूप से अपने काम करती थीं.

इस दौरान लोगों ने गाँवों में मिलने वाले सभी विदेशी कपड़ों को फूंक दिया था.

क्रांति सिंह नाना पाटिल के इस आंदोलन से ब्रिटिश परेशान थे. ब्रिटिश शासन ने पाटिल को रोकने के लिए ये घोषणा की थी कि जो भी पाटिल को पकड़वाने में उनकी मदद करेगा, उसे वो बड़ा पुरस्कार देंगे.

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ब्रिटिश शासन ने उनके बारे में जानकारी जुटाने की तमाम कोशिशे कीं, लेकिन वो उन्हें कभी पकड़ नहीं पाए. जबकि पाटिल भूमिगत होकर लगातार अपना काम कर रहे थे. वो लगातार लोगों को अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ भड़का रहे थे.

माना जाता है कि लोगों पर पाटिल के सशक्त व्यक्तित्व और उनकी कड़क आवाज़ का काफ़ी प्रभाव था. महाराष्ट्र के बहुत से नौजवान पाटिल के 'समानांतर सरकार' आंदोलन के लिए काम करने लगे थे.

स्वतंत्रता सेनानी जी डी बापू लाड, शाहिर शंकर राव निकम और बहादुर क्रांतिकारी महिला हौसा बाई पाटिल ने अपने पिता द्वारा शुरू किेए गए पत्री सरकार आंदोलन का दृढ़ता से समर्थन किया था.

क्रांति सिंह नाना पाटिल की बेटी हौसाबाई पाटिल अब 93 साल की हैं और महाराष्ट्र के सांगली ज़िले के हनमंतवडिये गाँव में रहती हैं.

बीबीसी से बातचीत में हौसाबाई पाटिल ने अपने पिता से जुड़े कुछ किस्सों का ज़िक्र किया.

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'हमें हथियार लूटने की ज़िम्मेदारी दी गई थी'

हौसाबाई भले ही बूढ़ी हो गई हैं, लेकिन उनकी आवाज़ में आज भी वो जोश बरकरार है.

उन्होंने बताया, "उन दिनों हम इस आंदोलन से जुड़े लोगों को आवश्यक हथियार मुहैया करवाते थे. मुझे सांगली ज़िले के भवानी नगर स्थित पुलिस स्टेशन में रखीं बंदूकों को निकालने की ज़िम्मेदारी दी गई थी. भरी दोपहर में हथियार लूटना, किसी बाघ के मुँह में अपना हाथ डालने से कम नहीं था. लेकिन हमें वो काम करना ही था."

हौसाबाई के अनुसार, उस वक़्त उनकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी अपने सभी सहयोगियों को उनकी जिम्मेदारियाँ समझाना था. जिस दिन लूट की ये कार्रवाई हुई, उस दिन हौसाबाई के नेतृत्व में ही कुछ लोग पुलिस थाने में दाख़िल हुए थे.

उन्होंने बताया, "हमारा एक सहयोगी मेरा भाई बनने का नाटक कर रहा था. उसने थाना परिसर में मुझे ये कहते हुए पीटना शुरू किया कि मैं अपने पति के घर वापस क्यों नहीं लौट जाती हूँ. उसने मुझे मारने के लिए हाथों में एक बड़ा पत्थर उठा लिया था. ये देखकर थाने में तैनात पुलिसवाले बीच-बचाव करने आ गये. वहाँ भीड़ जमा हो गई. और मौक़ा देखकर हमारे बाकी साथियों ने थाने से बंदूकें और कारतूस चोरी कर लिए."

हौसाबाई कहती हैं कि सभी आंदोलनकारियों का हौसला देखकर नाना पाटिल रोने लगे थे.

वो बताती हैं कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पत्री सरकार आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने ब्रिटिश सरकार को परेशान करने और उन्हें खदेड़ने के लिए कई नये तरीक़े निकाल लिये थे.

कभी वो पोस्ट हाउस जला देते थे. कभी रेलवे की पटरियों को तोड़ देते थे. कई बार टेलीफ़ोन की लाइनों को भी उखाड़ा गया था. इनमें से कई गतिविधियों को हौसाबाई के नेतृत्व में अंजाम दिया गया था.

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'क्या लोग वास्तव में स्वतंत्र हैं?'

हौसाबाई ने बताया, "क्रांति सिंह पाटिल अंत तक जंगलों में ही घूमते रहे. उन्होंने अपने जीवन के एक बड़े हिस्से में भूमिगत रहकर ही काम किया और उनकी 'समानांतर सरकार' ने स्वतंत्रता जीती. लेकिन आज भी एक सवाल जो हमेशा मेरे दिमाग़ में रहता है, वो ये कि क्या वाक़ई हम आज़ाद हैं? ये बड़े दुख की बात है कि देश में लोगों की भोजन और कपड़े जैसी बुनियादी ज़रूरतें भी पूरी नहीं हो पा रहीं."

वर्तमान सरकार के बारे में बात करते हुए हौसाबाई ने कहा, "अगर मेरे पिता क्रांति सिंह नाना पाटिल आज जीवित होते, तो वो इस सरकार को तीन दिन से ज़्यादा चलने नहीं देते. वो इस सरकार की धज्जियाँ उड़ा देते."

हौसाबाई, क्रांति सिंह की अकेली संतान हैं. उन्होंने तीन साल की उम्र में ही अपनी माँ को खो दिया था.

उन्होंने अपने पिता के साथ भी बहुत कम वक़्त बिताया क्योंकि उनके पिता क्रांति सिंह देश की सेवा में उलझे हुए थे. लेकिन हौसाबाई मानती हैं कि इन्हीं परिस्थितियों ने उनके मन में भी देशभक्ति का बीज बोया.

पत्रि सरकार आंदोलन पर लिखनेवालों ने इस आंदोलन में हौसाबाई की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में काफ़ी लिखा है.

आंदोलन के दौरान गुप्त संदेश लाने, ले जाने के अलावा खाने-पीने की व्यवस्था करना, परिवहन का बंदोबस्त और प्रदर्शनों के आयोजन की अहम ज़िम्मेदारी भी हौसाबाई के पास ही थी.

इस बारे में हौसाबाई ने बताया, "गुप्त संदेश ले जाना सबसे मुश्किल काम हुआ करता था. पुलिस अधिकारी निरीक्षण में हमें पकड़ न सकें, इसके लिए हम अपने बालों में या चुटिया के भीतर कागज़ की चिट छिपाकर ले जाते थे. एक बार मुझे और मेरे साथी कार्यकर्ता को ब्रितानी अफ़सरों ने रोक लिया था. उन्होंने हमसे कई तरह के सवाल पूछने शुरू किये. हमारे पास एक अहम गुप्त संदेश था. हम उसे लीक नहीं होने दे सकते थे. इसलिए मैंने उस चिट को मौक़ा देखकर चबा लिया. उस वक़्त, इसके अलावा बचने का कोई और तरीक़ा ही नहीं था."

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गांधीवाद का प्रसार

हौसाबाई कहती हैं कि पत्री आंदोलन के दौरान सबसे बड़ा और मुश्किल काम था गाँवों में जाकर महिलाओं को आंदोलन में शामिल होने के लिए तैयार करना. लेकिन हमने उन्हें भी संगठित किया.

वो कहती हैं, "गाँवों का नज़ारा उस वक़्त देखने लायक होता था जब गाँव की महिलायें अनाज पीसते वक़्त आंदोलनकारियों के लिए क्रांतिकारी गीत गाती थीं"

हौसाबाई ने बताया कि उनके पिता क्रांति सिंह किसी की भी अंधभक्ति के बिल्कुल ख़िलाफ़ थे.

क्रांति सिंह नाना पाटिल ने अपनी बेटी हौसाबाई की शादी भी अपने स्वतंत्रता आंदोलन के सहयोगी भगवान राव मोरे पाटिल से की.

हौसाबाई कहती हैं, "शादी में कोई दहेज नहीं था. कोई फ़ालतू ख़र्च नहीं किया गया था. मंडप और खाने-पीने पर भी न्यूनतम ख़र्च किया गया था. फ़ैसला किया गया था कि शादी में कोई ढोल-नगाड़े नहीं बजेगा. वर-वधु ने सिर्फ़ एक दूसरे को माला पहनाई, और विवाह को इस गांधीवादी तरीके से ही संपन्न माना गया."

हौसाबाई बताती हैं कि बाद में बहुत सारे आंदोलनकारियों ने शादी के लिए इसी परंपरा को अपनाया.

आज के सामाजिक परिदृश्य के बारे में बात करते हुए हौसाबाई कहती हैं, "देश ने गोरे शासकों को निकाल फेंका, तो ये धौले रंग के शासक आ गये. हमसे कहीं न कहीं ग़लती हुई. हमें सत्ता की उन कुर्सियों को ही जला देना चाहिए था. शायद तभी हमें सही मायनों में आज़ादी मिलती. हमारे समाज, सूबे और परिवार के लोगों ने तमाम सहयोगियों की मदद से जो आज़ादी हासिल की थी, वो एक धोखा है. और ये बात मेरे मन में आज भी आग लगा देती है."

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