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ब्लॉग: नरेंद्र मोदी के मंत्रियों की मुलज़िमों से इतनी मोहब्बत क्यों
- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, रेडियो एडिटर, बीबीसी हिंदी
लिंचिंग के अभियुक्तों को मिठाई खिलाते, माला पहनाते हुए किसी केंद्रीय मंत्री की तस्वीर भारतीय गणतंत्र की सबसे शर्मनाक तस्वीर होनी चाहिए थी — पर केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा उसे देश की क़ानूनी प्रक्रिया के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का सबूत बता रहे हैं.
हत्या के आरोप में पकड़े गए लोगों का सार्वजनिक अभिनंदन करने वाले जयंत सिन्हा नरेंद्र मोदी कैबिनेट के अकेले मंत्री नहीं हैं. उनसे पहले इस देश के संस्कृति मंत्री महेश शर्मा भी लिंचिंग के एक अभियुक्त के मरने पर उसके शव के सामने नमन की मुद्रा में झुके और मोहम्मद अख़लाक़ की लिंचिंग की मामूली घटना बताया.
राजस्थान के वरिष्ठ बीजेपी नेता और गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया ने पिछले साल 'गोरक्षक' भीड़ के हाथों खुली सड़क पर मारे गए पहलू ख़ान की हत्या पर 'दोनों पक्षों' को ज़िम्मेदार ठहराते हुए इस हत्या को सामान्य-सी घटना बताने की कोशिश की.
और अब केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह रो पड़े. वो दंगा फैलाने के आरोप में बिहार की नवादा जेल में बंद विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं का मिज़ाज पूछने गए थे. बाद में अपने आँसू पोछते हुए नीतीश कुमार की सरकार पर हिंदुओं को दबाने का आरोप लगाया.
इन मंत्रियों की 'सादगी' पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा, लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं!
जब केंद्र सरकार और राज्यों के मंत्री ही लिंचिंग और भीड़ के हाथों हुई हत्याओं पर लीपापोती करते नज़र आएँ तो कल्पना कीजिए की लाठी-बल्लम के दम पर हर छोटे गाँव-क़स्बे या शहर में बनाई गई गोरक्षा समितियों के सदस्यों का सीना कितना चौड़ा होता होगा.
जैसे वो क़त्ल के मुजरिम भगत सिंह हो
पिछले साल 29 जून को झारखंड के रामगढ़ ज़िले में कथित गौरक्षकों की एक भीड़ ने 55 बरस के अलीमुद्दीन अंसारी का पीछा किया और बाज़ारटांड इलाक़े में पहले उनकी वैन को आग लगाई और फिर दिनदहाड़े सबके सामने खुली सड़क पर उनकी पीट-पीटकर हत्या कर दी.
हत्यारी भीड़ को शक था कि अलीमुद्दीन अपनी गाड़ी में गोमांस सप्लाई कर रहे थे. ये उसी तरह का शक था जैसा दिल्ली के पास दादरी के मोहम्मद अख़लाक़ पर हमला करने वाली हिंसक भीड़ को हुआ था.
पर इस बार ये भीड़ उन लोगों की नहीं थी जिनके बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सेमिनार में कहा था कि ये लोग "गोरक्षा के नाम पर अपनी-अपनी दुकानें खोलकर बैठ गए हैं."
उनकी अपनी ही पार्टी के लोगों पर इस हिंसक भीड़ में शामिल होने के आरोप लगे थे. अलीमुद्दीन अंसारी के क़त्ल के आरोप में फ़ास्ट ट्रैक अदालत ने जिन 11 अभियुक्तों को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई थी उनमें बीजेपी के स्थानीय नेता नित्यानंद महतो, गौ-रक्षक समिति और बजरंग दल के कार्यकर्ता शामिल थे.
हत्या के आरोप में सज़ायाफ़्ता इन्हीं लोगों को ज़मानत मिलने के बाद केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने अपने घर पर आमंत्रित करके ऐसे सम्मानित किया जैसे वो क़त्ल के मुजरिम नहीं बल्कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे कोई बहुत बड़े राष्ट्रीय हीरो हों.
जब हत्या के अभियुक्तों के साथ देश की सबसे ताक़तवर संस्था-यानी सरकार-के नुमाइंदे खड़े नज़र आएँ तो दादरी में भीड़ के हाथों मारे गए मोहम्मद अख़लाक़ या रामगढ़ में सरेआम क़त्ल कर दिए गए अलीमुद्दीन अंसारी को न्याय मिलने की कितनी उम्मीद बचती है?
हार्वर्ड से लौटे नेता हिंदुत्व की राजनीति जानते हैं
महेश शर्मा और जयंत सिन्हा अच्छी तरह जानते हैं कि संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेने के बाद केंद्र सरकार में ज़िम्मेदार पद पर रहते हुए कोई भी व्यक्ति अपराध का समर्थन नहीं कर सकता.
इसलिए वो हत्या के अभियुक्तों को फूल मालाएँ पहनाने के साथ-साथ विवादों से बचने के लिए दिया जाने वाला डिस्क्लेमर भी जारी कर देते हैं - इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं और किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से समानता महज़ इत्तेफ़ाक़ ही होगा.
जयंत सिन्हा ने भी शनिवार को ट्विटर पर ये डिस्क्लेमर दिया- "मैं हर तरह की हिंसा की साफ़ तौर पर भर्त्सना करता हूँ और हर तरह के विजिलांती कार्रवाई को भी ख़ारिज करता हूँ."
लेकिन सच यह था कि उन्होंने ऐसे लोगों को फूल माला पहनाईं जिन पर पुलिस की मौजूदगी में एक आदमी को ठौर मार डालने का आरोप है और हाईकोर्ट ने अभी उन्हें हत्या के इस आरोप से अंतिम तौर पर बरी नहीं किया है. सिर्फ़ ज़मानत दी है.
राजनीति करने वाले को ठीक-ठीक मालूम होता है कि उसके किस काम से क्या संदेश जनता तक जाएगा और उसे इसका कितना फ़ायदा होगा. इस देश के संविधान और क़ानून की वजह से कई बार वो अपने हाथ बँधे महसूस करते हैं, फिर भी वो ऐसे डिस्क्लेमर्स लगाकर अपनी बात कह देते हैं जिससे क़ानून का उल्लंघन होता भी न दिखे और बात सीधे टारगेट तक पहुँच जाए.
जयंत सिन्हा ने किसी बजरंग दल की शाखा में राजनीति नहीं सीखी. वो बेहद प्रतिभाशाली अर्थशास्त्री हैं जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल से पढ़ाई की. फिर भी उन्हें मालूम है कि जिस तरह की राजनीति वो कर रहे हैं उसमें उन्हें बजरंग दल और गोरक्षा समिति के लठैतों की ज़रूरत पड़ेगी. इसलिए वो लिंचिंग के अभियुक्तों के बरी होने से पहले ख़ुद ही उन्हें बरी कर देते हैं.
प्रधानमंत्री की डांट और मंत्रियों की पुचकार
इसका सीधा-सा कारण है कि इस देश की रग-रग में हिंदुत्व की राजनीति का प्रवाह बनाए रखने के लिए ये ज़रूरी है कि लाठी-बल्लमधारी गोरक्षकों की सत्ता सड़कों पर क़ायम रहे. उनके हर एक्शन, हर कार्रवाई को या तो उचित ठहराया जाए, या पकड़े जाने पर उन्हें निर्दोष साबित करने की पुरज़ोर कोशिश की जाए और इस बात का भी ध्यान रखा जाए कि गोरक्षा की कोशिश में हुए किसी अपराध के कारण उनका 'मनोबल' नीचे न गिरे.
अगर गोरक्षक का मनोबल गिरा, या उसके क़ानूनी-ग़ैरक़ानूनी कामों को सत्ता का सीधा या परोक्ष समर्थन न मिला तो फिर वो इस सत्ता को बनाए रखने के लिए अपनी जान जोखिम में क्यों डालेगा? पर इस बात का भी ध्यान रखा जाता है कि गोरक्षकों की कार्रवाइयों से अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारत को एक अराजक देश न मान लिया जाए और प्रधानमंत्री मोदी की कड़क प्रशासक वाली छवि पर बट्टा न लगे.
इसलिए जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लगता है कि कथित गो रक्षकों के कारण बदनामी ज़्यादा हो रही है तो वो किसी सेमीनार में गोरक्षकों को दो-चार बातें सुनाकर रिकॉर्ड ठीक कर लेते हैं. पर लाठी-बल्लम के दम पर गोरक्षा समितियाँ चलाने वाले जानते हैं कि ऐसी कार्रवाइयों की आलोचना करना प्रधानमंत्री के लिए एक तरह की संवैधानिक मजबूरी है. इसलिए वो जयंत सिन्हा और महेश शर्मा या गुलाब चंद कटारिया की ओर से आ रहे संदेश पर फूले नहीं समाते और मोदी की डाँट को मीठी झिड़की समझकर मुस्कुरा उठते हैं.
प्रधानमंत्री की डाँट और उनके मंत्रियों की पुचकार एक ही रणनीति का हिस्सा हैं. जब बहुत आलोचना होने लगे तो प्रधानमंत्री डाँट दें, लेकिन गोरक्षकों के काले-सफ़ेद को लगातार उचित ठहराया जाए और उनकी पीठ पर मंत्रियों का वरदहस्त बना रहे. गोरक्षक सड़कों पर रात गए आने-जाने वाले ट्रकों की तलाशी लेते रहें, और अगर उनमें गाय-भैंस ले जा रहा कोई अकेला या निर्बल मुसलमान मिल जाए तो उसे वहीं सड़क पर पटक-पटककर मार डालने को तैयार रहें.
इस तरह मुसलमानों के दिल में हिंदुओं की ताक़त का भय बनाकर रखा जा सकेगा.
मुसलमानों में भय बनाकर रखना उस राजनीति की मजबूरी और लक्ष्य है जिसके पास हिंदुओं को एकजुट करके एक राजनीतिक ताक़त में बदलने का कोई और फ़ॉर्मूला है ही नहीं. जब तक वो मुसलमानों के एक बड़े हिस्से को हिंदुओं और भारत के दुश्मन के तौर पर चिन्हित करने में कामयाब नहीं होंगे तब तक वो जातियों में बँटे हिंदू समाज को किसके ख़िलाफ़ एकजुट करेंगे?
उनको ये साबित करना है कि मुसलमान दरअसल इस देश और हिंदुओं के ख़िलाफ़ सतत षड्यंत्र में लगे रहते हैं और बार-बार हिंदू उनकी साज़िश का शिकार होता रहता है. तमाम तरह के कट्टरपंथी, विध्वंसक, रूढ़िवादी, महिला-विरोधी और प्रगति-विरोधी इस्लामी संगठनों और व्यक्तियों को एक साथ राष्ट्रभक्ति के पत्तल पर परोसकर मुसलमानों के हिंदू-विरोधी होने के सबूत की तरह पेश किया जाता है.
इस लिस्ट में सुविधा के हिसाब से कभी कश्मीर के पत्थरबाज़ों का नाम जुड़ जाता है तो कभी पाकिस्तान के हाफ़िज़ सईद, लश्कर-ए-तैयबा, हिज़बुल मुजाहिदीन, आईएसआई, सीरिया के इस्लामिक स्टेट, भारत में गाय-भैंस का व्यापार करने वाले मुसलमान, हिंदू लड़कियों से शादी करके धर्म परिवर्तन में लगे मुसलमान, हिंदुओं से ज़्यादा बच्चे पैदा करके अपनी आबादी बढ़ाने वाले मुसलमान भी.
मुसलमानों में हिंदुओं का ख़ौफ़ बनाए रखने के लिए ज़रूरी है कि हिंदुओं में भी मुसलमानों का ख़ौफ़ बना रहे.
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