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कौन हैं 'गोरक्षक', क्यों करते हैं वो 'गोरक्षा'
- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले कुछ समय से भारत में - 'गोरक्षा' - ये शब्द लगातार सुर्खियों में बना हुआ है, जिसे लेकर बहस जारी है. इस बहस के अलग-अलग पहलुओं पर बीबीसी हिन्दी की विशेष प्रस्तुति की पहली कड़ी में मुलाक़ात एक 'समर्पित गोरक्षक' से.
"अगर आप के पास गाय है तो आप संपन्न हैं लेकिन सड़क पर गाय की रक्षा करने वाला गुंडा क्यों है?"
"अगर गोरक्षा एक आंदोलन है तो क्या ग़लत है. आंदोलन सरकार या पुलिस शुरू करते हैं या लोग?"
"अगर गाय के रहने की जगह नहीं है तो क्या उसे काट दोगे? कल आदमी के रहने की जगह कम पड़ेगी तब क्या उसे भी काटोगे?"
दोपहर के दो बजे, पूर्वी दिल्ली के एक भीड़-भाड़ वाले इलाके में मुझे गोरक्षा पर 'सबक' मिल रहे हैं. 'सबक' देने वाले बड़ी शिद्दत से अपने आप को एक 'समर्पित गोरक्षक' बताते हैं जो दस साल पहले इस 'आंदोलन' से जुड़े थे.
हरियाणा के रहने वाले पवन पंडित अब दिल्ली में बस चुके हैं और करीब हर आधे घंटे पर इनके मोबाइल की घंटी बज उठती है. एक ऐसी ही कॉल किसी दूसरे प्रदेश से आई है.
पवन पंडित: जी, बोल रहा हूँ.
कॉलर: ख़बर मिली है कि एक पिकअप वैन में कुछ गायों की तस्करी हो रही है.
पवन पंडित: आस-पास कोई पुलिस स्टेशन है क्या? अच्छा...पुलिस को फोन पर इन्फॉर्म कर के इस गाड़ी का पीछा करो. भागने न दें. पुलिस को सौंप कर ही जाना."
मैं हैरान हूँ कि न तो ज्यादातर कॉलरों से इनकी जान-पहचान है और न ही ये कभी इस कॉलर से मिले हैं. तो ये सलाह क्यों?
पवन पंडित का जवाब है, "पूरे भारत में अब हमारे 10,000 से ज़्यादा वॉलन्टियर हो चुके हैं. रोज़ तकरीबन सौ-डेढ़ सौ लोग सोशल मीडिया के ज़रिए जुड़ते हैं. आपको पता है हमारे गोरक्षक हर तरह के ख़तरे मोल लेते हैं. लेकिन पता नहीं क्यों बदनामी हमारी हो रही है."
मैंने पूछा कि बदनामी क्या ग़लत हो रही है जब देश के कई प्रदेशों में गोरक्षकों के नाम जबरन हाथापाई, लूट-मार और दादरी के अख़लाक़ और अलवर के पहलू ख़ान की हत्या तक के मामले दर्ज हैं?
पवन पंडित का जवाब मिलता है, "आपको पता नहीं होगा जो लोग गाय की तस्करी करते हैं उनके पास आधुनिक हथियार होते हैं. उन्हें गोली चलाने में कोई परहेज़ नहीं. और गोरक्षक आमतौर से निहत्थे होते हैं या कभी कभार लाठी भर रखते हैं. अगर आपकी माँ किडनैप होगी तो 100 नंबर मिलाओगे या रोकोगे. कौन सही है? हम या वे इंसान रुपी जानवर जो गोहत्या करते फिर रहे हैं."
इस सवाल पर कि क्या किसी गोरक्षक को क़ानून अपने हाथ में लेने से डर नहीं लगता, पंडित थोड़ा ठहरे, फिर लंबा जवाब मिला.
उन्होंने कहा, "कोई राजनीतिक करियर नहीं है यहाँ पर, न पैसा है और न ही पद प्राप्त करना है. एक समाज सेवा है और हमें इस पर विश्वास है. अगर आपने गोहत्या को भारत जैसे देश में आसान बना दिया तो बीस वर्ष बाद हम डिबेट कर रहे होंगे एक नए जीव के मांस के लिए. वो जीव इंसान होगा, पशु नहीं."
"मौत का डर सबको होता है. लेकिन कोई ग़लत काम नहीं कर रहे हम. मर भी जाएं तो कोई बात नहीं क्योंकि गोरक्षा और गोसेवा करने के विश्वास से भरे हुए हैं."
पवन पंडित ने राजनीति का ज़िक्र किया तो बहस तो बढ़नी ही थी. मैंने पूछा जबसे केंद्र में भाजपा सरकार आई है, क्या गोरक्षा अभियान में बढ़ोतरी हुई है या इससे जुड़े वाकये बढ़े नहीं है क्या?
पवन पंडित का जवाब है, "अगर भाजपा इस बाद से सहमत है तो गोहत्या पर तुरंत बैन लगा कर दिखाए. अब मुद्दे को पटरी से हटाने का समय नहीं है, डीरेल करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए."
मैंने बीच में रोकने की गुस्ताख़ी भी कर डाली, "लेकिन खुद नरेंद्र मोदी ने गोरक्षा के नाम पर हिंसा करने वालों के ख़िलाफ़ तो बोला था, भले ही दादरी में अख़लाक़ की मौत के काफ़ी बाद ही बोले हों. या फिर मोहन भागवत अगर एक तरफ गोहत्या प्रतिबंध की बात करें लेकिन दूसरी तरफ़ इसके नाम पर हिंसा न करने को भी कह चुके हैं. इसका क्या?"
तेज़ आवाज़ में जवाब मिलता है, "बीजेपी और आरएसएस ने कभी लोगों को ये बताने की कोशिश नहीं की, कि गाय के फ़ायदे कितने होते हैं. नरेंद्र मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी डबल स्टैंडर्ड्स वाली बात करते हैं. जब मोदी घर-घर मोदी का नारा बुलंद कर सकते हैं तो घर-घर गाय का नारा क्यों नहीं लगाते?."
अपने को 'भारतीय गोरक्षा दल' का अध्यक्ष बताने वाले पवन पंडित अब थोड़े ग़ुस्से में हैं. बोले, "हाल ही में किसी ने मुझसे कहा तुम तो शक्ल से ही गुंडे लगते हो."
पास में एक सोफ़ा पड़ा है जिस पर पहलवाल नुमा डील-डौल वाले एक युवक माथे पर तिलक और गले में गमछा डाले हमारी बात गौर से सुन रहे हैं. चेहरे पर भाव किसी ऐसे 'गोरक्षक' से कम नहीं जिसे ख़बर मिली हो कि कहीं गाय की तस्करी की जा रही है और उसे रोकने के लिए निकलना है.
जिज्ञासा बढ़ रही है ये जानने की भी कि आखिर क्यों और कैसे बने पवन पंडित एक गोरक्षक और मक़सद क्या है. उन्होंने कहा, "भिवानी में एक किसान परिवार में जन्म हुआ और गाय को माता की तरह देखा है. कॉलेज में आते-आते आर्थिक मज़बूती की भी जद्दोजहद रही और दूसरी तरफ़ गोरक्षा का उद्देश्य भी रहा. परिवार भी तो चलाना है."
"बस एक तरफ आईटी बिज़नेस शुरू किया और दूसरी तरफ़ अपनी संस्था को रजिस्टर भी कराया. आपको बता दूँ, हमारी संस्था नॉन-प्रॉफिट के मूल्यों पर चलती है. मक़सद सारी दुनिया को बताना है, गाय को न सिर्फ हिंदुत्व की वजह से बचाना है बल्कि इससे होने वाले आर्थिक लाभों की बात भी है."
पवन पंडित किसी 'सेल्समैन' की तरह मुझे गाय के लाभ भी बताते रहे.
वे कहते हैं, "गोमूत्र के शुद्धिकरण के बाद उसकी मांग अमरीका तक में होगी, गाय दूध देना बंद भी कर दे तो 15-20 किलो गोबर तो देगी ही. गाय के गोबर को पूरे देश में खाद के लिए इस्तेमाल क्यों नहीं करते, मेरे पास एक लैब रिपोर्ट है कि केमिकल खाद से बीमारियां बढ़ रहीं हैं. जब एक गाय आपकी दो एकड़ ज़मीन की खाद दे सकती है तो गायों को मारा ही क्यों जाए."
मुलाकात ख़त्म होने को है और बातचीत के दौरान पवन पंडित ने एक-आध बार इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत में दर्जनों गोरक्षा दल बनते जा रहे हैं और सभी का मक़सद एक ही रहेगा. लेकिन उनकी बातों में मलाल ज़रूर दिखा कि इन तमाम दलों में कोई एकता नहीं और न ही एक दूसरे से कोई सरोकार.
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