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गोरक्षा पर बीबीसी विशेष
- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में पिछले दो वर्षों में शायद ही ऐसा कोई महीना बीता हो जिसमें किसी अख़बार या टीवी न्यूज़ चैनल पर गाय से जुड़ी कोई ख़बर न दिखी हो.
या तो ख़बर गोरक्षा से जुडी होती है या गाय की तस्करी से. अगर नहीं तो गोहत्या या गोमांस से जुड़ी.
मुद्दा आज का नहीं, ख़ासा पुराना है. लेकिन पिछले कुछ दिनों में जैसे चर्चा का विषय सा बन चुका है.
कहीं गोहत्या रोकने पर प्रदर्शन हो रहे होते हैं, कहीं चुनावी वायदों में गोमांस पर प्रतिबंध की बात और कहीं चुनाव जीतने पर बढ़िया गोमांस उपलब्ध कराने का भरोसा.
इस बहस के बीच हिंसा भी हुई है और वो भी देश के कई हिस्सों में. 2015 में दादरी के रहने वाले अख़लाक़ की जान गई, 2016 में ऊना में दलित युवकों की सरेआम पिटाई और 2017 के पहले हिस्से में अलवर ज़िले में पहलू खां को गाडी में गाय ले जाने पर जान गंवानी पड़ी.
खुद प्रधानमंत्री से लेकर तमाम मुख्यमंत्री और नेता गोरक्षा के नाम पर हिंसा के ख़िलाफ़ बोले हैं लेकिन इसका प्रभाव कितना पड़ा है ये बड़ी बहस का मुद्दा है.
इस बीच कई राज्य सरकारों ने गोहत्या पर क़ानून सख्त किए हैं और कुछ राज्यों में बीफ़ के खिलाफ मुहिम भी चली है. अवैध बूचड़खानों और बिना लाइसेंस के मीट बेचने वालों पर लगाम कसी जाने का सिलसिला जारी है.
कहीं से आश्वासन आ रहे हैं और कहीं से निंदा. कुछ महीने पहले जदयू नेता शरद यादव ने संसद में पूछा था, "इन गोरक्षकों को किसने बनाया? सरकार इन्हें बैन क्यों नहीं कर देती?"
इसी से जुड़ा सवाल ये भी है कि जो अपने को गोरक्षक बताते हैं उनके दिमाग़ में क्या चल रहा होता है, उन्हें प्रेरणा कहाँ से मिलती है और क्या उन्हें भी डर लगता है?
साथ ही ज़रुरत है इस बात की भी पड़ताल करने की कि भारत में गोरक्षा का आंदोलन कब से शुरू हुआ और सत्ताधारी पार्टी में इसके हिमायती क्या सोचते हैं?
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