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नज़रिया: क्रोसना चूहे का स्वाद याद है आपको, लालू जी?
- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, रेडियो एडिटर, बीबीसी हिंदी
नब्बे के दशक में जब लालू प्रसाद यादव बोलते थे तो पूरा देश ही नहीं पाकिस्तान तक लोटपोट हो जाता था.
और जो वो करते थे उससे लालकृष्ण आडवाणी जैसे क़द्दावर नेता तक असहाय महसूस करने लगते थे.
लालू ने हिंदुत्व के अग्रगामी रथ को बिहार में रोककर तत्कालीन हिंदू हृदय सम्राट लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ़्तार करवा दिया था.
शुक्रवार को सीबीआई छापों के बाद पटना में लालू प्रसाद ने पुराने अंदाज़ में हुंकार लगाई पर इस आवाज़ में कितना नैतिक दम रहा होगा?
उन्होंने प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा, "सुनो नरेंद्र मोदी, अमित शाह, फांसी पर लटक जाएंगे लेकिन संपूर्ण रूप से तुम्हारा अहंकार हम चूर-चूर कर देंगे."
सत्ता की सीढ़ी
लालू प्रसाद को चारा घोटाले में दोषी ठहराया जा चुका है और कुछ मुक़दमा अभी चल रहा है. उनकी पत्नी, बेटे, बेटी-दामाद के दिल्ली वाले फ़ार्म हाउस पर छापे मारे गए हैं.
ये सच है कि सीबीआई के छापे मारने भर से किसी का अपराध सिद्ध नहीं हो जाता, ख़ास तौर पर तब जब सीबीआई की हैसियत सत्ताधारी पार्टी के तोते से ज़्यादा नहीं बची है.
लेकिन लगभग तीस साल पहले लालू प्रसाद यादव ने सत्ता की सीढ़ी पर पहला क़दम रखते हुए जैसा भरोसा जगाया था और आज वो जहाँ पहुँच गए हैं उसकी पड़ताल ज़रूरी है.
तब सांप्रदायिकता और पूँजी-परस्ती की राजनीति के विरोधी लालू यादव को पलकों पर बैठाते थे.
एक ग़रीब चरवाहा सामाजिक न्याय की लड़ाई के कारण बिहार जैसे राज्य का मुख्यमंत्री बना था, इसके बावजूद उसने अपने बदन से आने वाली मिट्टी की गंध को मिटने नहीं दिया था.
भदेस राजनीति
ये काँग्रेस के आभिजात्य को काटकर ज़मीन से पैदा हुई देसज और भदेस राजनीति की जीत थी.
इससे पहले काँग्रेस के प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री तो दूर की बात यहाँ तक कि छुटभैये भी ख़ुद को इंदिरा गाँधी और पंडित नेहरू की लीग का मानते थे और आचार-व्यवहार में ऐसा दिखाते भी थे.
लालू प्रसाद यादव ने इस आभिजात्य को तोड़ा और मुख्यमंत्री को पान की दुकान पर खड़े होकर बतकही करने वाले किसी साधारण इंसान के बराबर ला खड़ा किया.
मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार दिल्ली के बिहार भवन में उन्होंने प्रेस काँफ़्रेंस बुलाई.
जब पत्रकार जुटने लगे तो लालू बोले, "प्रेस वार्ता तो होइये जाएगा, आइए तनि पहले पान खा लिया जाए."
बिहार और पूरे देश में...
उसके बाद वो सभी पत्रकारों को अपने साथ बिहार भवन के बाहर पान की गुमटी पर ले गए और एक एक के लिए ख़ुद पान बनवाकर खिलाया और वहीं खड़े होकर बिहार और पूरे देश में पनप रही नए क़िस्म की राजनीति पर चर्चा की.
न कोई सुरक्षा चक्र, न जी-हुज़ूरों का जमावड़ा, न ईगो की कोई नुमाइश और न ही मुख्यमंत्री के पद का रोब-दाब.
इसके बाद लालू यादव से मेरी कई बार अलग अलग मौक़ों पर रिपोर्टिंग के सिलसिले में मेरी मुलाक़ात हुई और उनके व्यवहार में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखा.
फिर बरसों बाद एक बार लंदन से छुट्टी पर दिल्ली आने पर बीबीसी के संजीव श्रीवास्तव के साथ मैं लालू प्रसाद यादव के दिल्ली निवास पर गया.
कम से कम आठ आदमी मुग़ल बादशाह के चाकरों की तरह उनके आसपास मँडरा रहे थे. लालू प्रसाद कहीं जाने को तैयार हो रहे थे पर उनके मोज़े नहीं मिल रहे थे.
मुख्यमंत्री बनने के बाद...
उन्होंने तभी डाँट कर एक कारकुन को बुलाया. वो घबराया हुआ हाथ में मोज़े लिए दौड़ा चला आया. उसे देखते ही लालू प्रसाद ने अपना पैर आगे बढ़ा दिया. कारकुन ने झुककर लालू के पैरों में मोज़े पहनाने शुरू कर दिए.
ये वो लालू प्रसाद यादव नहीं थे जो मुख्यमंत्री बनने के बाद पत्रकारों को पनवाड़ी की गुमटी में ले जाकर पान खिलाते थे.
ये वो धरती के लाल लालू प्रसाद यादव भी नहीं थे जिन्हें ग़ज़ब की प्रतिभा के धनी फ़ोटोग्राफ़र प्रवीन जैन पटना में सर्वेंट क्वॉर्टर के उनके घर में मिले थे जहाँ राबड़ी देवी ज़मीन पर बैठकर गैस पर खाना पकातीं और बरतन मांजती थीं.
प्रवीन जैन आज भी उन दिनों को याद करते हैं जब वो नए नए मुख्यमंत्री बने लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार की तस्वीरें खींचने के लिए पटना गए.
सर्वेंट क्वॉर्टर में लालू का परिवार
प्रवीन तब संडे मेल अख़बार के फ़ोटोग्राफ़र थे और उन्होंने सर्वेंट क्वार्टर में रह रहे लालू और उनके परिवार की ऐतिहासिक तस्वीरें खींची थीं.
प्रवीन ने मुझे बताया, "लालू जी को मुख्यमंत्री आवास एलॉट हो चुका था लेकिन उनका परिवार सर्वेंट क्वार्टर में ही रह रहा था. मुख्यमंत्री आवास में मैं तीन-चार दिन तक रहा और वहीं से लालू जी के घर जाता था."
तब किसी भविष्यवक्ता या ज्योतिषी को भी नहीं मालूम था कि खपरैल की छत वाले घर में ज़मीन पर बैठकर कपड़ा फींचने वाली, चूल्हा-चौका करने वाली राबड़ी देवी को उनके पति एक दिन बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा देंगे.
प्रवीन जैन ने राबड़ी से पूछा कि लालू जी को इतना बड़ा बंगला मिल गया है फिर आप अब भी क्यों इसी सर्वेंट क्वॉर्टर में रहती हैं?
राबड़ी सरकार की बर्खास्तगी
राबड़ी ने जवाब दिया कि यहीं रहने की आदत है, यहीं अच्छा लगता है. प्रवीन जैन उनसे बात भी करते रहे और तस्वीरें भी खींचते रहे.
लालू प्रसाद यादव से जुड़ी ऐसी ही कई तस्वीरें मेरे ज़ेहन में भी हैं.
फ़रवरी 1999 को केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान बिहार के राज्यपाल सुंदर सिंह भंडारी ने राबड़ी देवी की सरकार को बरख़ास्त करने की सिफ़ारिश की.
सरकार बरख़ास्त कर भी दी गई पर अगले महीने ही लालू ने पर्याप्त विधायकों का समर्थन जुटा लिया और सुंदर सिंह भंडारी को मुँह की खानी पड़ी.
राबड़ी सरकार फिर से बहाल होने की ख़ुशी में कार्यकर्ताओं ने जश्न मनाया और हमेशा की तरह पटना के किन्नरों ने अपने दालान में समर्थकों और पत्रकारों से घिरे लालू यादव के सामने नाच नाच कर बलाएँ लीं.
जनता की नब्ज
तब लालू यादव ने एक इंटरव्यू के दौरान मुझे अपनी ज़मीनी राजनीति के बुनियादी पाठ सिखाए और कहा कि लालू अगर चला जाएगा तो नक्सली शहरों को घेरकर मारकाट मचाना शुरू कर देंगे और लालू इसलिए नहीं जाएगा क्योंकि वो ग़रीबों की नब्ज़ को जानता है.
मुझे समझाने के लिए उन्होंने बताया कि देहात में चूहे की एक नस्ल होती है जिसे क्रोसना कहते हैं, "क्रोसना चूहा को पकड़ कर उसके पेट में छेद किया जाता है और सब अंतड़ियाँ निकाल कर उसमें हरी मिर्च का मसाला भरा जाता है. फिर उसे आग में भूना जाता है."
"उसका बाल सब जल जाता है और मसाला जूस में पक जाता है. फिर जली हुई खाल को छीलकर चूहा खा लिया जाता है. मुसहर समाज इसी तरह चूहा खाता है और मैंने भी चूहा खाया है. इसलिए हमें मालूम है कि वो लोग कैसे सोचते हैं और क्या सोचते हैं."
इसके कई बरस बाद एक बार मैंने लालू प्रसाद यादव से संपर्क करना चाहा तो पता चला कि उन तक पहुँचने के लिए प्रेम गुप्ता के मार्फ़त जाना पड़ेगा.
सीबीआई छापे
प्रेम गुप्ता को लालू यादव के क़रीबी उद्योगपतियों में गिना जाता है और वो राष्ट्रीय जनता दल की ओर से राज्यसभा सदस्य भी हैं.
सीबीआई ने बीते जुलाई महीने में लालू परिवार के अलावा जिन लोगों पर छापा मारा उनमें प्रेम गुप्ता की पत्नी भी शामिल थीं.
प्रेम गुप्ता जैसे बड़े उद्योगपति और उनकी पत्नी ने कभी मुसहरों के साथ रहकर चूहा नहीं खाया होगा, पर क्या लालू प्रसाद यादव भी भुने हुए क्रोसना चूहे का स्वाद भूल गए होंगे?
कभी मिलना होगा तो ये सवाल ज़रूर पूछना चाहूँगा.
( बीबीसी हिंदी के रेडियो संपादक राजेश जोशी का ये नज़रिया 9 जुलाई, 2017 को प्रकाशित हो चुका है.)
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