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बिहार: क्या होगा महागठबंधन का भविष्य?
- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रविवार को पार्टी कार्यकारिणी के सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा कि कांग्रेस ने पहले गांधी के विचारों को छोड़ा आगे चलकर नेहरू को भी त्याग दिया. कांग्रेस बिहार की नीतीश सरकार में शामिल है.
ये कोई पहला मौका नहीं है जब नीतीश कुमार ने महागठबंधन के सहयोगी दलों पर निशाना साधा है. राष्ट्रपति चुनाव को लेकर भी नीतीश सहयोगी दलों से अलग राह चुन चुके हैं.
वैसे राष्ट्रपति चुनाव के लिए 22 जून को मीरा कुमार की उम्मीदवारी की घोषणा के साथ बिहार के सत्तारुढ़ गठबंधन में जुबानी-जंग शुरू हुई थी. यह जंग बुधवार को मीरा कुमार के नामांकन वाले दिन शांत होती दिखी.
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने बुधवार को ही रांची में दोहराया कि महागठबंधन अटूट है. उन्होंने अपने अंदाज़ इसके बाद ये भी कहा, "अगर कोई इसे तोड़ने के लिए छेनी चलाएगा तो छेनी टेढ़ी हो जाएगी."
इस बीच 27 अगस्त को राजद पटना में 'बीजेपी हटाओ, देश बचाओ' रैली करने जा रहा है लेकिन अब ख़बर आ रही है कि जनता दल (यूनाइटेड) इसमें शामिल नहीं होगा.
जदयू के राष्ट्रीय महासचिव श्याम रजक ने समाचार एजेंसी एएनआई को कहा है, "यह राजद की रैली है, कोई राजद और जदयू की संयुक्त रैली नहीं है. इसलिए हमें क्यों इसमें भाग लेना चाहिेए?"
मंगलवार को जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता केसी त्यागी ने यह कहते हुए राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया था कि जदयू एनडीए में ज़्यादा सहज था. मगर उन्होंने बुधवार को अपने बयान पर सफ़ाई भी दी और कहा कि महागठबंधन 2025 तक चलेगा.
'गठबंधन में इतना लड़ाई-झगड़ा चलता रहता है'
इस सबके बीच बीबीसी ने सियासी घमासान पर जदयू और राजद के आम कार्यकर्ताओं का मन टटोलने की कोशिश की. बीबीसी ने उनसे जाना कि गठबंधन के भविष्य को लेकर वे क्या सोचते हैं?
गठबंधन के दोनों दलों के कार्यकर्ता भी अभी इसे अटूट बता रहे हैं. दिलचस्प यह कि इसके लिए वे ऐसे कई व्यवहारिक और ज़मीनी वजहें बताते हैं जिसे दोनों दलों के नेता 'ऑन रिकॉर्ड' कहने से बचते हैं.
पटना में बीरचंद पटेल पथ पर बिहार के तीनों बड़े दलों के प्रदेश कार्यालय हैं. जदयू और राजद के ऑफिस तो लगभग आमने-सामने हैं.
जदयू कार्यालय के ठीक बाहर मधुबनी से आए विश्वनाथ मंडल से मुलाकात होती है. वे कहते हैं, "एक कोख से जन्म लेने वाले भाई भी लड़ते हैं ये तीनों दल तो अलग-अलग मां के बेटे हैं. गठबंधन में इतना लड़ाई-झगड़ा चलता रहता है."
जबकि राजद के मधेपुरा सदर के अध्यक्ष तेज नारायण यादव बताते हैं, "पहले तो लग रहा था कि गठबंधन नहीं बचेगा. लेकिन बड़े नेताओं के संयम रखने की हिदायत के बाद अब सब ठीक लग रहा है."
'बहुत ज़रूरी है जातीय इक्वेशन'
जदयू प्रदेश कार्यलय के अलग-अलग कमरों में बैठे नेताओं-कार्यकर्ताओं के बीच भी अभी सबसे ज़्यादा चर्चा सियासी वार-पलटवार की ही है.
यहां मौजूद राजकुमार सिंह गठबंधन के लंबी उम्र की वजह बताते हैं, "चुनावी राजनीति में जातीय समीकरण बहुत ज़रूरी होता है. अभी दोनों दल अलग होकर कोई जीतने लायक इक्वेशन बनाने की हालात में नहीं है. इस कारण यह गठबंधन अभी चलेगा."
वहीं जदयू के एक युवा नेता के मुताबिक लालू और उनका परिवार अभी भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरा है. ऐसे में सरकार में रहने से जो ढाल मिलती है उसे वो गठबंधन तोड़कर खोना नहीं चाहेंगे.
राजद कार्यकर्ता भी बहुत हद तब से इस वजह से इत्तेफाक रखते हैं लेकिन उनका ये भी मानना है कि महागठबंधन के 'विभीषण' ही भाजपा को भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के लिए माल-मसाला उपलब्ध करा रहे हैं.
संघ की पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार को समर्थन
राजद के बुनकर प्रकोष्ठ के अध्यक्ष मोहम्मद जाहिद अंसारी मानते हैं, "शुरुआती बयानबाजी से कार्यकर्ताओं को तकलीफ़ हुई थी. लेकिन अब सब फिर से पटरी पर लौट रहा है. सेक्युलरिज़म और गैर-भाजपावाद के आधार पर यह गठबंधन बना रहेगा."
लेकिन जदयू कार्यकर्ता, खासकर अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले नेता-कार्यकर्ता, इस सवाल पर असहज दिखे कि संघ-मुक्त भारत बनाने की अपील और पहल करने वाले नीतीश कुमार ने संघ की पृष्ठभूमि वाले एक उम्मीदवार का समर्थन क्यों किया?
राजद के कई नेता-कार्यकर्ता गठबंधन की मजबूती का 'शरद यादव फैक्टर' भी बताते हैं. उनके दावों के मुताबिक अगर नीतीश कुमार ने गठबंधन तोड़ा तो करीब दो दर्जन विधायक शरद यादव के नेतृत्व में जदयू से अलग होकर राजद के साथ आएंगे.
वो मानते हैं कि इस टूट-फूट का डर भी नीतीश कुमार को गठबंधन तोड़ने से रोक रहा है.
गौरतलब है कि ऐसी ख़बरें आती रहती है कि काफ़ी वरीय होने के बावजूद अब शरद यादव की जदयू में बहुत कम चलती है. बताया जाता है कि वो रामनाथ कोविंद को समर्थन देने के पक्ष में भी नहीं थे.
आपसी फाय़दे की है बात
किसी दल के सत्ता में आने पर नेता-कार्यकर्ताओं को बोर्ड, निगमों और बीस सूत्री समितियों के अध्यक्ष-सदस्यों के रूप में मौक़ा मिलता है. लेकिन बिहार में महागठबंधन सरकार का डेढ़ साल से ज्यादा समय बीत चुका और अब भी ऐसे दर्जन भर से अधिक प्रमुख बोर्ड-निगमों और हर जिले में बीस सूत्री समितियों का गठन होना बाकी है.
ऐसे में दोनों दलों के नेता-कार्यकर्ता सत्ता में भागीदारी में अपने मौके की आस में भी ये चाह रहे हैं कि सरकार चले. इन्हें आस है कि सरकार चलेगी तो देर-सबेर ये पद भी भरे जाएंगे.
इस आस में राजद के लोग सरकार के लिए दुआएं ज़्यादा मांग रहे हैं, वहीं जदयू वाले थोड़ा निश्चिंत नज़र आते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि नीतीश राजद न सही भाजपा के सहारे मुख्यमंत्री बने रहेंगे.
वरिष्ठ भाजपा नेता सुशील मोदी ने भी बुधवार को इस यकीन को पुख्ता किया था.
उन्होंने कहा, "नीतीश हिम्मत दिखाएं. राज्य में अगर गठबंधन टूटता है तो हम राजनीतिक अस्थिरता पैदा नही होने देंगे."