You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
लालू-नीतीश के बीच दरार है लेकिन सरकार सुरक्षित
- Author, संजय कुमार
- पदनाम, निदेशक, सीएसडीएस
लालू प्रसाद यादव उत्तर प्रदेश विधान सभा के अगले चुनावों के लिए मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी का प्रचार करने को राज़ी हो गए हैं.
लालू के चुनाव प्रचार का समाजावादी पार्टी को कोई फ़ायदा हो या न हो, लेकिन इसे 'गठबंधन धर्म' के उल्लंघन के तौर पर देखा जा रहा है, जहां गठबंधन का एक सहयोगी दूसरे की आलोचना करेगा या कम से कम आलोचना करनेवालों के साथ होगा.
भले ही यह अपने राज्य में नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्य में हो रहा हो.
आख़िरकार उत्तर प्रदेश चुनावों में जेडीयू और समाजवादी पार्टी एक दूसरे के ख़िलाफ़ चुनाव मैदान में होगी.
इन चुनावों के लिए जेडीयू का अजीत सिंह के राष्ट्रीय लोक दल के साथ गठबंधन की भी संभावना है.
बिहार में नीतीश कुमार के साथ सत्ताधारी गठबंधन का सहयोगी होने के बाद भी लालू यादव, मुलायम के लिए चुनाव प्रचार करेंगे.
इस दौरान वो जेडीयू और आरएलडी के ख़िलाफ़ भी बोलेंगे, जिससे लालू और नीतीश के रिश्ते बेहतर तो नहीं बनेंगे, बल्कि रिश्तों में थोड़ी बहुत कड़वाहट ही आ सकती है.
लालू प्रसाद यादव क़ानूनी वजहों से बिहार के मुख्यमंत्री नहीं बन सकते हैं, लेकिन वो नीतीश कुमार को इस बात का एहसास दिलाने से नहीं चुकते कि उनके पास नीतीश से ज़्यादा नहीं, तो बराबर ताक़त ज़रूर है.
अगर ऐसा नहीं था, तो लालू अपने बेटे तेजस्वी यादव के लिए बिहार के उप मुख्यमंत्री पद के लिए सौदा क्यों करते? जबकि तेजस्वी यादव पहली बार विधायक बने थे.
भले ही आरजेडी और जेडीयू सरकार में सहयोगी हों और मुख्यमंत्री का पद जेडीयू के पास हो, लेकिन आरजेडी की रणनीति नीतीश कुमार पर लगातर दबाव बनाए रखने की है.
इसके पीछे मक़सद यही है कि नीतीश को लालू की ताक़त का एहसास होता रहे.
मुलायम सिंह यादव के लिए चुनाव प्रचार कर, लालू यही दिखाना चाहते हैं कि वो अब भी बहुत लोकप्रिय हैं.
लालू दिखाना चाहते हैं कि उनकी लोकप्रियता किसी सीमा से बंधी नहीं है. वो अब भी न केवल बिहार, बल्कि बिहार के बाहर भी वोटों को आकर्षित कर सकते हैं.
यह भी हो सकता है कि नीतीश कुमार को दूसरे ग़ैर बीजेपी और ग़ैर कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री पसंद करते हों.
नरेंद्र मोदी का विरोध करने के लिए शायद नीतीश कुमार उन सभों की तुलना में सबसे ज़्यादा पसंद किए जाते हों.
लालू के इस प्रयास के पीछे एक मक़सद यह भी हो सकता है कि उन्हें लगता होगा कि कुर्सी से दूर रहने की वजह से ही वो नीतीश से कम लोकप्रिय हैं.
हो सकता है कि लालू प्रसाद का मुलायम के लिए चुनाव प्रचार करने से नीतीश से उनके रिश्ते मौजूदा दौर से ज़्यादा ख़राब हालात में पहुंच जाएं.
लेकिन 2015 के विधान सभा चुनावों के दौरान लालू और नीतीश के एक साथ आ जाने को, अगर कोई इन दोनों के बीच नई दोस्ती के रूप में देखता है, तो वह बड़ी भूल कर रहा होगा.
ये दोनों ही नेता क़रीब दो दशकों तक एक दूसरे के घोर विराधी रहे हैं. इन दोनों का एक साथ आ जाना कोई दोस्ती नहीं, बल्कि पूरी तरह से एक अवसरवादी सिद्धांत है.
इसके पीछे बिहार में बीजेपी को पराजित करना ही एक मात्र मक़सद था. इन दोनों नेताओं का दुश्मन एक ही था और इसलिए दोनों एक साथ आ गए.
यह सच है कि दोनों बीजेपी को बूरी तरह मात देने में सफल रहे, लेकिन दोनों के बीच शुरू से ही कई मुद्दों पर मदभेद रहा है.
उसके बाद इस नए मसले ने उन मतभेदों की सूची में एक और इज़ाफ़ा ही किया है. शराबबंदी से लेकर शहाबुद्दीन के बयानों तक कई एसे मुद्दे हैं, जिनकी वजह से दोनों के बीच मदभेद रहे हैं.
बिहार की गठबंधन सरकार कुछ समस्याओं के साथ ही शुरू हुई थी और तब से लेकर अब तक कई समस्याओं के साथ यह सरकार एक साल पूरे करने वाली है.
लेकिन इस बात की कल्पना करना मुश्किल है कि यह गठबंधन ऐसे मुद्दों की वजह से टूट जाएगा.
इन दोनों नेताओं को अच्छी तरह पता है कि वो एस साथ होने की वजह से ही सत्ता में हैं.
अगर उनका गठबंधन टूटा, तो वो राज्य में बीजेपी के लिए रास्ता खोल देंगे.
दोनों नेताओं का राजनीतिक दुश्मन एक है और वही अगले चुनाव तक इन दोनों को एक साथ जोड़ कर रखेगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं. प्रोफ़ेसर संजय कुमार सीएसडीएस के निदेशक हैं.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)