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ब्लॉग: बीजेपी के बयान बहादुरों को नरेंद्र मोदी की डाँट
- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, रेडियो एडिटर, बीबीसी हिंदी
बात यहाँ तक बढ़ गई कि ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बीजेपी के बयान बहादुरों से कहना पड़ा - ठहर जाओ, हर मुद्दे पर कैमरा देखते ही बयान न देने लगो. संयम में रहो.
उन्होंने नमो ऐप के ज़रिए बीजेपी के नेताओं को सचेत किया है कि कुछ भी बोल देना ठीक नहीं है और कहा,"हम ही कुछ ग़लतियाँ करके मीडिया के लोगों को मसाला दे देते हैं."
हालाँकि, उन्होंने साफ़-साफ़ नहीं बताया कि बीजेपी के किस नेता की "ग़लतियों" ने उनको व्यथित किया है.
इस तरह की स्वीकारोक्तियाँ मोदी की ओर से कम ही आती हैं और अगर कभी मोदी ने अफ़सोस जताया भी है तो उसमें अफ़सोस कम तोहमत ज़्यादा होती है.
मोदी की शुक्रगुज़ार हो मीडिया
उन्होंने गुजरात के दंगों में मुसलमानों के मारे जाने पर अफ़सोस जताते हुए सवाल किया तो था कि "छोटा कुत्ते का बच्चा भी कार के नीचे आ जाता है तो हमें पेन फ़ील होता है, या नहीं?"
मीडिया को मोदी का शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि पिछले चार साल में, बल्कि उससे भी पहले गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए भी, उन्होंने मीडिया को प्रचुर मात्रा में ख़ुद ऐसा मसाला मुहैया करवाया है.
पंद्रह बरस पहले गुजरात की चुनावी सभाओं में जब मोदी मुसलमानों और ईसाइयों को अलग चिन्हित करने के लिए पाकिस्तान के फ़ौजी डिक्टेटर को ललकारते हुए ज़ोर देकर मियाँ मुशर्रफ़ कहते थे और तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त जे एम लिंगदोह पर हमला करते हुए उनके नाम के अलग-अलग हिज्जों को उनकी ईसाई पहचान स्थापित करने के लिए बार-बार जेम्स-माइकेल-लिंगदोह कहकर पुकारते थे, तब उन्हें ये समझाने वाला कोई नहीं था कि ऐसे बयानों से "देश का भी नुक़सान होता है और दल का भी नुक़सान होता है."
अपने ऐसे ही बयानों को उचित ठहराने के लिए मोदी कई बार कह चुके हैं कि चुनावों के दौरान जनता को एजुकेट करने के लिए कई बातें कही जाती हैं.
उनके बयानों के साथ-साथ गंभीर मामलों पर उनकी चुप्पी से भी बीजेपी के नेता-कार्यकर्ता और समर्थक प्रेरणा लेते रहे हैं.
मोदी जैसे क्यों न हों मोदी-भक्त
जब देश का प्रधानमंत्री अपने राजनीतिक विरोधियों की आलोचना करते हुए निजी हमलों पर उतर आता हो तो उसके व्यक्तित्व और कृतित्व से प्रेरणा लेने और फ़ायदा उठाने वाले बाक़ी नेता और कार्यकर्ता चार हाथ आगे क्यों न बढ़ें?
चुनाव से पहले मोदी हमेशा राहुल गाँधी पर युवराज कहकर कटाक्ष करते थे.
चुनाव जीतने पर भी उन्होंने निजी कटाक्ष की इस आदत को छोड़ा नहीं और संसद के अंदर बहस के दौरान कहा - कुछ लोगों की उम्र बढ़ जाती है, लेकिन मानसिक विकास नहीं हो पाता.
व्यंजना में कही गई इन बातों को डी-कोड करने की ज़रूरत ही नहीं थी. सबको मालूम था कि वो किस पर हमला कर रहे हैं.
जब नहीं रही समझने की ज़रूरत
अगर कहीं कोई शक शुबहा रह भी गया हो तो उपराष्ट्रपति पद से रिटायर हो रहे हामिद अंसारी के विदाई समारोह में नरेंद्र मोदी ने उस परदेदारी को भी झटक कर किनारे फेंक दिया.
उन्होंने हामिद अंसारी को भरे सदन में लगभग साफ़-साफ़ शब्दों में कह दिया कि 'आपका ज़्यादातर समय मुसलमानों और उनके मुद्दों के बीच ही गुज़र गया और आप उसी दायरे में रहे'. उन्होंने कहा, "रिटायरमेंट के बाद भी ज़्यादातर काम आपका वही रहा - चाहे माइनॉरिटी कमीशन हो या अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी हो, तो एक दायरा आपका वही रहा."
क्या ये सब अनायास कही गई बातें थीं? क्या काँग्रेस की रेणुका चौधरी की हँसी पर प्रधानमंत्री मोदी को शूर्पणखा की याद आना भी एक इत्तेफ़ाक़ था?
जब मोदी का मौन था सहमति
प्रधानमंत्री पद पर आसीन सत्तारूढ़ पार्टी के मोदी जैसे सबसे क़द्दावर नेता के ऐसे बयान गली-मोहल्लों में काम करने वाले हिंदुत्व के फ़ुटसोल्जर को कुछ कर गुज़रने को प्रेरित करते हैं.
और आप देखते हैं कि कठुआ में आठ साल की बच्ची या उन्नाव में नाबालिग़ लड़की से बलात्कार का मामला हो, अख़लाक़, पहलू ख़ान, जुनैद की लिंचिंग हो, शंभूनाथ रैगड़ के हाथों अफ़राजुल का क़त्ल हो, झारखंड में गाय-बैल ख़रीद रहे मुसलमानों की हत्या हो - हर घटना को किंतु-परंतु लगाकर उचित ठहराने वाला संघ परिवार का कोई न कोई बयान बहादुर सीना ठोंककर आगे आ जाता है.
इनमें सिर्फ़ छोटे कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि केंद्रीय मंत्री, सांसद, विधायक और पार्टी के पदाधिकारी भी शामिल होते हैं.
सांसद साक्षी महाराज नाथूराम गोडसे को राष्ट्रभक्त कहते हैं.
केंद्रीय मंत्री संतोष कुमार हेगड़े एलान करते हैं कि बीजेपी संविधान को बदलने के लिए ही आई है.
हरियाणा में बीजेपी सरकार के मंत्री अनिल विज नरेंद्र मोदी को महात्मा गाँधी से बड़ा बताते हैं.
बलात्कार के कारणों पर मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री कैलाश विजयवर्गीय कहते हैं कि सीता लक्ष्मण रेखा पार करेंगी तो रावण हरण करेगा ही.
और इन सबके वैचारिक गुरु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत पाश्चात्य संस्कृति को बलात्कार का कारण बताते हैं.
ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मौन का सिर्फ़ एक अर्थ निकाला जा सकता है -- सहमति.
लेकिन अब मोदी क्यों बोले?
लेकिन मौन रहने वाले प्रधानमंत्री मोदी को अचानक ये क्यों महसूस हुआ कि बात-बेबात बयान देने वाले पार्टी के नेताओं के कारण पार्टी की छवि को नुक़सान हो रहा है?
क्यों उन्हें नमो ऐप के ज़रिए कहना पड़ा, "हमें अपने आपको संयम में रखना पड़ेगा. हर चीज़ पर जिसे बोलने की ज़िम्मेदारी है उसी को बोलना चाहिए. अगर हर कोई बयानबाज़ी करता रहेगा तो इश्यूज़ बदल जाते हैं, देश का भी नुक़सान होता है, दल का भी नुक़सान होता है"?
पिछले दिनों जिस तरह देश के कई हिस्सों में दलितों, किसानों, महिलाओं और छात्र-छात्राओं ने अलग अलग मुद्दों पर सड़कों पर उतर कर विरोध दर्ज किया है, उसे देखते हुए देश के नुक़सान का तो पता नहीं पर नरेंद्र मोदी को दल के नुक़सान की चिंता ज़्यादा होनी चाहिए. और अब ये चिंता दिखने लगी है.
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