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क्या दिल्ली का झगड़ा हमेशा के लिए सुलझ गया है?
दिल्ली में उप-राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच अधिकारों को लेकर चल रही खींचतान पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को दोनों पक्ष अपनी जीत बता रहे हैं.
मगर इस बीच अहम सवाल यह खड़ा होता है कि क्या इस मामले पर आया सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला उप-राज्यपाल और मुख्यमंत्री के अधिकारों के बीच स्पष्ट रेखा खींच पाया है?
क्या यह माना जाए सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच झगड़े को हमेशा के लिए मिटा दिया है और आज के बाद कभी उप-राज्यपाल और दिल्ली सरकार के बीच गतिरोध की नौबत नहीं आएगी? इन सवालों के जवाब सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए 535 पन्नों के फ़ैसले में छिपे हैं.
बीबीसी संवाददाता आदर्श राठौर ने इन्हीं सवालों को लेकर बात की सुप्रीम कोर्ट की जानी-मानी वकील अवनि बंसल से. पढ़ें, क्या है उनका नज़रिया: -
सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रश्न क्या था?
पिछले कुछ महीनों से दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार और बीजेपी द्वारा नियुक्त लेफ़्टिनेंट गवर्नर के बीच अधिकारों को लेकर होड़ मची हुई थी और इस बात को लेकर संघर्ष चल रहा था कि किसके पास कितने अधिकार हैं. पांच जजों वाली संवैधानिक पीठ के सामने इसी विवाद को सुलझाने का प्रश्न था.
दिल्ली एक अलग तरह का राज्य है. यह पूर्ण राज्य नहीं है, बल्कि संवैधानिक रूप से केंद्र शासित प्रदेश है. मगर यह बाक़ी केंद्र शासित प्रदेशों से भी अलग है क्योंकि यहां मंत्रिमंडल है और विधानसभा भी है. दिल्ली को 1991 के क़ानून के हिसाब से अलग दर्जा भी मिला हुआ है और इसके लिए संविधान में अलग प्रावधान भी किया गया है.
इन हालात में दिल्ली सरकार के क्या अधिकार हैं और लेफ़्टिनेंट गवर्नर के क्या अधिकार हैं; और उनमें यदि मतभेद होता है तो किसकी चलेगी. इस पर दोनों पक्षों का अलग-अलग रुख़ था, इसीलिए यह मामला सुप्रीम कोर्ट में गया था.
क्या रहा कोर्ट का फ़ैसला?
यह रोमांचक है कि दिल्ली में शासन कर रही आम आदमी पार्टी और केंद्र में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता मीडिया में कह रहे हैं कि कोर्ट में उनकी जीत हुई है. दोनों ही ख़ुद को विजेता बता रहे हैं मगर ऐसा हो नहीं सकता.
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से एक बात तो साफ़ हो जाती है कि दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी जो बातें अदालत में रखीं, उनमें पूरी सच्चाई नहीं थी. जो सच है, वह दोनों के बीच कहीं पर है.
कोर्ट ने कहा कि देखिए, 'दिल्ली को हम पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दे सकते, जो आम आदमी पार्टी चाहती है.' सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली संविधान के हिसाब से एक केंद्र शासित प्रदेश ही है, इसे राज्य नहीं माना जा सकता.
वहीं दूसरे पक्ष का तर्क था कि लेफ़्टिनेंट गवर्नर राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त हैं इसलिए उनकी बात चलेगी और उन्हें मंत्रिमंडल की बात सुनने की ज़रूरत नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को भी नकारा.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली की संवैधानिक स्थिति को देखते हुए मंत्रिमंडल को अधिकार है कि वह कार्यकारी फ़ैसले ले सकता है. अगर लेफ़्टिनेंट गवर्नर के साथ उनका किसी तरह का मतभेद होता है तो एलजी उसे राष्ट्रपति तक लेकर जा सकते हैं, लेकिन हर मामले में नहीं.
बेहद गंभीर मामला या मुद्दा हो और उस पर असहमति बनती है तो सिर्फ उसी स्थिति में एलजी उस मामले को राष्ट्रपति तक ले जा सकते हैं.
यह जो पार्टियों के बीच गतिरोध बना हुआ था, उस हिसाब से कोर्ट का फ़ैसला बहुत महत्वपूर्ण है. जैसे आम आदमी पार्टी कह रही थी कि एलजी हर बात में दखलअंदाज़ी कर रहे हैं. तो कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना संविधान के हिसाब से ग़लत है.
तो क्या विवाद मिट गया है?
आगे क्या होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है क्योंकि पुदुच्चेरी का उदाहरण लें तो वहां के मुख्यमंत्री की भी लेफ़्टिनेंट गवर्नर किरन बेदी के साथ खींचतान चल रही है. दिल्ली का यह कोई एक अनोखा मामला नहीं है.
ये समझना ज़रूरी है कि हमारा संविधान काफ़ी उदार है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान की जब हम व्याख्या करते हैं कि किसके क्या अधिकार हैं, उसकी क्या सीमाएं हैं, तब हमें समय और परिस्थितियों को भी देखना पड़ता है. ऐसे में यह लगभग नामुमकिन है कि कहीं पर लिख दिया जाए कि किसकी क्या सीमाएं हैं.
जब-जब नई बातें आती हैं, नए-नए लोग आते हैं, पार्टियों के बीच पावर डाइनैमिक्स बदलते हैं, तो समस्याएं आना स्वाभाविक है और आने वाले समय में भी हम ये समस्याएं देखेंगे. लेकिन कम से कम ये जो 535 पन्नों का फ़ैसला है, उसने यह बात तय कर दी कि आपको क्या मार्ग लेना है.
जब अलग-अलग पार्टी के लोग दिल्ली जैसे शहर को चलाते हैं तो आपस में सामंजस्य के साथ काम करना पड़ेगा. कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा है कि व्यक्ति उतना महत्व नहीं रखते जितना महत्व संवैधानिक मूल्यों का है.
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने ज़ोर दिया है कि लोगों और पार्टियों को निजी मतभेदों को छोड़कर आपकी समझ के साथ काम करना चाहिए.
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