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नज़रिया: आम आदमी पार्टी के ख़िलाफ़ भाजपा-कांग्रेस साथ क्यों?
- Author, प्रमोद जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
दिल्ली में केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ आम आदमी पार्टी के धरने के प्रति कांग्रेसी बेरुख़ी और विरोधी-एकता को लेकर कुछ बुनियादी सवाल खड़े हुए हैं. कांग्रेस पार्टी इस मामले में बीजेपी का निशाना ज़रूर रही है, पर उसके सीधे निशाने पर आम आदमी पार्टी है.
ममता बनर्जी समेत चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अरविंद केजरीवाल का समर्थन करके विरोधी-एकता में तड़का लगाने की कोशिश ज़रूर की, पर कांग्रेस के रुख़ के कारण इस पर ठंडा पानी पड़ गया. कांग्रेस इस समर्थन में शामिल नहीं हुई.
सवाल है कि ऐसा क्यों है? कर्नाटक और बिहार में एकता की धुरी बनने के बावजूद दिल्ली में वह आम आदमी पार्टी से कन्नी क्यों काट रही है? उसे बीजेपी की 'बी' टीम क्यों बता रही है?
'आप' का शोशा
इस परिघटना के दो हफ्ते पहले आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन शोशा छोड़ा था. पर, दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष अजय माकन ने तभी ट्वीट किया, जब दिल्ली की जनता केजरीवाल सरकार को ख़ारिज कर रही है, तो हम उसकी मदद में क्यों आएंगे?
उस वक़्त 'आप' ने ऐसा ज़ाहिर किया था कि जैसे पहल कांग्रेस की तरफ़ से है. पर उसके बाद से कांग्रेस ने लगातार अपनी बेरुख़ी ज़ाहिर की है. सोमवार को एक संवाददाता ने जब अजय माकन से चार मुख्यमंत्रियों की पहल पर सवाल किया, तो उन्होंने कहा, "क्या पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और सीपीएम राज्य में एक साथ आएंगे?"
उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि उन्हें पूरी जानकारी दी गई है." दिल्ली संघ-शासित प्रदेश है. एक राज्य के मुख्यमंत्री की शक्तियां दिल्ली के मुख्यमंत्री के मुकाबले अलग हैं. लगभग यही बात पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कही है.
यह कठोर रुख़ माकन तक सीमित नहीं है. पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट किया, "दिल्ली के मुख्यमंत्री एलजी ऑफिस में धरने पर बैठे हैं, बीजेपी सीएम के घर धरना दे रही है. नौकरशाह प्रेस कांफ्रेंस कर रहे हैं. प्रधानमंत्री आंखें मूँदे बैठे हैं. जनता इस ड्रामे से परेशान है."
ममता की जल्दबाजी
लगता है कि विरोधी-एकता के सूत्रधार एक-दूसरे को ठीक से समझ नहीं पाए हैं. चारों मुख्यमंत्रियों ने कांग्रेस की संवेदनशीलता को ध्यान में नहीं रखा और ख़ुलेआम इस मामले को उठाकर जल्दबाज़ी की है.
सच है कि 2015 में बिहार में महागठबंधन की सरकार बनते वक़्त और पिछले महीने कर्नाटक के शपथ-समारोह में अरविंद केजरीवाल भी मंच पर थे. पर सोनिया गांधी के नेतृत्व में विरोधी-एकता की बैठकों में केजरीवाल को नहीं बुलाया गया.
एकता के अंतर्विरोध
यह भी सच है कि मोदी की केंद्र में विजय के बाद यह पहला मौका था, जब मुख्यमंत्रियों ने उन्हें इस तरह से घेरा. फिर भी कांग्रेस प्रसन्न नहीं है. विरोधी-एकता के अंतर्विरोध उलझे हैं. कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के हित दिल्ली और पंजाब में टकराते हैं.
ये अंतर्विरोध केवल दिल्ली में ही नहीं हैं. अजय माकन ने बंगाल का ज़िक्र किया. आंध्र और तेलंगाना में टीडीपी और टीआरएस के अंतर्विरोध हैं. शिवसेना दिल्ली में 'आप' का साथ दे रही है, पर महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी के साथ उसका गठबंधन सम्भव नहीं. तमिलनाडु में डीएमके और एआईएडीएमके गठबंधन असम्भव है.
हवा का बदलता रुख़
विरोधी-एकता में कांग्रेस की दिलचस्पी है ज़रूर, पर उसे अपनी सुधरती स्थितियाँ भी नज़र आ रहीं हैं. पार्टी के अंदरूनी लोग कह रहे हैं कि कुछ समय इंतज़ार कीजिए, हवा का रुख़ बदल रहा है.
वे राजस्थान, मध्य-प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों का इंतज़ार कर रहे हैं, जहाँ सफलता की आशा है. उन्हें यह भी लगता है कि आम आदमी पार्टी का भविष्य ठीक नहीं है. यों भी उसने कांग्रेस के जनाधार को काटा है.
दिल्ली के पिछड़े, झुग्गी-झोपड़ी वाले, मुसलमान और व्यापारी उसके साथ रहे हैं. वे 'आप' के साथ चले गए थे. यह वोटर वापस आ रहा है.
इंतज़ार करेगी कांग्रेस
आगामी चुनाव को लेकर 'आप' ने बड़ी महत्वाकांक्षाएं पाल ली हैं. उसके साथ मोल-भाव करने में दिक़्क़त है. दिल्ली में कांग्रेस जूनियर पार्टनर नहीं बनेगी, बल्कि कुछ इंतज़ार करेगी. कांग्रेस महा-गठबंधन के केंद्र में रहना चाहेगी, परिधि में नहीं. ममता बनर्जी तीसरे मोर्चे के जिस विचार को बढ़ा रहीं हैं, उसके केंद्र में क्षेत्रीय क्षत्रप हैं.
इन फॉर्मूलों में समन्वय सम्भव है. पर यह समन्वय चुनाव-पूर्व कितना होगा और चुनावोत्तर कितना, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है. असम्भव हालात में जोड़ बैठाना ही राजनीति है. कर्नाटक में यह बात स्थापित हुई है. पर यही फॉर्मूला हर जगह लागू नहीं होगा.
अर्दब में 'आप'
धरना देकर 'आप' ने ख़ुद को अर्दब में ले लिया है. जनवरी 2014 में ऐसे ही धरने को ख़त्म करने के तब के एलजी ने 'आप' को बहाना दिया था.
अजय माकन ने पूछा है, एसी कमरों में धरना देकर 'आप' क्या साबित करना चाहती है? राजधानी में भारी प्रदूषण के लिए वह ज़िम्मेदार है. उसके कार्यकाल में सार्वजनिक-परिवहन व्यवस्था ठप हुई है. दस-दस घंटे की बिजली कटौती हो रही है. लोग परेशान हैं.
सड़क पर कांग्रेस
पानी की किल्लत को लेकर दिल्ली कांग्रेस एक महीने से 'जल-सत्याग्रह' चला रही है. माकन कहते हैं कि दिल्ली प्यासी है. बीजेपी और 'आप' एयर कंडीशंड कमरों में बैठे हैं. कांग्रेस का कार्यकर्ता तपती गर्मी में सड़कों पर जनता की लड़ाई लड़ रहा है.
दिल्ली कांग्रेस ने आपसी अंतर्विरोधों को दूर किया है. पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और अजय माकन के बीच रिश्ते सुधरे हैं. अरविंद सिंह लवली जैसे नेता, जो पार्टी छोड़कर चले गए थे, वापस लौट आए हैं. पार्टी कार्यकर्ता का मनोबल बढ़ रहा है. कांग्रेस को अपनी स्थिति बेहतर होती नज़र आ रही है. उसके हौसले बढ़ रहे हैं.
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