नज़रिया: चुनावों पर निशाना साध पाएगी 'सर्जिकल स्ट्राइक' की रणनीति?

सर्जिकल स्ट्राइक

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    • Author, राधिका रामासेशन
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में कथित टेरर लॉन्च पैड्स पर की गई 'सर्जिकल स्ट्राइक' का वीडियो दो साल बाद टीवी चैनलों पर जारी किया जाना महज़ कोई संयोग की बात नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि इसके पीछे कोई मकसद ना हो.

सेना के उत्तरी क्षेत्र के कमांडर रहे और 2016 के सितंबर में कथित सर्जिकल स्ट्राइक के प्रभारी लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) डी एस हुड्डा ने एक अखबार से कहा है कि इन वीडियोज़ को ऑपरेशन के तुरंत बाद "सबूत" के तौर पर पेश किया जाना चाहिए था, क्योंकि उस वक्त पाकिस्तान इससे इनकार कर रहा था.

टेलीविज़न पर इन वीडियो क्लिपिंग्स को बार-बार दिखाया जा रहा है. कई चैनल तो ऑपरेशन का नाट्य रूपांतरण भी दिखा दिया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और ऑपरेशन में शामिल दूसरे बड़े अधिकारियों की बनावटी आवाज़ें भी सुनाई जा रही हैं.

वीडियो कैप्शन, क्या है सर्जिकल स्ट्राइक?

इस तरह सर्जिकल स्ट्राइक को मई 2011 में अमरीका के "ऑपरेशन नेपच्यून स्पीयर" से भी बड़े ऑपरेशन के तौर पर दिखाया जा रहा है, जिसमें ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान के ऐबटाबाद में घेरकर अमरीकी सेना ने मार दिया था.

हर साल की तरह बीजेपी ने इस साल भी 26 जून को आपातकाल की बरसी पर कांग्रेस पर खूब हमले बोले. इस साल तो ये हमले कुछ ज़्यादा ही तेज़ थे. और इसी बीच सर्जिकल स्ट्राइक के ये वीडियो भी सामने आ गए.

सर्जिकल स्ट्राइक

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'राष्ट्रवादी छवि का प्रमाणपत्र'

कथित सर्जिकल स्ट्राइक और आपातकाल के तार जुड़कर अति-राष्ट्रवाद और कांग्रेस विरोधी शक्तिशाली राजनीतिक नैरेटिव बनाते हैं. कम से कम बीजेपी की तो यही कोशिश है.

साल 2019 के आम चुनाव नज़दीक हैं, ऐसे में बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी राष्ट्रवादी छवि का प्रमाणपत्र देने का कोई मौका खोना नहीं चाहते. साथ ही वो कांग्रेस को भी एक ऐसी पार्टी के तौर पर पेश करना चाहते हैं जो भारत का हित नहीं चाहती.

गुरुवार को हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में रविशंकर प्रसाद से सवाल किया गया कि क्या सरकार और पार्टी सर्जिकल स्ट्राइक की जारी की गई वीडियो का राजनीतिक फ़ायदा लेना चाहती है, और क्यों इन वीडियो को उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल, गुजरात और कर्नाटक के चुनावों से पहले जारी नहीं किया गया. ये चुनाव सर्जिकल स्ट्राइक के बाद हुए थे. क्या चुनाव से पहले इन वीडियो को जारी ना करने की वजह ये थी कि इन राज्यों के बहुत से लोग सेना में हैं या पूर्व में रहे हैं.

इसमें कोई शक नहीं है कि स्ट्राइक ने यूपी, उत्तराखंड, हिमाचल और यहां तक की कर्नाटक में भी चुनाव को बीजेपी के पक्ष में करने में मदद की.

इसकी वजह ये थी की चुनावी राज्यों के लोगों ने नरेंद्र मोदी को "एक ऐसे मज़बूत और साहसी नेता" के रूप में देखा, जिसे देश ने इंदिरा गांधी के बाद नहीं देखा था.

नरेंद्र मोदी

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2019 का चुनावी कार्ड

हो सकता है कि बीजेपी को लगा हो कि एक चुनावी कार्ड, जिसे हवा अपने पक्ष में करने के लिए एक बार इस्तेमाल किया जा चुका हो, उसे दोबारा इस्तेमाल करने पर उतना फ़ायदा नहीं होगा.

उन्हें लगा होगा कि क्यों ना इस कार्ड को फिर से प्रभावी बनाने के लिए इसमें कुछ नया एलिमेंट जोड़ दिया जाए. यही सोचकर कथित सर्जिकल स्ट्राइक का ये वीडियो जारी किया गया.

ताकि जिन भी लोगों के दिमाग में सर्जिकल स्ट्राइक की सत्यता को लेकर शक है, उसे दूर किया जा सके. अब इस मुद्दे को 2019 तक ज़िंदा रखा जाएगा.

दूसरा, 2014 के आम चुनाव में लोगों ने मोदी के "विकास" के वादे पर यकीन करके वोट दिया. लेकिन वो इस वादे को पूरा करने में नाकाम रहे हैं और अब उनके विकास के नारे में कोई दम नहीं है.

नोटबंदी का मुद्दा बीजेपी को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड चुनाव में जीत दिलाने में कामयाब रहा. इसकी वजह ये थी की बीजेपी ने इस मुद्दे को वर्ग विशेष के साथ जोड़कर दिखाया.

नोटबंदी से लोगों को ये संदेश दिया गया था कि इससे देश के अमीर लोगों के अवैध धन को निकलवाया गया.

नोटबंदी

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नहीं पूरा हुआ 'विकास' का वादा

हालांकि नोटबंदी के कुछ महीनों बाद इसका असर अमीर, गरीब और मिडिल क्लास सभी पर पड़ने लगा. रोज़मर्रा के इस्तेमाल में आने वाली चीज़ों के दाम बढ़ने लगे, अर्थव्यवस्था लुढ़कने लगी, इसका सबसे ज़्यादा असर रियल एस्टेट, छोटे और मध्यम उद्योगों पर हुआ. बेरोज़गारी बढ़ने लगी, जिसकी सबसे ज़्यादा मार देश के उन युवाओं पर पड़ी जो चार साल पहले नरेंद्र मोदी को अपने मसीहा के रूप में देख रहे थे.

खबरों की मानें तो केंद्र सरकार की उज्जवला और इंद्रधनुष जैसी बड़ी योजनाएं ज़्यादा कामयाब नहीं रह सकीं. इनमें कई खामियां थीं और लोगों को इसका ज़्यादा फायदा भी नहीं मिला. ऐसे में "विकास" के नाम पर मोदी और बीजेपी क्या पेश करेंगे?

ऐसी स्थिति में बीजेपी अति-राष्ट्रवाद के अपने फार्मूले के साथ आगे बढ़ेगी. खासकर उत्तर और पश्चिम के उन राज्यों में जिनमें 2014 के चुनाव में पार्टी को सबसे ज़्यादा फायदा हुआ था.

ऑडियो कैप्शन, सर्जिकल स्ट्राइक से ज़्यादा मुश्किल था सुरक्षित वापस आना

कांग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद पर किए बीजेपी के हमलों पर गौर करने की ज़रूरत है. जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और बीजेपी का गठबंधन टूटने के बाद गुलाम नबी आज़ाद ने राज्य में केंद्र सरकार के ऑल-आउट ऑपरेशन पर सवाल उठाए थे और कहा था कि सैन्य कार्रवाई में चरमपंथियों से ज़्यादा आम नागरिक मारे गए.

इसपर बीजेपी ने आज़ाद को देश-विरोधी, और चरमपंथी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का दोस्त करार दिया. और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से गुलाम नबी आजाद के बयान पर माफ़ी मांगने को कहा.

इसके बाद से आज़ाद को बोलते नहीं देखा गया.

सेना

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राष्ट्रवाद की सीख

गुरुवार को बीजेपी ने एक बार फिर कांग्रेस को उस वक्त निशाने पर लिया जब पार्टी के एक प्रवक्ता ने बीजेपी पर कथित सर्जिकल स्ट्राइक का वीडियो जारी कर मतदातों को लुभाने की कोशिश का आरोप लगाया.

बीजेपी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस की इन बातों से पाकिस्तान में चरमपंथियों के हौंसले बढ़ेगे.

बीजेपी ने कांग्रेस को चुनौती दी कि वो सामने आकर ये बताए कि वो कथित सर्जिकल स्ट्राइक को सही मानती है या गलत.

दरअसल, बीजेपी ने 1999 के कारगिल युद्ध से सीखा है कि कैसे राष्ट्रवाद से जनता के ज़रिए भावनाओं को प्रभावित किया जा सकता है.

उस वक्त बीजेपी के अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे. पाकिस्तान ने भारत प्रशासित कश्मीर में घुसपैठ कर दी थी, जिसके बाद भारतीय सेना ने उनसे लड़कर कश्मीर के उस हिस्से को दोबारा अपने कब्ज़े में ले लिया था.

इसके बाद कांग्रेस के एक सांसद और प्रवक्ता राशिद अलवी ने पार्टी लाइन पर बोलते हुए कहा कि कारगिल युद्ध का जश्न नहीं मनाया जाना चाहिए, क्योंकि "युद्ध हमारे ही इलाके में लड़ा गया था".

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कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों ने संघर्ष पर रिपोर्ट की मांग की. कांग्रेस ने कारगिल युद्ध से पहले वाजपयी की लाहौर बस डिप्लोमेसी का मज़ाक भी उड़ाया था.

टीवी चैनलों पर ताबूतों में लौटे सैनिकों के शवों की निराशाजनक तस्वीरें दिखाई गईं. कांग्रेस को तुरंत इस बात का एहसास हुआ कि उसके पैंतरे ने काम नहीं किया.

1999 के अक्टूबर में हुए कारगिल युद्ध के बाद बीजेपी ने भारी मतों से चुनाव जीता और सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी.

राष्ट्रवाद की लहर ने वाजपेयी सरकार के 1998-99 के दूसरे कार्यकाल की समस्याओं को छिपा दिया.

ऐसे समय में जब बीजेपी कांग्रेस को बैकफुट पर लाने की कोशिश कर रही है, क्या कांग्रेस को कथित सर्जिकल स्ट्राइक के वीडियो के मुद्दे को लेकर अपनी राय पर कायम रहना चाहिए.

आपातकाल के ख़िलाफ़ बीजेपी का अभियान उसके चुनाव का मुद्दा नहीं हो सकता.

प्रधानमंत्री युवाओं को आपातकाल के बारे में जानने के लिए कह रहे हैं और साथ ही कह रहे हैं कि युवा ये जानें कि नागरिक अधिकारों और बोलने की आज़ादी को खो देना कैसा होता है.

लेकिन युवाओं को आपातकाल से ज़्यादा चिंता रोज़गार हासिल करने और अपने छोटे-मोटे उद्योग चालू करने के लिए पैसा जुटाने की है. आज के आर्थिक हालात में ये दोनों ही चीज़ें युवाओं को नहीं मिल रही हैं.

(ये लेखिका ने निजी विचार हैं. )

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