हार्ले-डेविडसन बाइक में ऐसा क्या है कि रईस इसके दीवाने हैं

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- Author, भरत शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
'ट्रेड वॉर अच्छी होती हैं और जीतने में आसान भी.' अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने मार्च में जब ये ट्वीट किया था तो उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि तीन महीने में उनकी ये बात उन्हें ही काटने को दौड़ेगी.
अमरीका ने यूरोपीय संघ (ईयू) से आने वाले स्टील और एल्यूमीनियम पर टैरिफ़ लगाया और बदले में ईयू ने अमरीका से आने वाले उत्पादों पर टैक्स बढ़ा दिया. इसके बाद जो हुआ, उससे ट्रंप भी चौंक गए.
जिस हार्ले-डेविडसन बाइक के लिए ट्रंप ने भारत से उलझने का फ़ैसला किया था, वही दिग्गज अमरीकी कंपनी अपना कुछ काम अब अमरीका से बाहर ले जाना चाहती है. ट्रंप ने कहा था कि भारत का इन बाइक पर 60-75% टैक्स लगाना ग़लत है और नरेंद्र मोदी ने इसे घटाकर 50% किया था.
हार्ले-डेविडसन दुनिया की जानी-मानी बाइक कंपनी है और फ़ोर्ब्स के मुताबिक साल 2018 (मई) में इसका मार्केट कैप सात अरब डॉलर तक पहुंच गया था.
भारत में इस कंपनी ने हाल में 17 नए मॉडल पेश किए हैं जिनके दाम 5 लाख रुपए से लेकर 50 लाख रुपए के बीच हैं. इस कंपनी की बाइक सुपरबाइक कही जाती हैं और ज़ाहिर है ज़्यादा दाम की वजह से ये ख़ास और रईस तबके की पहली पसंद हैं.
ट्रंप को क्यों गुस्सा आया?

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लेकिन हार्ले-डेविडसन को जो जंग तंग कर रही है, वो ट्रंप की तरफ़ से शुरू हुई थी और अब ख़ुद उनके हाथ भी जलाने लगी है.
ये ख़बर पढ़ने के बाद ट्रंप ने ट्वीट किया, ''हार्ले-डेविडसन कभी किसी दूसरे देश में नहीं बननी चाहिए! अगर वो (अमरीका से) बाहर जाते हैं तो ये उनके अंत की शुरुआत होगी. वो सरेंडर करेंगे तो मारे जाएंगे! जलवा ख़त्म हो जाएगा.''
ट्रंप ने हार्ले-डेविडसन का ज़िक्र करते हुए 'जलवा' शब्द इस्तेमाल किया. और इस कंपनी के लिए ये शब्द अक्सर इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन हार्ले-डेविडसन में ऐसा क्या है? ये कंपनी अमरीका और दुनिया के लिए इतनी अहम क्यों हैं?
भारी-भरकम शरीर वाली पावर बाइक को अमरीका अपनी पहचान के तौर पर क्यों देखता है? क्यों जब ये कंपनी बाइक बनाने के लिए अमरीका से बाहर निकलना चाहती है, तो राष्ट्रपति तक ख़फ़ा हो जाता है?
इन सारे सवालों के जवाब छिपे हैं उस कहानी में जिसकी शुरुआत 119 बरस पहले हुई थी और इस लंबे सफ़र में इस बाइक ने कई मील के पत्थर देखे हैं.
क्या ख़ास है हार्ले-डेविडसन में?
जाने-माने ऑटो एक्सपर्ट टुटू धवन ने बीबीसी से कहा, ''ये न केवल आज बल्कि सौ साल पहले की भी सबसे ख़ास बाइक थी. पहली वर्ल्ड वॉर हो या फिर दूसरी, हार्ले-डेविडसन बाइक ने दोनों में अहम भूमिका निभाई है.''

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''उस समय साफ़ सड़कें तो होती नहीं थीं, ऐसे में ये बाइक अपने अलग-अलग तरह के इस्तेमाल और मज़बूती की वजह से काफ़ी फ़ायदेमंद साबित होती थी. दूरदराज़ के इलाकों में यही मोटरसाइकिल पहुंचा करती थी.''
लेकिन जंग ख़त्म होने के बाद भी ये बाइक इतना बड़ा ब्रांड कैसे बन गई. उन्होंने कहा, ''जंग ख़त्म होने के बाद ये मोटरसाइकिल अमरीका के लिए प्रतीक बन गई. आपको ये जानकर हैरानी होगी कि इस बाइक का इंजन जो आवाज़ करता है, वो भी पेटेंटेड है.''
इन मोटरसाइकिलों के दाम लाखों में हैं, जो इन्हें ख़रीदते हैं वो ख़ास हैं और जो नहीं ख़रीद सकते, वो भी इनका ख़्वाब देखते हैं, ऐसे में इस क्रेज़ की वजह क्या है.
टुटू बताते हैं, ''भारत नहीं बल्कि पूरी दुनिया में इन्हें लेकर दीवानगी है और इसकी वजह है इनका सबसे अलग दिखना. दिल्ली जैसे शहर में फ़रारी लेकर क्या करेंगे? न तो ठीक से चला पाएंगे, न दौड़ा पाएंगे, फिर भी लोग इन्हें ख़रीदते हैं. ऐसा ही हार्ले-डेविडसन के साथ है.''
'ख़ास हैं इसे ख़रीदने वाले'

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टुटू धवन ने कहा कि इन बाइक्स को ख़रीदना एक स्टेटमेंट की तरह है. ''इन्हें ख़रीदने वाले लोग अलग स्टेटस वाले होते हैं. कोई आम आदमी ये बाइक नहीं ख़रीदता. फिर इन्हें ख़रीदने वाले लोगों का अपना ग्रुप होता है. वो लोग मिलते हैं, बात करते हैं, बाइक राइड करते हैं. ये एक कल्ट की तरह है.''
और भारत इन बाइक के लिए कितना अहम है, उन्होंने कहा, ''ये कोई मास मार्केट प्रोडक्ट नहीं है. अगर साल में तीन-चार हज़ार भी ऐसी बाइक बिक जाती हैं, तो कंपनी के लिए अच्छा है.''
ख़बरें ये भी उड़ीं कि अमरीका से बाहर प्रोडक्शन ले जाने के बारे में सोच रही हार्ले-डेविडसन भारत को अपना हब बना सकती है, लेकिन जानकार इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखते.
टुटू धवन ने कहा, ''मुझे नहीं लगता ऐसा होगा, बल्कि कंपनी यूरोप को हब बना सकती है.'' लेकिन जिस हार्ले-डेविडसन को ख़रीदकर लोग आज ख़ास हो जाते हैं, उसका इतना ख़ास हो जाना कोई इत्तेफ़ाक नहीं है.
हार्ले-डेविडसन कंपनी के मुताबिक विलियम हार्ले ने साल 1901 में ही उस इंजन का ब्लूप्रिंट तैयार कर लिया था, जो एक साइकिल में फ़िट हो सकता था.
कहां से कहां पहुंची हार्ले?

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साल 1903 में अमरीकी शहर विस्कोंसिन के मिलवॉकी में विलियम एस हार्ले, आर्थर और वॉल्टर (डेविडसन भाइयों) ने मिलकर एक छोटे से शेड में हार्ले-डेविडसन कंपनी की नींव रखी.
ये मोटरसाइकिल जिस फ़ैक्ट्री में बनी, वो 10 बाई 15 फ़ुट का एक कमरा था जिस पर लकड़ी की छत थी और इसके दरवाज़े पर उकेरा गया था हार्ले-डेविडसन मोटर कंपनी. शुरुआत विलियम और आर्थर ने की थी और उनके भाई वॉल्टर भी आगे चलकर इन कोशिशों में जुटे.
जब मोटरबाइक तैयार हुई तो ख़रीदार मिला हेनरी मेयर के रूप में जो इन नौजवानों का सहपाठी था और 1903 में आया मॉडल उन्होंने सीधा कंपनी संस्थापकों से ख़रीदा.
इसके अगले साल हार्ले-डेविडसन को पहला डीलर मिला शिकागो के सी एच लैंग के रूप में जिन्होंने बिज़नेस शुरू किया और इसकी शुरुआती तीन बाइक में से एक बेची.
साल 1905 इस ब्रांड के लिए काफ़ी अहमियत रखता है क्योंकि इसी साल हार्ले-डेविडसन की बाइक ने शिकागो में 15 मील की रेस जीती और इसमें उसे 19 मिनट लगे थे.
अमरीका से जापान तक

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साल 1907 में हार्ले-डेविडसन मोटर कंपनी वजूद में आई. इसका स्टॉक चार संस्थापकों में बांटा गया और स्टाफ़ का आकार बढ़ाकर दोगुना कर दिया गया था. फ़ैक्ट्री साइज़ भी बढ़कर दोगुना हो गया.
इसी साल आर्थर और वॉल्टर के तीसरे भाई विलियम ए डेविडसन ने अपनी नौकरी छोड़कर मोटर कंपनी जॉइन की.
इसके अगले साल वॉल्टर ने सातवें 'ऐनुअल फ़ेडरेशन ऑफ़ अमेरिकन मोटरसाइकलिस्ट एंड्योरेंस और रिलायबिलिटी कॉन्टेस्ट' में परफ़ेक्ट 7000 पॉइंट तक पहुंचने का कारनामा कर दिखाया. और इसके तीन दिन बाद वो FAM का रिकॉर्ड 188.234 मील प्रति गैलन तक ले गए. इससे ये फ़ायदा हुआ कि हार्ले-डेविडसन की मज़बूत मोटरसाइकिल की चर्चा दूर-दूर तक फैलने लगी.
कंपनी जब छह साल की हुई तो वी-टि्वन पावर्ड मोटरसाइकिल पेश की गई. हार्ले-डेविडसन के इतिहास में 45 डिग्री कंफ़िग्रेशन में दो सिलेंडर की ये तस्वीर मील का पत्थर साबित हुई.
साल 1910 में बार एंड शील्ड का लोगो पहली बार इस्तेमाल किया गया. इसके अगले साल अमरीकी पेटेंट ऑफ़िस में इसे ट्रेडमार्क करा लिया गया.
विश्व युद्ध से बाइक का कनेक्शन

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शेड में कंपनी बनने और खड़े होने के 10 साल के भीतर इस कंपनी ने साल 1912 में पहली बार जापान को अपनी मोटरसाइकिल निर्यात की. ये अमरीका से बाहर हार्ले-डेविडसन की पहली बिक्री थी.
जैसा कि जानकार बताते हैं कि हार्ले-डेविडसन विश्व युद्ध के दौरान बेहद ख़ास हो गई थी. इसका एक सबूत साल 1917 देता है जब इस साल बनी कंपनी की एक-तिहाई बाइक सेना को बेची गई.
1918 भी कुछ ऐसा ही था. पहले विश्व युद्ध के दौरान हार्ले-डेविडसन की क़रीब आधी मोटरसाइकिल सेना को दी गई थी. सेना ने कुल 20 हज़ार बाइक इस्तेमाल की जिनमें ज़्यादातर हार्ले थीं.
साल 1920 में हार्ले-डेविडसन दुनिया की सबसे बड़ी मोटरसाइकिल बनाने वाली कंपनी बन गई. ये वो दौर था जब 67 मुल्कों में दो हज़ार से ज़्यादा डीलर हार्ले-डेविडसन बेच रहे थे.
जंग से इस कंपनी को बार-बार फ़ायदा हुआ.
आज भी कायम है जलवा
1941 में अमरीका दूसरे विश्व युद्ध में दाख़िल हुआ. असैन्य मोटर साइकिल का उत्पादन रोक दिया गया क्योंकि इस दौरान सेना के लिए बाइक बनाई जा रही थी.

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1945 में जब युद्ध का अंत हुआ तो बिना वक़्त गंवाए कंपनी ने आम लोगों के लिए मोटरसाइकिल बनानी शुरू कर दी.
1940 से लेकर 1980 के बीच हार्ले-डेविडसन की बाइक मोटर रेस में जीत हासिल करती रही और अलग-अलग पावरफ़ुल इंजन, नए मॉडल की मदद से वो बाज़ार की रेस में दूसरी सारी कंपनियों से आगे निकलती रही.
मोटरसाइकिल यूएसए के मुताबिक दूसरे विश्व युद्ध के बाद आई हार्ले-डेविडसन की बेहतरीन बाइक में 1957 की स्पोर्टस्टर ख़ास है, जो की मौजूदा लाइन-अप में सबसे पुराना मॉडल है.
1960 के दशक में कंपनी के शीर्ष स्तर पर बदलाव देखने को मिले. 1965 में वो शेयर बाज़ार पहुंची और 1969 में अमरीकन मशीन एंड फ़ाउंड्री (एएमएफ़) के साथ विलय हुआ.
लेकिन हालात बदलने लगे और 1980 के दशक की शुरुआत में एएमएफ़ ने मालिकाना हक़ मौजूदा लीडरशिप को लौटा दिया जिनमें संस्थापकों के पारिवारिक सदस्य भी शामिल थे.
1980 और 1990 के दशक में कंपनी ने वो मॉडल लॉन्च किए जो आज भी मार्केट में अपना कब्ज़ा जमाए हुए हैं. सदी बदली, लेकिन हार्ले का रुतबा नहीं बदला.
कई कंपनियां आईं और गईं, लेकिन हार्ले का जलवा कल भी था और आज भी है और शायद कल भी बरकरार रहे.
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