कश्मीर: शुजात बुखारी की अंतिम यात्रा में उमड़ी भीड़

Aamir Peerzada

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इमेज कैप्शन, शुजात बुखारी के जनाज़े में शामिल उनके गाँव के लोग

वरिष्ठ पत्रकार और राइज़िंग कश्मीर अख़बार के संपादक शुजात बुखारी को शुक्रवार सुबह सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया.

50 साल के शुजात बुखारी की गुरूवार देर शाम कुछ संदिग्ध हमलावरों ने गोली मार कर हत्या कर दी थी. इस हमले में शुजात बुखारी के साथ उनके दो सुरक्षाकर्मियों भी मारे गए.

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सुबह से हो रही हल्की-फुल्की बारिश के बीच उत्तरी कश्मीर के किरी गाँव में शुजात बुखारी को दफ़नाया गया.

बीबीसी संवाददाता आमिर पीरज़ादा ने बताया कि शुजात बुखारी की अंतिम क्रिया के दौरान जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और मौजूदा मंत्री नईम अख़्तर और तसद्दुक हुसैन मुफ़्ती भी मौजूद थे.

BBC
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इस मौक़े पर मौजूद राइज़िंग कश्मीर अख़बार में शुजात बुखारी के सहकर्मी शेख सलीम ने कहा कि सभी को बराबर सम्मान देने वाला एक महान पत्रकार अब हमारे बीच नहीं है.

शेख ने बताया कि न्यूज़ रूम में शुजात तक पहुंचना, उनसे अपनी कहानी पर चर्चा करना और उनकी राय लेना किसी के लिए भी मुश्किल नहीं था. वो सभी के लिए हमेशा उपलब्ध होते थे.

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इमेज कैप्शन, राइज़िंग कश्मीर अख़बार में शुजात बुखारी के सहकर्मी रहे शेख सलीम

शेख मानते हैं कि यही वजह रही कि कश्मीर के बहुत से नौजवान अपने मीडिया करियर के शुरूआती दिनों में राइज़िंग अख़बार में काम करने आए.

शुजात बुखारी की हत्या की अगली सुबह भी उनकी टीम ने उसी साहस से आठ पन्ने का अख़बार तैयार किया और उसे छापा.

शुजात बुखारी

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इमेज कैप्शन, राइज़िंग कश्मीर अख़बार की कॉपियाँ शुक्रवार को सोशल मीडिया पर सर्कुलेट की गईं

वहीं एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने भी शुजात बुखारी की मौत पर शोक व्यक्त किया है. साथ ही इस हमले की कड़ी निंदा की है.

'पत्रकारों की सिक्योरिटी'

एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने बयान जारी किया है, "कश्मीर से आने वाले शुजात बुखारी एक साहसी और बड़े दिल वाले संपादक थे. उन्होंने कश्मीर के युवा पत्रकारों के एक बड़े तबके को ट्रेनिंग दी थी. जम्मू-कश्मीर सरकार को इस पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए. साथ ही सूबे में पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए."

"शुजात बुखारी की हत्या के बाद कश्मीर में मीडिया के लोगों के लिए माहौल ख़राब हुआ होगा. ऐसे में केंद्र सरकार को चाहिए कि वो भी इस स्थिति पर ग़ौर करे ताकि मीडिया के लोग बिना डरे अपना काम कर सकें. जम्मू-कश्मीर सरकार को सभी पत्रकारों के लिए सिक्योरिटी बढ़ा देनी चाहिए."

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'सूचनाओं का भण्डार थे शुजात'

वरिष्ठ पत्रकार और द प्रिंट के संस्थापक शेखर गुप्ता ने लिखा है, "दिल दहला देने वाली ख़बर है. शुजात का चला जाना, भारत के लिए एक बड़े साहसी संपादक को खो देने जैसा है. गजब का बैलेंस था उनके काम में. दिल्ली से कश्मीर जा रहे किसी भी पत्रकार के लिए स्थानीय जानकारियों और सूचनाओं का भण्डार थे शुजात बुखारी. न जाने कितने कश्मीरी नौजवानों को जो मीडिया में दिलचस्पी रखते हैं, उन्हें शुजात ने ट्रेनिंग थी और उनके काम को धार दी. साहसी पत्रकारिता करते हुए वो शहीद हुए."

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वरिष्ठ पत्रकार सीमा चिश्ती ने काफ़ी वक़्त तक शुजात बुखारी के साथ काम किया है. उन्होंने ट्विटर पर लिखा है कि शुजात उस ज़माने के पत्रकार थे जब मोबाइल फ़ोन और इंटरनेट कुछ नहीं था. उस वक़्त सूचनाओं और आंकड़ों (डेटा) को नोट करने और उसे संभालकर रखने का चलन था. शुजात इसमें माहिर थे. वो घटनाओं को दर्ज करते थे. और बड़ी कठिन परिस्थितियों में उन्हें लोगों के सामने लेकर आते थे. इसीलिए वो एक अच्छे पत्रकार थे और एक ज़बरदस्त इंसान भी.

कश्मीर की अच्छी समझ

शुजात को लेकर इंडियन एक्सप्रेस में सीमा चिश्ती ने एक लेख लिखा है. इस लेख के अनुसार, शुजात को कश्मीर के अंदरूनी इलाक़ों की अच्छी समझ थी. उन्होंने कश्मीर में काफ़ी ट्रेवल किया था. इस वजह से स्थानीय मुद्दों पर उनकी समझ बढ़िया थी. वो ज़मीनी स्थिति को समझते थे. 'द हिंदू' अख़बार के लिए काम करते हुए उनका प्रदर्शन बहुत बढ़िया था.

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'द हिंदू' अख़बार में शुजात बुखारी के साथ एक अंतराल तक काम कर चुके सिद्धार्थ वरदराजन ने भी शुजात को श्रद्धांजलि दी है. उन्होंने अपनी न्यूज़ वेबसाइट 'द वायर' पर शुजात बुखारी के पुराने लेख प्रकाशित किये हैं.

ट्विटर पर उन्होंने एक लेख शेयर किया है और लिखा है कि शुजात को समझने के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच सीज़-फ़ायर पर उनके लेख पढ़िए. इससे अंदाज़ा मिलता है कि शांति बहाली की प्रक्रिया को लेकर शुजात की राय कितनी स्पष्ट थी.

'असाधारण साहस याद रहेगा'

फ़्रंटलाइन मैग्ज़ीन के संपादक आर. विजयाशंकर ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि शुजात बुखारी असाधारण साहस और लोगों को बेहिसाब प्यार करने के लिए याद किये जायेंगे.

शुजात बुखारी की इस कार पर हमला हुआ था.

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इमेज कैप्शन, शुजात बुखारी की इस कार पर हमला हुआ था.

विजयाशंकर ने कहा, "वो एक दोस्त की तरह थे. उनकी लेखनी एकदम निडर थी. कश्मीर जैसे तनाव भरे इलाक़े में एक राजनीतिक समाचार पत्र निकालना, बड़ी हिम्मत का काम है. फिर केंद्र सरकार से नज़र मिलाकर ये कहना कि उन्होंने ही कश्मीर की स्थिति को और ज़्यादा ख़राब किया है, ये बताता है कि वो साफ़गोई में विश्वास करते थे. वो अपनी इस राय पर कायम रहे. साल 2000 में भी उनपर हमला हुआ था, लेकिन उनकी बेबाकी पर उसका असर नहीं हुआ."

विजयाशंकर कहते हैं कि पत्रकार होने के अलावा उन्होंने कश्मीर में शांति बहाली के लिए भी काफ़ी काम किया.

बीते तीन सालों में विजयाशंकर और शुजात की तीन बार चेन्नई में मुलाक़ात हुई. फ़्रंटलाइन मैग्ज़ीन में भी शुजात बुखारी के लेख छपा करते थे.

उन्हें याद करते हुए विजयाशंकर ने कहा, "अपने काम को लेकर जुनून और सभी पक्षों को सुनने की इच्छाशक्ति, शुजात बुखारी की सबसे बड़ी खूबी थी."

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