आरएसएस और प्रणब मुखर्जी: किससे किसको फायदा

प्रणब मुखर्जी, मोहन भागवत

इमेज स्रोत, Reuters

    • Author, अपर्णा द्विवेदी
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जब से आरएसएस के न्यौते पर हां की थी तब से उनके नजदीकी और उनके धुर विरोधी- सभी के दिलों में धुक धुकी थी.

वैसे ये धुक धुकी तो बीजेपी और आरएसएस में भी थी और ये डर वाजिब भी था. प्रणब मुखर्जी कांग्रेस के वरिष्ठतम नेताओं में से एक हैं. भले ही वो पूर्व राष्ट्रपति होने के बाद अपने आप को सामान्य नागरिक माने लेकिन उनकी पहचान कांग्रेस नेता के रूप में ही होती है. ऐसे में संघ मुख्यालय जाना, ये कांग्रेस के लिए डरने वाली बात थी. क्योंकि ये बात तो सब जानते हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी संघ के कटु आलोचक हैं.

और शायद आरएसएस भी कहीं ना कहीं यहीं करना चाहती थी. वो कांग्रेस को डराना चाहती थी और साथ ही कांग्रेस के वरिठष्तम नेता और पूर्व राष्ट्रपति को अपने कार्यक्रम में बुला कर ये भी साबित करना चाहती थी कि संघ का विरोध सिर्फ गांधी परिवार करता है. पूरी कांग्रेस पार्टी नहीं.

पर भाषण शुरू होने तक कांग्रेस में सबको एक ही डर सता रहा था कि क्या बोलेंगे प्रणब दा. और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जब आरएसएस प्रचारकों के दीक्षांत समारोह में राष्ट्रवाद पर संबोधन किया, तो सब लोगों ने राहत की सांस ली. प्रणब दा ने राष्ट्र और राष्ट्रवाद पर कहा कि संविधान के प्रति देशभक्ति ही असली राष्ट्रवाद है. उन्होंने कहा कि सिर्फ़ एक धर्म, एक भाषा भारत की पहचान नहीं है, संविधान से राष्ट्रवाद की भावना बहती है.

आरएसएस ने बुलाया क्योंकि...

प्रणब मुखर्जी, आरआरएस, नागपुर

इमेज स्रोत, Reuters

मुखर्जी ने आगे कहा कि आज लोगों में गुस्सा बढ़ रहा है, हर रोज़ हिंसा की ख़बर सामने आती रहती हैं, हिंसा और ग़ुस्सा को छोड़कर हमें शांति के रास्ते पर चलना चाहिए. सबसे मज़े की बात थी कि उन्होंने संक्षिप्त में भारत का इतिहास भी पढ़ाया और संघ मुख्यालय के मंच से सरसंघचालक की उपस्थिति में नेहरू और गांधी के दर्शन का पाठ पढ़ाया.

उन्होंने विविधता में एकता की बात भी कहीं और खुशहाली सूचकांक के बहाने सरकार को भी खुशहाल लोगों की ज़रूरत की बात समझाई. अपने भाषण से उन्होंने सबको ख़ुश कर दिया. कांग्रेस इस बात पर ख़ुश हो गई कि उन्होंने संघ के मुख्यालय पर जाकर उन्हें नेहरू गांधी का पाठ पढ़ाया. संघ इसलिए ख़ुश हो गया कि पूर्व राष्ट्रपति के भाषण से ठीक पहले संघसरचालक मोहन भागवत ने भी विविधता में एकता की बात कही थी और प्रणब मुखर्जी के भाषण ने उस पर प्रासंगिकता की मोहर लगा दी.

प्रणब मुखर्जी के राजनैतिक इतिहास को जानने वाले लोगों का मानना है कि उनके राजनैतिक अनुभव को नजरअंदाज़ नहीं करना चाहिए. आरएसएस ने जब अपने कार्यक्रम में कांग्रेसी बैकग्राउंड वाले पूर्व राष्ट्रपति को बुलाया तो वो ये साबित करना चाहते थे कि संघ अपना आधार प्रतिष्ठित और अनुभवी शख्सियतों के माध्यम से मज़बूत करना चाहता है.

मोदी भी करते हैं तारीफ़

प्रणब मुखर्जी, नरेंद्र मोदी

इमेज स्रोत, Getty Images

जाहिर है प्रणब दा ने सोच समझ कर ही ये कदम उठाया है. इतना तो सब मानते हैं कि प्रणब इतने मंझे हुए नेता तो हैं ही कि वो संघ को अपना इस्तेमाल नहीं करने देंगे. संघ का न्योता स्वीकार करने से कांग्रेस के कुछ नेताओं के माथे पर बल पड़ना तय था ख़ासतौर से तब जब सब जानते हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी संघ को सख़्त नापंसद करते हैं.

उनकी अपनी बेटी ने उनके संघ मुख्यालय में जाने का विरोध किया लेकिन बावजूद इसके प्रणब मुखर्जी ना सिर्फ़ मुख्यालय के कार्यक्रम में शिरकत की और तो और उन्होंने ऐसा भाषण दिया कि कांग्रेस ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेस कर के उनके भाषण का समर्थन किया.

कांग्रेस का डर का एक कारण ये भी था कि उन्हें प्रणब दा की नाराजगी मालूम है. इतिहास में ऐसे दो मौके आए जब प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला लेकिन पार्टी ने दोनो बार उन्हें मौका ना देकर उनके जूनियर नेताओं को मौका दिया.

सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह

इमेज स्रोत, Raveendran

पहली बार जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी तब वरिष्ठतम नेता होने के नाते उन्हें उम्मीद थी कि उन्हें मौका दिया जाएगा लेकिन तब राजीव गांधी को मौका मिला और दूसरी बार 2004 में जब कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनी तो सोनिया गांधी ने उनके बजाय मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया.

प्रणब मुखर्जी ने इसका जिक्र बाकायदा अपनी किताब में किया और सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की उपस्थिति में मंच पर इस बात को बोला.

कांग्रेस को डर था कि प्रोग्राम में उनका भाषण कहीं पार्टी की किरकिरी न कर दे. वैसे भी प्रणब दा काफी प्रोफेशनल हैं, जिस पार्टी में भी रहे, उसके लिए कभी असहज जैसी स्थिति पैदा नहीं की. यहां तक कि विरोधी भी उनका सम्मान करते हैं. खुद शिवसेना ने राष्ट्रपति पद पर उनकी उम्मीदवारी को समर्थन किया था. जबकि मोदी तो कई बार उनकी तारीफ़ कर चुके हैं.

अब सवाल ये उठता है कि प्रणब मुखर्जी की सक्रियता के मायने क्या हैं?

प्रणब मुखर्जी ने कबीर की तरह दोनों को राह दिखाई है. संघ से कांग्रेस घृणा करती है और संघ नेहरू परिवार को टारगेट करता है. प्रणब दा ने दो धुर विरोधी ताकतों में संवाद की स्थिति की तैयारी तो कर दी है. इसके अलावा ये भी कहा जा रहा है कि प्रणब मुखर्जी राजनीति में अपनी प्रासंगिकता को ख़त्म नहीं करना चाहते थे.

बेटे के लिए रास्ते खुलेंगे

प्रणब मुखर्जी और शर्मिष्ठा मुखर्जी

इमेज स्रोत, TWITTER@SHARMISTHA_GK

हाल फिलहाल के राजनैतिक परिदृश्य को देखें तो कुछ समय पहले हुए उपचुनावों में विपक्षी एकता ने बीजेपी को पटखनी दी है. और अगर ममता बनर्जी का फार्मूला माने तो 'एक सीट, एक विपक्षी उम्मीदवार' के फॉर्मूले को लागू कर 2019 में बीजेपी को दोबारा सत्ता में आने से रोका जा सकता है.

ममता के इस फार्मूले का एक बेस है- बीजेपी बनाम सब. और इसका नेतृत्व राज्य के हिसाब से होगा. यानी जिस राज्य में बीजेपी के खिलाफ जो पार्टी मज़बूत हो, बाकी सभी पार्टी उसका सहयोग करेगी. या फिर कांग्रेस और बीजेपी के हट कर एक थर्ड फ्रंट तैयार किया जाए जो लोकसभा चुनाव में बड़ी भूमिका निभा सकता है.

इन दलों का ये भी मानना है कि अगर अगली लोकसभा त्रिशंकु आती है तो कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को उन्हें समर्थन देने के अलावा कोई और विकल्प नहीं होगा.

पर बीजेपी बार बार ये सवाल उठाती है कि अगला प्रधानमंत्री कौन! और यहां पर प्रणब मुखर्जी का नाम उभर कर आ सकता है. सवैधानिक और कानूनी दृष्टि से देखा जाए तो पूर्व राष्ट्रपति पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं है कि वो राजनाति में हिस्सा नहीं ले सकते. ये बात ज़रूर है कि पारंपरिक रूप से देश में कभी किसी पूर्व राष्ट्रपति ने ऐसा कदम नहीं उठाया.

प्रणब मुखर्जी, मोहन भागवत

इमेज स्रोत, Getty Images

लेकिन इसमें में कोई दो राय नहीं है कि प्रणब मुखर्जी का राजनैतिक और प्रशासकीय अनुभव काफी शानदार रहा है. उन्हें संसदीय प्रक्रिया की अच्छी जानकारी है और यूपीए के दस साल के समय में उन्हें क्राइसिस मैनेजर के रूप में जाना जाता था.

अन्य राजनैतिक पार्टी उन्हें राहुल गांधी की तुलना में आसानी से स्वीकार भी लेंगी. वैसे भी राजनीति में उनके धुर विरोधी रही ममता बनर्जी और शिवसेना ने 2012 में जब राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी के नाम का समर्थन किया था. ये भी बताया जा रहा है कि ममता बनर्जी और टीआरएस प्रमुख के चंद्रशेखर राव की बैठक को प्रणब मुखर्जी का भी समर्थन था.

दूसरी तरफ़ उनके अपने राज्य पश्चिम बंगाल में उनके बेटे सक्रिय राजनीति में हैं. एक चर्चा ये भी है कि प्रणब दा भले ही खुद राजनीति में ना कूदे लेकिन अपने बेटे की राजनैतिक भविष्य के लिए दोनों ही दलों का इस्तेमाल कर सकते हैं.

इतना तो तय है कि संघ के मुख्यालय जा कर प्रणब मुखर्जी ने जहां एक तरफ़ संघ और बीजेपी से संवाद कायम किया वहीं कांग्रेस को अपनी अनुभव और प्रासंगिकता का अहसास दिला दिया. इसका लाभ उन्हें आगामी लोकसभा चुनाव में मिल सकता है, जहां पर वो चुनाव परिणाम के बाद खींचतान की राजनीति में अहम रोल निभा सकते हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)