नज़रिया: गांधी हिंदुत्व और आरएसएस से पूरी तरह असहमत थे

गांधी, गुरुजी

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    • Author, कुमार प्रशांत
    • पदनाम, गांधी दर्शन के अध्येता, बीबीसी हिंदी के लिए

गांधी के साथ ऐसा खेल इतिहास पहली बार नहीं खेल रहा है.

साल 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद से 30 जनवरी 1948 को गोली खाकर गिरने तक वे सारे लोग, जो गांधी से असहमत रहे, उनके विरोधी रहे, उनके दुश्मन रहे, वो सब भी कोशिश यही करते रहे, यही चाहते रहे कि गांधी को ख़ारिज करने की स्वीकृति भी उन्हें गांधी से ही मिले.

उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने भी ऐसा ही किया. नानाजी देशमुख स्मृति व्याख्यानमाला में उन्होंने राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का बचाव किया और कहा कि संघ के मूल्यों, आदर्शों, इसकी कार्यप्रणाली को तो महात्मा गांधी की स्वीकृति प्राप्त है.

उप-राष्ट्रपति ने जो कहा वह कोई भोली टिप्पणी नहीं है, संघ-परिवार की सोची-समझी, लंबे समय से चलाई जा रही रणनीति है.

अगर संघ-परिवार ईमानदार होता, आत्मविश्वास से भरा होता तो उसे कहना तो यही चाहिए था कि गांधी गलत थे, देश-समाज के लिए अभिशाप थे, ऐसा कहकर उन्हें खारिज कर देता और अपनी सही, सर्वमंगलकारी विचारधारा तथा कार्यधारा ले कर आगे चल पड़ता.

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अगर संघ ईमानदार होता...

लेकिन सारी परेशानी यही है कि वह जानता है कि वह जो कहता है और करता है वह सही और सर्वमंगलकारी नहीं है. इस अमंगलकारी चेहरे पर गांधी का पर्दा उसे चाहिए क्योंकि भारतीय समाज आज भी महात्मा गांधी को ही आदर्श और मानक मानता है, किसी सावरकर या फिर गोलवलकर को नहीं.

विवाद फिर से उठा है क्योंकि पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 7 जून 2018 के अपने विशेष कार्यक्रम में, अपने स्वंयसेवकों को संबोधित करने के लिए नागपुर बुलाया है. प्रणव मुखर्जी ने यह आमंत्रण स्वीकार भी कर लिया है.

कांग्रेस की पेशानी पर बल पड़े हैं तो विपक्ष को यह समझ में नहीं आ रहा है कि वह इस मामले में कहां, किसके साथ खड़ा हो.

जब सारे देश में कांग्रेस ने संघ परिवार के ख़िलाफ़ अपना सीधा मोर्चा खोल रखा है, पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी सांप्रदायिकता को जड़ से उखाड़ फेंकने का आह्वान करते सारे देश में घूम रहे हैं, ऐसे में प्रणब मुखर्जी का संघ-परिवार के मुख्यालय में मेहमान बनकर जाना कांग्रेस के लिए और सारे विपक्ष के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है.

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चिंता में क्यों है संघ

सवाल प्रणब मुखर्जी नाम के एक व्यक्ति का नहीं है बल्कि सांप्रदायिकता के दर्शन से संघर्ष के उस पूरे इतिहास का है, जिसके प्रणब मुखर्जी भी किसी हद तक प्रतीक हैं.

असत्य को सत्य का जामा पहनाने में सिद्धहस्त संघ-परिवार के हाथ में एक नया हथियार न आ जाए, इसकी आशंका है.

आखिरकार कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने कह ही दिया कि आजीवन कांग्रेसी रहे तथा हमेशा संघ-परिवार की आलोचना करने वाले प्रणब दा को नागपुर नहीं जाना चाहिए.

अब संघ-परिवार को डर यह सता रहा है कि ऐसे दवाब में आकर कहीं वे अपना कार्यक्रम रद्द न कर दें इसलिए महात्मा गांधी को पूर्व राष्ट्रपति की नागपुर यात्रा के समर्थन में ला खड़ा किया गया है.

इस मामले में इतिहास कहाँ खड़ा है, यह भी हम देखेंगे या नहीं?

महात्मा गांधी किसी भी प्रकार की संकीर्णता के खिलाफ लड़ने वाले सदी के सबसे बड़े योद्धा थे, और आज भी सारी दुनिया में फैले अमनपसंद, उदार मानस के लोग उनसे प्रेरणा पाते हैं.

महात्मा गांधी

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भ्रम या अस्पष्टता की गुंजाइश

यह सोचना-समझना असंभव है कि दुनिया जिसे पिछली शताब्दी में पैदा हुआ सबसे बड़ा इंसान मानती है वह सबसे कमजोर, दलित, अल्पसंख्यक, उपेक्षित, और अपमानित जमातों के खिलाफ किसी भी स्थिति में, किसी के साथ खड़ा होगा.

महात्मा गांधी इतिहास के उन थोड़े से लोगों में एक हैं जिन्होंने अपने मन, वचन और कर्म में ऐसी एकरूपता साध रखी थी कि किसी भ्रम या अस्पष्टता की गुंजाइश बची नहीं रहती बशर्ते कि आप ही कुछ मलिन मन से इतिहास के पन्ने न पलट रहे हों.

सांप्रदायिक हिंसावादियों और हिंसक क्रांतिकारियों से उनका सामना लगातार होता रहा और उन व्यक्तियों का पूरा मान रखते हुए भी उन्होंने उनकी विचारधारा को बड़ी कड़ाई और सफाई से खंडित किया.

आरएसएस का सीधा संदर्भ लेते हुए गांधी के कुछ कहने का पहला ज़िक्र 9 अगस्त 1942 का है, जब दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमिटी के तब के अध्यक्ष आसफ़ अली ने गांधी को संघ की शिकायत करते हुए एक पत्र लिखा था.

महात्मा गांधी

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आरएसएस पर गांधी ने क्या कहा

'हरिजन' में आसफ़ अली के पत्र का जवाब देते हुए (पृष्ठ 261) गांधीजी लिखते हैं, "शिकायती पत्र उर्दू में है. उसका सार यह है कि आसफ अली साहब ने अपने पत्र में जिस संस्था का जिक्र किया है (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) उसके 3,000 सदस्य रोज़ाना लाठी के साथ कवायद करते हैं, कवायद के बाद नारा लगाते हैं कि हिंदुस्तान हिंदुओं का है और किसी का नहीं, इसके बाद संक्षिप्त भाषण होते हैं, जिनमें वक्ता कहते हैं, 'पहले अंग्रेजों को निकाल बाहर करो, उसके बाद हम मुसलमानों को अपने अधीन कर लेंगे. अगर वे हमारी नहीं सुनेंगे तो हम उन्हें मार डालेंगे."

आसफ़ अली की शिकायत पर प्रतिक्रिया के रूप में गांधी लिखते हैं, "बात जिस ढंग से कही गई है, उसे वैसी ही समझकर यह कहा जा सकता है कि यह नारा गलत है और भाषण की मुख्य विषय-वस्तु तो और भी बुरी है. नारा गलत और बेमानी है, क्योंकि हिंदुस्तान उन सब लोगों का है जो यहां पैदा हुए और पले हैं और जो दूसरे मुल्क का आसरा नहीं ताक सकते."

"इसलिए वह जितना हिंदुओं का है उतना ही पारसियों, यहूदियों, हिंदुस्तानी ईसाइयों, मुसलमानों और दूसरे गैर-हिंदुओं का भी है. आज़ाद हिंदुस्तान में राज हिंदुओं का नहीं, बल्कि हिंदुस्तानियों का होगा, और वह किसी धार्मिक पंथ या संप्रदाय के बहुमत पर नहीं, बिना किसी धार्मिक भेदभाव के निर्वाचित समूची जनता के प्रतिनिधियों पर आधारित होगा."

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हिंदुत्व के दर्शन को ख़ारिज करते हैं गांधी

गांधी जो धर्मपरायण हिंदू थे उन्होंने बिल्कुल स्पष्टता के साथ लिखा कि "धर्म एक निजी विषय है, जिसका राजनीति में कोई स्थान नहीं होना चाहिए. विदेशी हुकूमत की वजह से देश में जो अस्वाभाविक परिस्थिति पैदा हो गई है, उसी की बदौलत हमारे यहां धर्म के अनुसार इतने अस्वाभाविक विभाग (विभाजन) हो गए हैं."

"जब देश से विदेशी हुकूमत उठ जाएगी तो हम इन झूठे नारों और आदर्शों से चिपके रहने की अपनी इस बेवकूफी पर खुद हँसेंगे. अगर अंग्रेजों की जगह देश में हिंदुओं की या दूसरे किसी संप्रदाय की हुकूमत ही कायम होने वाली हो तो अंग्रेजों को निकाल बाहर करने की पुकार में कोई बल नहीं रह जाता. वह स्वराज्य नहीं होगा."

गौर करें कि गांधीजी हिंदुत्व के पूरे दर्शन को सिरे से खारिज करते हैं, और यह भी बता देते हैं कि हर संगठित धर्म के बारे में उनकी राय ऐसी ही है.

संख्या या संगठन बल के आधार पर कोई भी धर्म आज़ाद हिंदुस्तान का भाग्यविधाता नहीं होगा बल्कि जनता के चुने प्रतिनिधि ही भारत का विधान बनाएंगे और चलाएँगे, यह अवधारणा भारत के आज़ाद होने, संविधान सभा बनने और संविधान बनाने से काफी पहले ही उन्होंने कलमबंद कर दी थी.

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सांप्रदायिकता से असहमत रहे गांधी

लेकिन सांप्रदायिकता का उन्माद जगाकर सत्ता की राजनीति का खेल तब शुरू हुआ जब दो राष्ट्रों का सिद्धांत सामने रखा गया और उसे बड़े शातिर तरीक़े से सारे देश में फैलाया जाने लगा.

इसके बाद से मारे जाने तक गांधी सांप्रदायिक और राजनीतिक हिंसा के कुचक्र के बीच से आज़ादी की लड़ाई को निकाल ले जाने के लिए संघर्ष करते रहे.

सबसे पहले यह जहर सावरकर ने बोया और फिर मुस्लिम लीग के सभी बड़े-छोटे नेता, शायर इक़बाल ने उसमें खाद-पानी पटाया और जिन्ना ने उसकी फसल काटी. कांग्रेस के कई नेताओं ने भी इस आग में घी डालने की कायर कोशिश की लेकिन सभी यह जानते हैं कि महात्मा गांधी अपनी अंतिम सांस तक इससे असहमत रहे.

यही वजह है इस पूरे दौर में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से गांधी इन सबके निशाने पर रहे हैं, और गांधी की वैचारिक शक्ति इनसे पुरज़ोर तरीक़े से लगातार टकराती रही है और सांप्रदायिकता-संकीर्णता के ज़हर की काट करती रही है.

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जब संघ की शाखा में गए गांधी

इतिहास में 16 सितंबर 1947 का प्रसंग भी मिलता है जब आरएसएस के दिल्ली प्रांत प्रचारक वसंतराव ओक महात्मा गांधी को भंगी बस्ती की अपनी शाखा में बुला ले गए थे.

यह पहला और अंतिम अवसर है कि गांधी संघ की किसी शाखा में जाते हैं. विरोधी हो या विपक्षी, गांधी किसी से भी संवाद बनाने का कोई मौका कभी छोड़ते नहीं थे. वसंतराव ओक का आमंत्रण भी वे इसी भाव से स्वीकारते हैं.

अपने स्वंयसेवकों से परिचय कराते हुए ओक गांधी को 'हिंदू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष' बताते हैं. गांधीजी को तब ऐसे किसी परिचय की जरूरत ही नहीं थी लेकिन ऐसा परिचय देकर संघ उन्हें अपनी सुविधा और रणनीति के एक तय खांचे में डाल देना चाहता था.

गांधी जी ऐसे खेलों को पहचानते भी हैं और उनका जवाब देने से कभी चूकते नहीं हैं.

महात्मा गांधी के अंतिम दिनों का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज लिखा है उनके अंतिम निजी सचिव प्यारेलाल ने.

महात्मा गांधी

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संघ का हिंदुत्व मानने को तैयार नहीं थे गांधी

अपनी इस अप्रतिम पुस्तक 'पूर्णाहुति' जो मूल अंग्रेजी किताब 'लास्ट फेज'का अनुवाद है, इस किताब में इस प्रसंग को दर्ज करते हुए प्यारेलाल लिखते हैं कि गांधीजी ने अपने जवाबी संबोधन में कहा, "मुझे हिंदू होने का गर्व अवश्य है लेकिन मेरा हिंदू धर्म न तो असहिष्णु है और न बहिष्कारवादी. हिंदू धर्म की विशिष्टता, जैसा मैंने उसे समझा है, यह है कि उसने सब धर्मों की उत्तम बातों को आत्मसात कर लिया है."

"अगर हिंदू यह मानते हों कि भारत में अ-हिंदुओं के लिए समान और सम्मानपूर्ण स्थान नहीं है और मुसलमान भारत में रहना चाहें तो उन्हें घटिया दर्जे से संतोष करना होगा तो इसका परिणाम यह होगा कि हिंदू धर्म श्रीहीन हो जाएगा. मैं आपको चेतावनी देता हूँ कि अगर आपके खिलाफ लगाया जाने वाला यह आरोप सही है कि मुसलमानों को मारने में आपके संगठन का हाथ है, तो उसका परिणाम बुरा होगा."

यहाँ गांधी दो बातें साफ करते हैं, वे संघ मार्का हिंदुत्व को हिंदू धर्म मानने को तैयार नहीं हैं, वे उससे खुद को जोड़े जाने से सर्वथा इनकार करते हैं और यह चेतावनी भी देते हैं कि संघ जिस दिशा में जा रहा है वह हिंदू धर्म के विरोध की दिशा है और इस कोशिश का परिणाम बुरा होगा.

आगे वे कहते हैं, "कुछ दिन पहले ही आपके गुरुजी से मेरी मुलाकात हुई थी. मैंने उन्हें बताया था कि कलकत्ता और दिल्ली से संघ के बारे में क्या-क्या शिकायतें मेरे पास आई हैं. गुरुजी ने मुझे बताया कि वे संघ के प्रत्येक सदस्य के उचित आचरण की जिम्मेदारी नहीं ले सकते लेकिन संघ की नीति हिंदुओं और हिंदू धर्म की सेवा करना मात्र है, किसी दूसरे को नुकसान पहुंचाना नहीं. उन्होंने मुझे बताया कि संघ आक्रमण में विश्वास नहीं रखता है लेकिन अहिंसा में भी उसका विश्वास नहीं है."

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हिटलर के नाज़ियों में अनुशासन नहीं क्या?

यहाँ गांधीजी गुरू जी कहे जाने वाले गोलवलकर से हुई अपनी बातचीत का सार भी सावधानीपूर्वक सार्वजनिक कर देते हैं, वे संघ के उस वैचारिक क्षद्म को भी उजागर कर देते हैं जिसमें बात तो गहरे अनुशासन की जाती है लेकिन अपने सदस्यों के आचरण की ज़िम्मेदारी नहीं ली जाती.

वे तभी-के-तभी यह भी जता देने से पीछे नहीं हटते हैं कि अगर आप अहिंसा में विश्वास नहीं रखते हैं तो लड़ाई में हिंसा और आक्रमण के अलावा और क्या करेंगे?

उस दिन गांधीजी से कुछ ऐसे सवाल पूछे गए जो संघ की वैचारिक बुनियाद से जुड़े हैं. इनसे संघ की दुविधा खुलकर सामने आ गई और गांधीजी को अपनी भूमिका स्पष्ट करने का अनायास ही मौका मिल गया.

उनसे पूछा गया कि 'गीता' के दूसरे अध्याय में भगवान कृष्ण कौरवों का नाश करने का जो उपदेश देते हैं, उसकी व्याख्या आप कैसे करेंगे?

जवाब में गांधीजी ने कहा, "हम इस बात का अचूक निर्णय करने की शक्ति अपने में पैदा करें कि आततायी कौन है? दूसरे शब्दों में कहूँ तो हमें दोषी को सजा देने का अधिकार तभी मिल सकता है जब हम पूरी तरह निर्दोष बन जाएँ. एक पापी दूसरे पापी का न्याय करे या उसे फांसी पर लटकाने का अधिकारी हो जाए, यह कैसे माना जा सकता है!"

"अगर यह मान भी लिया जाए कि पापी को दंड देने का अधिकार 'गीता' ने स्वीकार किया है, तो उस अधिकार का इस्तेमाल कानून से स्थापित सरकार ही कर सकती है न! आप ही न्यायाधीश और आप ही जल्लाद, ऐसा होगा तो सरदार और पंडित नेहरू दोनों लाचार हो जाएंगे. आप उन्हें अपनी सेवा करने का अवसर दीजिए. कानून को अपने हाथ में लेकर उनके प्रयत्नों को विफल मत कीजिए."(संपूर्ण गांधी वांड्ंमय, खंड: 89)

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संघ की बुनियादी अवधारणा

यहां गांधी ईसा की उस अपूर्व उक्ति पर अपनी मुहर लगाते हैं कि पहला पत्थर वह मारे जिसने कोई पाप न किया हो. फिर वे यह भी रेखांकित करते हैं कि लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार को पूरा मौका देना चाहिए कि वह सार्वजनिक विवादों का रास्ता खोजे.

साफ मन से कोई भी खोजेगा तो उसे इन सारे कथनों में संघ की बुनियादी अवधारणाओं की काट मिलेगी. इसमें संघ को बदनाम करने या उसे कठघरे में खड़ा करने की बात नहीं है बल्कि गलतियों को सुधारने की बात है.

गांधीजी की बातों में आलोचना का दंश नहीं, रचनात्मक सहायता का भाव ही भरा होता था. प्यारेलालजी लिखते हैं कि भंगी बस्ती की शाखा से लौटने के बाद गांधीजी के एक साथी ने कहा कि 'संघ में गजब का अनुशासन है.'

इस पर गांधी ने छूटते ही थोड़ी कड़ी आवाज़ में कहा, "लेकिन हिटलर के नाजियों में और मुसोलिनी के फासिस्टों में भी ऐसा ही अनुशासन नहीं है क्या?" गांधी साफ कर देना चाहते हैं कि अनुशासन अपने-आप में कोई आदर्श या मूल्य नहीं है, असली बात ये है कि अनुशासन क्यों और कैसे स्थापित किया जा रहा है, इसकी विवेकसम्मत विवेचना की जाए."

हम न भूलें कि इसी हिंदुस्तान ने 1975-77 में आपातकाल भुगता था, जिसका नारा कड़े अनुशासन की ही तो बात करता था.

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अनुशासन का गुणगान

जनता का विवेक और उसकी स्वतंत्रता का हनन करने वाले सबसे पहले अनुशासन का गुणगान करते हैं.

प्यारेलालजी उस दिन गांधीजी की बातों का भाव शब्दबद्ध करते हुए लिखते हैं कि 'उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को 'तानाशाही दृष्टिकोण रखने वाली सांप्रदायिक संस्था'बताया था.

आरएसएस का दूसरा सीधा प्रसंग हमें 21 सितंबर, 1947 को उनके प्रार्थना-प्रवचन में मिलता है जहां गांधीजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गुरु गोलवलकर से अपनी और डॉक्टर दिनशा मेहता की बातचीत का जिक्र करते हुए कहते हैं कि "मैंने गुरुजी से कहा कि मैंने सुना है कि इस संस्था के हाथ भी खून से सने हुए हैं. गुरुजी ने मुझे विश्वास दिलाया कि यह बात झूठ है."

"उन्होंने कहा कि उनकी संस्था किसी की दुश्मन नहीं है. उसका उद्देश्य मुसलमानों की हत्या करना नहीं है. वह तो सिर्फ अपनी सामर्थ्य भर हिंदुस्तान की रक्षा करना चाहती है. उसका उद्देश्य शांति बनाए रखना है. गुरुजी ने मुझसे यह भी कहा कि मैं उनके विचारों को सार्वजनिक कर दूं."

गुरुजी की बातें सार्वजनिक करने से समाज को गुरुजी और आरएसएस को जांचने का ऐसा आधार मिल गया जो आज तक काम आता है.

गुरु गोलवलकर

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बड़ी नैतिक जिम्मेवारी

आगे गांधीजी एक दूसरा अहिंसक हथियार भी काम में लेते हैं.

वे यह कह कर संघ के कंधों पर एक बड़ी नैतिक जिम्मेवारी डाल देते हैं कि संघ के खिलाफ जो आरोप लगाए जाते हैं, उन्हें अपने आचरण और काम से गलत साबित करने की जिम्मेदारी संघ की है. मतलब यह कि वे उन आरोपों को खारिज नहीं करते हैं, संघ को उससे बरी नहीं करते हैं बल्कि संघ से ही कहते हैं कि वह अपने को निर्दोष साबित करे.

आरएसएस आज तक अपनी कथनी-करनी से अपने कंधों पर रखा वह नैतिक बोझ उतार नहीं पाया है.

गांधी किसी बेताल की तरह आरएसएस के कंधों पर सवार हैं और इसलिए वह लौट-लौट कर किसी चालबाज़ी से गांधी को अपने कंधों से झटकना चाहता है. लेकिन सत्य सिर्फ सत्य से ही काटा जा सकता है, चालाकी या दगाबाजी से नहीं, यह वेद-सत्य वह भूल जाता है. क्या पता, प्रणव मुखर्जी भी उसे यह फिर से याद दिला दें!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष हैं. ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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