कुमारस्वामी: बीजेपी से दुश्मनी से कांग्रेस की दोस्ती तक

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कर्नाटक के राज्यपाल वेजुभाई वाला ने जेडीएस नेता एच.डी. कुमारस्वामी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया है.
कर्नाटक चुनाव के नतीजे आने के बाद जितनी तेज़ी से बी.एस. येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, उतनी ही तेज़ी से उन्होंने इस्तीफ़ा भी दे दिया है और कर्नाटक में बीजेपी की सरकार गिर चुकी है.
कांग्रेस का दावा था कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद बी.एस. येदियुरप्पा एक दिन के मुख्यमंत्री बन कर रह जाएंगे और जेडीएस के साथ उनके गठबंधन की अगली सरकार बननी तय है. अब यह पक्का हो गया है कि कर्नाटक के अगले मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी होंगे.

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मुख्यमंत्री पद और कुमारस्वामी के बीच 'अगर-मगर' का फ़ासला था. येदियुरप्पा सरकार विश्वास मत पेश नहीं कर पाई. शनिवार का दिन कुमारस्वामी की किस्मत में मुख्यमंत्री बनने की नई आस लेकर आया है.
अब वह मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं तो इसमें कांग्रेस की भूमिका सबसे अहम है.
लेकिन उससे पहले ये समझना भी ज़रूरी है कि कैसे हुआ जेडीएस और कांग्रेस के गठबंधन का फ़ैसला?

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2018 में विधानसभा चुनाव परिणाम की घोषणा के बाद, कुमारस्वामी ने कहा, "साल 2006 में बीजेपी के साथ जाने के मेरे फ़ैसले के बाद में मेरे पिता के करियर में एक काला धब्बा लगा था. भगवान ने मुझे इस ग़लती को सुधारने का मौक़ा दिया है और मैं कांग्रेस के साथ रहूंगा."
लेकिन क्या कुमारस्वामी और कांग्रेस के रिश्ते हमेशा से इतने ही अच्छे रहे हैं और बीजेपी के साथ हमेशा से ख़राब?
इस सवाल के लिए इतिहास में झांकने की ज़रूरत पड़ेगी.

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बीजेपी से दोस्ती
2004 के विधानसभा चुनाव के बाद जेडीएस और कांग्रेस ने मिलकर कर्नाटक में सरकार बनाई. लेकिन 2006 आते-आते कुमारस्वामी ने खेल कर दिया.
साल 2006 में पिता एच.डी. देवेगौड़ा की बात न मानते हुए कुमारस्वामी ने पार्टी तोड़कर मुख्यमंत्री बनने के लिए बीजेपी का हाथ थाम लिया था.
बीजेपी और जेडीएस में डील हुई कि आधे कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री पद कुमारस्वामी के पास रहेगा और बाद में आधे कार्यकाल के लिए बीजेपी के पास. लेकिन 2007 के अक्टूबर में कुमारस्वामी अपने वादे से मुकर गए और बीजेपी का मुख्यमंत्री बनने नहीं दिया और सरकार से समर्थन वापस ले लिया.
इसके बाद के विधानसभा चुनाव में बीजेपी अपने दम पर सत्ता में आई और सरकार बनाई.

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कांग्रेस से बैर
लेकिन अगर पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा की बात करें तो 1999 में जनता पार्टी से अलग होकर ही जनता दल सेक्युलर की नींव रखी थी. 1977 में जनता पार्टी का गठन ही कांग्रेस के ख़िलाफ़ हुआ था. लेकिन बाद में दुश्मनी दोस्ती में बदल गई और 1996 में 10 महीने के लिए जब देवेगौड़ा भारत के प्रधानमंत्री बने तो उस सरकार को कांग्रेस का समर्थन भी प्राप्त था.
सिद्धारमैया का दर्द
दूसरी तरफ सिद्धारमैया का दर्द अलग है. उन्होंने कई सालों तक देवेगौड़ा के साथ निष्ठापूर्ण तरीके से काम किया लेकिन जब पार्टी की कमान सौंपने की बात आई तो देवेगौड़ा ने पार्टी के पुराने वफ़ादार सिद्धारमैया की जगह अपने बेटे कुमारस्वामी को चुना.
पार्टी के भीतर ख़ुद के अस्वीकृत होने के बाद सिद्धारमैया ने अहिंदा (अल्पसंख्यक, ओबीसी और दलित) बनाया और कांग्रेस की मदद से राज्य के मुख्यमंत्री भी बने.
लेकिन देवेगौड़ा के साथ उनकी दुश्मनी कुछ इसी तरह शुरू हुई थी. इस दुश्मनी की वजह से सिद्धारमैया ने वोक्कालिगा समुदाय से आने वाले अधिकारियों के साथ भी भेदभाव किया.
दरअसल, देवेगौड़ा वोक्कालिगा समुदाय से ही ताल्लुक रखते हैं और कर्नाटक की राजनीति में इस समुदाय के लोग काफ़ी अहमियत रखते हैं.
लेकिन कुमारस्वामी को राजनीति पिता से विरासत में मिली थी. उन्होंने भी चतुराई दिखाते हुए सिद्धारमैया द्वारा देवेगौड़ा पर किए जा रहे राजनीतिक हमले को पूरे वोक्कालिगा समुदाय पर हो रहे हमले के रूप में दिखाना शुरू कर दिया.

कुमारस्वामी का राजनीतिक सफ़र
कुमारस्वामी ने 1996 में राजनीति में क़दम रखा. वह सबसे पहली बार 11वीं लोकसभा में कनकपुरा से चुनकर लोकसभा में आए थे.
अब तक वो नौ बार चुनाव लड़ चुके हैं जिसमें से छह बार जीत हासिल की है. इस बार विधानसभा चुनाव में वो दो सीटों चन्नापट्टना और रामानगरम विधानसभा सीटों से मैदान में उतरे और दोनों ही सीटें उन्होंने जीत ली.
राजनीति में आने से पहले कुमारस्वामी फ़िल्म निर्माता और फ़िल्म वितरक थे.
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