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सरकारी बैंकों के कर्ज़ की लूट- क्या हक़ीक़त क्या फसाना?
- Author, दिनेश उप्रेती
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
साल 2018 की जनवरी-मार्च तिमाही में घाटा
- कैनरा बैंक - 4,860 करोड़ रुपये
- इलाहाबाद बैंक - 3510 करोड़ रुपये
- यूको बैंक - 2,134 करोड़ रुपये
- देना बैंक - 1,225 करोड़ रुपये
शुक्रवार को इन चार सरकारी बैंकों ने अपने जनवरी-मार्च तिमाही नतीजे घोषित किए और बताया कि कुल मिलाकर उन्हें 11,729 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है.
इससे पहले, हीरा व्यापारी नीरव मोदी पर आरोप लगा था कि उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक को 13,700 करोड़ की चपत लगा दी है और देश छोड़कर फरार हो गए हैं.
इससे पहले, विजय माल्या भी बैंकों का करीब 10 हज़ार करोड़ रुपये लेकर ब्रिटेन रफ़ूचक्कर हो गए थे.
सरकारी बैंकों के डूबते कर्ज़ यानी एनपीए की स्थिति कितनी ख़तरनाक है, इसकी स्थिति का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 2013 से साल 2017 तक इसमें 311 प्रतिशत से अधिक का उछाल आया और ये 1.55 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर साढ़े छह लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गए.
11 अगस्त 2017 को वित्त मंत्री अरुण जेटली ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि बैंकों की कुल संपत्ति में एनपीए का हिस्सा बढ़कर 12.47 प्रतिशत तक पहुँच गया है.
हालाँकि निजी बैंक भी इस होड़ में पीछे नहीं हैं और 2013 के 19,986 करोड़ रुपये के मुक़ाबले 2017 में उनके एनपीए 73,842 करोड़ रुपये तक पहुँच गए.
क्या होता है एनपीए?
एनपीए समझने से पहले ये जान लेना ज़रूरी है कि बैंक काम कैसे करते हैं. इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं. मसलन बैंक में अगर 100 रुपये जमा है तो उसमें से 4 रुपये (CRR) रिज़र्व बैंक के पास रखा जाता है, साढ़े 19 रुपये (अभी एसएलआर 19.5 प्रतिशत है) बॉन्ड्स या गोल्ड के रूप में रखना होता है.
बाकी बचे हुए साढ़े 76 रुपयों को बैंक कर्ज़ के रूप में दे सकता है. इनसे मिले ब्याज से वो अपने ग्राहकों को उनके जमा पर ब्याज का भुगतान करता है और बचा हुआ हिस्सा बैंक का मुनाफ़ा होता है.
रिज़र्व बैंक के अनुसार बैंकों को अगर किसी परिसंपत्ति (एसेट्स) यानी कर्ज़ से ब्याज आय मिलनी बंद हो जाती है तो उसे एनपीए माना जाता है.
बैंक ने जो धनराशि उधार दी है, उसके मूलधन या ब्याज की किश्त अगर 90 दिनों तक वापस नहीं मिलती तो बैंकों को उस लोन को एनपीए में डालना होगा.
रिज़र्व बैंक के नियम
कोई लोन खाता निकट भविष्य में एनपीए बन सकता है या नहीं, इसकी पहचान के लिए रिज़र्व बैंक ने नियम बनाए हैं. इसके तहत बैंकों को उनके लोन खातों को स्पेशल मेंशन अकाउंट (एसएमए) के तौर पर चिन्हित करना होता है.
अगर किसी लोन खाते में मूलधन या ब्याज की किश्त का भुगतान निर्धारित तिथि से 30 दिनों के भीतर नहीं होता है तो उसे एसएमए-0 कहा जाता है. अगर भुगतान 31 से 60 दिनों तक न हो तो इसे एसएमए-1 कहा जाता है. अगर मूलधन या ब्याज का भुगतान 61 से अधिक दिनों तक न हो तो उसे एसएमए-23 कहा जाता है.
किसी लोन खाते को एनपीए घोषित करने के बाद बैंक को उस एनपीए खाते का तीन श्रेणियों - 'सब स्टैंडर्ड एसेट्स', 'डाउटफुल एसेट्स' और 'लॉस एसेट्स' के रूप में बाँटना पड़ता है.
जब कोई लोन खाता एक साल या इससे कम अवधि तक एनपीए की श्रेणी में रहता है तो उसे 'सब स्टैंडर्ड असेट्स' कहा जाता है, एक साल तक 'सब स्टैंडर्ड असेट्स' की श्रेणी में रहता है तो उसे 'डाउटफुल असेट्स' कहा जाता है. जब बैंक यह मान लेता है कि कर्ज़ अब वसूल नहीं हो सकता तो उसे 'लॉस असेट्स' की श्रेणी में डाल दिया जाता है.
बढ़ते एनपीए को लेकर रिज़र्व बैंक भी चिंतित है और उसने इस बाबत कई कदम भी उठाए हैं.
बैंकिंग एक्सपर्ट काजल जैन कहती हैं, "रिजर्व बैंक ने फ़रवरी में एनपीए नियम कड़े करते हुए लगभग आधा दर्जन नियम खत्म कर दिए थे. अब किसी कर्ज़ डिफॉल्ट के मामले में बैंकों को 180 दिन के भीतर उसका समाधान निकालना अनिवार्य कर दिया गया है. ऐसा नहीं होने की स्थिति में उस खाते को दिवालिया प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाना होगा."
काजल कहती हैं, "नए नियम के तहत 2,000 करोड़ रुपये या इससे ज्यादा के लोन डिफॉल्ट के मामलों में बैंक अधिकारियों को 180 दिन के भीतर समाधान यानी प्रोविजनिंग की योजना तैयार करनी होगी. ऐसा नहीं होने पर उसे दिवालिया प्रक्रिया में ले जाना होगा."
नियम का असर से घाटा
तो क्या सरकारी बैंकों के तिमाही नतीजों में जो हज़ारों करोड़ रुपये का घाटा नज़र आ रहा है वो इसी नियम की वजह से है?
अर्थशास्त्री सुनील सिन्हा कहते हैं, "कुछ हद तक ये सही है कि बैंकों में डिफॉल्ट के मामले बढ़ रहे हैं. लेकिन अब बैंकों को उसकी प्रोविजनिंग यानी समाधान के लिए सिर्फ़ छह महीने दिए गए हैं, इसलिए बैंकों को इन एनपीए को घाटे के रूप में दिखाना ही होगा. इसका मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि बैंकों का ये कर्ज़ डूब गया है और अब वसूल नहीं होगा."
लेकिन बैंकिंग मामलों पर नज़र रखने वाले जानकार इस बात को भी मानते हैं कि बैंकों के कर्ज़ देने की प्रक्रिया में खामियां हैं और इसे दुरुस्त किया जाना चाहिए.
इसका एक उदाहरण है देना बैंक पर रिज़र्व बैंक की कार्यवाही. रिज़र्व बैंक ने 7 मई 2018 को देना बैंक को निर्देश दिया कि अगले निर्देशों तक वो नया कर्ज़ न बांटे और न ही किसी कर्मचारी की भर्ती करे. ये जानकारी ख़ुद देना बैंक ने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज को दी है.
निजीकरण की बहस
ऐसे में सवाल ये है कि क्या भारत का बैंकिंग सिस्टम बेहद लापरवाह है? क्या ये भ्रष्ट है या फिर बैंकों के सामने आ रहे एक के बाद एक घोटाले महज एक संयोग हैं?
नेशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल यानी एनसीएलटी की 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक कई दिग्गज कंपनियों पर हज़ारों करोड़ रुपये का कर्ज़ है और ये मामले ट्राइब्यूनल में चल रहे हैं. वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज़ पर 20,905 करोड़ रुपये, जेपी ग्रुप पर 25,586 करोड़ रुपये और जायसवाल नेको पर 4,188 करोड़ रुपये का कर्ज़ है.
हालाँकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ़ भारतीय बैंकों की इस निराशानजनक तस्वीर से इत्तेफ़ाक नहीं रखता.
आईएमएफ़ ने साल 2017 में भारत के 15 बड़े बैंकों (12 सरकारी और तीन निजी बैंकों) का स्ट्रैस टेस्ट किया था और पाया था कि इन बैंकों के डूबने का कोई ख़तरा नहीं है और इनकी 64 फ़ीसदी परिसंपत्तियां बुरे वक्त को झेलने में भी सक्षम हैं.
लेकिन एक और अर्थशास्त्री भरत झुनझुनवाला सरकारी बैंकों की कार्यप्रणाली और गवर्नेंस को बढ़ते एनपीए के लिए जिम्मेदार मानते हैं.
झुनझुनवाला कहते हैं, "असल मसला गवर्नेंस का है. सरकारी बैंकों का प्रबंधन कर्ज़ बांटने के लिए बहुत सख्त नहीं हो सकता. ये ठीक है उनके लिए एक प्रक्रिया तय की गई है, लेकिन इस प्रक्रिया का पालन ठीक से नहीं किया जाता है और कई मामलों में फेवर किया जाता है. अगर ऐसा नहीं होता तो बड़े-बड़े उद्योगपतियों को लोन इस तरह नहीं बांटे जाते."
भरत झुनझुवाला का मानना है कि अगर आम लोगों के पैसे को गलत हाथों में जाने से रोकना है तो सरकारी बैंको का निजीकरण कर दिया जाना चाहिए.
झुनझुनवाला कहते हैं, "सत्तर के दशक में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था तब वजहें कुछ और थी और लेकिन अब रिज़र्व बैंक निजी बैंकों पर कई शर्तें लगाकर ग्रामीण क्षेत्रों में इनकी पहुँच सुनिश्चित कर सकता है."
हालाँकि ऐसा मानने वाले झुनझुनवाला अकेले हों, ऐसा नहीं है. नीति आयोग के उपाध्यक्ष रहे अरविंद पनगढ़िया ने भी हाल ही में कहा था कि स्टेट बैंक को छोड़कर सभी सरकारी बैंकों को निजी हाथों में सौंप देना चाहिए.
ख़ैर, सरकारी बैंकों को हो रहे घाटों और इनके निजीकरण की बहस के बीच ये तथ्य भी नहीं भुलाया जाना चाहिए कि 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी में जब अमरीका में लेहमम ब्रदर्स, मेरिल लिंच, बैंक ऑफ़ अमरीका जैसे दिग्गज नकदी के अभाव में जूझ रहे थे, भारतीय बैंक मजबूती के साथ खड़े रहे थे और मंदी के चक्र से बेदाग़ निकल गए थे.
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