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नज़रिया: ''अर्थव्यवस्था मज़बूत है तो दिखती क्यों नहीं'
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) की प्रमुख क्रिस्टीन लैगार्ड ने हाल में भारतीय अर्थव्यवस्था में बदलाव लाने के लिए नोटबंदी और जीएसटी जैसे मोदी सरकार के प्रयासों की तारीफ की है.
उन्होंने कहा कि बीते सालों में अर्थव्यवस्था में किए गए बदलाव की वजह से भारत को बेहतर परिणाम मिला है और भारतीय अर्थव्यवस्था बेहद मजबूत रास्ते पर है.
आईएमएफ़ ने हाल में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर के अपने अनुमान को घटा दिया था. इस बारे में लैगार्ड ने कहा कि हमने विकास दर का अनुमान घटाया है, लेकिन हमारा भरोसा है कि भारत मीडियम और लॉन्ग टर्म में विकास के रास्ते पर है.
लेकिन हाल में भारत में कइयों का कहना है कि नोटबंदी और जीएसटी के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में रफ्तार धीमी हुई है.
तो ऐसे में उनके इस बयान से एक तरह का विरोधाभास सामने आ रहा है कि क्या भारतीय अर्थव्यवस्था असल में मज़बूत है और मज़बूत है तो भारत में यह दिखता क्यों नहीं.
बीबीसी संवाददाता कुलदीप मिश्र ने जेएनयू में अर्थशास्त्र के पूर्व प्रोफ़ेसर अरुण कुमार से पूछा. पढ़िए उनका नज़रिया.
प्रोफ़ेसर अरुण कुमार का नज़रिया
आईएमएफ़, वर्ल्ड बैंक और एशियन डेवलपमेंट बैंक के अपने कोई आंकड़े नहीं होते. वो जो आंकड़े लेते हैं वो सरकार के ही आंकड़े होते हैं. तो इन पर निर्भर होकर वो कोई अलग बात नहीं कर सकते.
दुनिया के हिसाब से देखें तो 5.7 प्रतिशत विकास दर के लिए बहुत अच्छी मानी जाती है. पिछले साल ये विकास दर 6.1 प्रतिशत थी. तो इसका मतलब कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार बस थोड़ी ही कम हुई है.
लेकिन अगर आप अन्य आंकड़ों को देखें तो असंगठित क्षेत्र के आंकड़ों को देखें कि वहां पर पिछले एक साल में कितनी गिरावट आई है तो आपको पता चलेगा कि विकास दर 5.7 प्रतिशत नहीं है, बल्कि एक प्रतिशत के आसपास है.
आईएमएफ़ का विश्लेषण अर्थव्यवस्था की सच्चाई पर आधारित नहीं है.
और फिर सरकार तो पहले से ही कह रही है कि अर्थव्यवस्था में व्यापक सुधार किए जा रहे हैं और इस कारण अर्थव्यवस्था भविष्य में आगे बढ़ेगी. आईएमएफ़ सरकार की ही बात को आगे बढ़ा रहा है.
तो क्या आईएमएफ़ के अलग मानक नहीं है?
आईएमएफ़ और उस जैसी संस्थाएं पूरी तरह सरकार के दिए आंकड़ों पर निर्भर हैं. उसी के आधार पर अपना विश्लेषण तैयार करते हैं. इस आंकड़े में कई चीज़ें शामिल ही नहीं होती.
पहला ये सरकार फिलहाल असंगठित क्षेत्र का कोई सर्वे भी नहीं कर रही है, नहीं तो इस बात के पता चल सकता कि अर्थव्यवस्था के 45 फीसद इस हिस्से में क्या हो रहा है और इसे कितना बड़ा धक्का लगा है.
दूसरा ये कि लैगार्ड ने कहा कि महंगाई नियंत्रण में है. हमारे जो इन्फ्लेशन के आंकड़े हैं उनमें सर्विस सेक्टर नहीं आते हैं और सर्विस सेक्टर आज सकल घरेलू उत्पाद का 60 प्रतिशत है.
स्कूल की फीस, टेलीफ़ोन बिल, इंश्योरेंस प्रीमियम बढ़ जाती है, लेकिन वो इसमें नहीं आ पाती हैं. इन सारी चीज़ों को देखें तो हमारी महंगाई दर भी इस समय 6-7 प्रतिशत से कम नहीं है.
जीएसटी में सीधे तौर पर सर्विस टैक्स को 15 फीसद से बढ़ाकर 18 फीसद कर दिया है जिसका असर सारी सर्विसेज़ पर पड़ा है. इसलिए ये बात भी सही नहीं है कि महंगाई नियंत्रण में है.
क्या कई फ़ायदेमंद होगी नोटबंदी?
सरकार समर्थकों और कई लोगों का मानना है कि नोटबंदी और जीएसटी के कारण अर्थव्यवस्था की रफ्तार भले ही कुछ वक्त के लिए धीमी हुई हो, लेकिन लंबे वक्त में ये फायदेमंद साबित होंगी.
नोटबंदी और जीएसटी जैसे प्रयासों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक बदलाव आ रहे हैं और इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता.
लेकिन अगर असंगठित क्षेत्र में कमी आई तो रोज़गार में कमी आएगी और इस कारण मांग में भी कमी आएगी. इस वजह से इस क्षेत्र में निवेश भी कम हो जाएगा और इसका असर लॉन्ग टर्म होगा.
निवेश कम हुआ तो इसका असर शॉर्ट टर्म नहीं होता. बैंकों से कर्ज़ नहीं लिया जा रहा है और ये इस बात का समर्थन है. जुलाई-अगस्त में क्रेडिट ऑफ़टेक माइनस में चला गया था जो हमारे बीते 70-80 सालों में नहीं हुआ है.
कम उत्पादन
मेरा मानना है कि क्रेडिट ऑफ़टेक कम होना दिखाता है कि निवेश कम हो रहा है और उत्पादन भी कम हो रहा है.
ये कहना कि संरचनात्मक बदलाव के कारण बाद में फायदे होंगे ये कहना ठीक नहीं है. अगर अभी नुकसान हो रहा है तो बाद में भी नुकसान ही होंगे.
अभी हम ये भी नहीं कह सकते कि हम कब तक इससे उबर पाएंगे. तो ऐसे में आईएमएफ़ किस लॉन्ग और शॉर्ट टर्म की बात कर रहा है ये कहना मुश्किल है.
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