छगन भुजबल: सब्जी बेचने से लेकर अंडा सेल तक

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- Author, आरती कुलकर्णी और प्राजक्ता धुलप
- पदनाम, बीबीसी मराठी
महाराष्ट्र के पूर्व उप मुख्यमंत्री और एनसीपी नेता छगन भुजबल को बॉम्बे हाईकोर्ट से शुक्रवार को मनी लॉन्ड्रिंग केस में ज़मानत मिल गई.
भुजबल को ज़मानत के लिए दो साल इंतज़ार करना पड़ा. लेकिन छगन भुजबल की ज़िंदगी में ये अकेला वाकया नहीं है, जब वो चर्चा में रहे.
कई मायनों में छगन भुजबल की ज़िंदगी दिलचस्प भी रही और कुछ नाटकीय भी. आइए आपको छगन भुजबल से जुड़े सात किस्से बताते हैं.
1. सब्ज़ी बेचने से लेकर मेयर बनने तक
मुंबई के भायखला बाज़ार में सब्ज़ी बेचने वाला एक युवक बालासाहेब ठाकरे के भाषणों से काफ़ी प्रभावित था.
युवक की मां इसी बाज़ार में एक छोटी-सी दुकान में फल बेचती थी. इस नौजवान ने अपने परिवार के धंधे को छोड़, राजनीति में जाने का फ़ैसला किया.
इस सपनों से भरे और महत्वाकांक्षी युवक का नाम था छगन चंद्रकांत भुजबल.
उस वक्त छगन वीजेटीआई कॉलेज से इंजीनियरिंग में डिप्लोमा कर रहे थे. लेकिन उन्होंने इसे बीच में ही छोड़ दिया. ज़मीन से जुड़े हुए लोगों के संपर्क में रहने के कारण और आक्रामक भाषणों के वजह से वो शिवसेना में एक महत्वपूर्ण नेता के रूप में आगे आए.
वरिष्ठ पत्रकार भरतकुमार राउत ने कहा कि वो शुरुआत से ही धाकड़ नेता थे. 1985 में, वह मुंबई के मेयर में चुने गए थे. उस समय, छगन भुजबल शिवसेना के लीलाधर डाके और सुधीर जोशी जैसे दूसरे स्तर के नेताओं की कतार में शामिल हो गए.
धीरे-धीरे बाला साहेब का छगन पर भरोसा बढ़ने लगा. ये वह वक्त था जब शिवसेना अपनी आक्रामक सियासत को पैना कर रही थी. और भुजबल का राजनीतिक दबदबा भी शिवसेना के साथ-साथ बढ़ने लगा.

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2. जब भेष बदल कर ग़ायब हुए भुजबल
छगन भुजबल के मन में नाटकों और सिनेमा के लिए जुनून था.
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत देसाई के मुताबिक, शायद यही वजह थी कि उनकी सियासत काफ़ी नाटकीय रही. 1986 में महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच बेलगाम को लेकर सीमा विवाद ज़ोरों पर था.
उस वक्त छगन भुजवल का नाम किन्हीं अलग वजहों से देशभर फैल गया. उस दौरान महाराष्ट्र के नेताओं को कर्नाटक में प्रवेश पर रोक लगी हुई थी.
इसके बावजूद भुजबल व्यापारी के भेष में बेलगाम में दिखे.
बुल्गानिन दाढ़ी, सिर पर पंख लगी टोपी, सफ़ेद कोट और हाथ में पाइप लेकर, कर्नाटक पुलिस को झांसा देकर वो बेलगाम के एक मैदान पहुंच गए और फिर वहां भाषण देना शुरू कर दिया. अपने जोशिले भाषण से उन्होंने वहां के मराठी भाषियों का मन जीत लिया. इस भाषण के तुरंत बाद उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया.
बालासाहेब ने उनके इस क़दम की तारीफ़ करते हुए, मुंबई के शिवाजी पार्क में रैली कर उनका सम्मान किया.

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3. भुजबल ने क्यों छोड़ी थी शिवसेना?
1989 में शिवसेना ने हिंदुत्व के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन किया. शिवसेना और बीजेपी राम मंदिर को लेकर इन दिनों चर्चा में थी.
इस आक्रामक रुख़ का शिवसेना को फ़ायदा हुआ और 1990 के विधानसभा चुनावों में पहली बार शिवसेना के 52 विधायक चुने गए.
शिवसेना अब महाराष्ट्र विधानसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बन गई थी. बालासाहेब ने मनोहर जोशी को विपक्ष के नेता का पद दिया.
पूर्व सांसद और पत्रकार भरत कुमार राउत बताते हैं कि विपक्ष के नेता की कुर्सी पर छगन भुजबल की भी नज़र थी. ये पद न मिलने पर उन्हें ठेस पहुंची. शायद यही वजह थी कि भुजबल ने मनोहर जोशी के साथ लगातार संघर्ष के कारण शिवसेना छोड़ने का फैसला किया.

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1991 में भुजबल ने नागपुर में विधानसभा सत्र के दौरान नौ विधायकों के साथ कांग्रेस में प्रवेश किया. उस समय शरद पवार राज्य में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता थे. ऐसा माना जाता है कि वही भुजबल को कांग्रेस में लाए थे.
ज़ाहिर है पार्टी छोड़ने से बालासाहेब बेहद नाराज़ थे. उन्होंने छगन भुजबल को 'लखोबा लोखंडे' का नाम दिया.
लखोबा लोखंडे 'तो मी नव्हेच' नाम के मशहूर मराठी नाटक का एक बदनाम पात्र था, जो नाटक में कई शादियां करता है.
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत देसाई कहते हैं, "उस समय शिवसेना छोड़ना एक आसान बात नहीं थी. इसके बाद से भुजबल शिवसैनिकों के निशाने पर आ गए. शिवसैनिक ने भुजबल के बंगले पर हमला करने की भी कोशिश की."
4. क़द्दावर नेता छगन भुजबल
सोनिया गांधी के विदेशी मूल के होने के कारण शरद पवार कांग्रेस से बाहर हो गए और उन्होंने नई राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया.
छगन भुजबल भी एनसीपी से जुड़ गए. उसी साल कांग्रेस और एनसीपी के गठबंधन के साथ सरकार सत्ता में आई और भुजबल महाराष्ट्र के गृह मंत्री बन गए.
मुम्बई दंगों के लिए बालासाहेब ठाकरे को गिरफ्तार करने का आदेश उन्ही के मंत्रालय ने जारी किया, जिससे एक नया राजनीतिक तूफ़ान का जन्म हुआ.
लेकिन अदालत ने बालासाहेब को बरी कर दिया और उन्हें राहत दी.

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भुजबल मुंबई के मेयर रह चुके हैं.
उन्होंने मुम्बई का विधानसभा चुनाव भी लड़ा लेकिन उन्हें उसमें हार मिली. और वे मुंबई छोड़कर नासिक लौट गए. 1999 में वे नासिक जिले के येवला से चुनाव लड़े और इसमें उन्हें जीत हासिल हुई.
लोकमत के दिल्ली संस्करण के सम्पादक सुरेश भटेवरा कहते हैं, "नासिक जिले में आने के बाद उन्होंने विकास के बहुत काम किये. नासिक से मुंबई तक उन्होंने चार लाइन वाला हाइवे बनवाया. नासिक के अंगूर और शराब उद्योग को उन्होंने पूरी दुनिया में पहुंचा दिया."
हालांकि इसके बाद भी भुजबल पर कई आरोप लगाए जा रहे थे. अब्दुल करीम तेलगी ने मनी लॉन्ड्रिंग से करोड़ों का घोटाला किया था. जिसकी चपेट में भुजबल भी आए. राजनीति में अपने बेटे और दामाद को उतारने के लिए उन्होंने उन्हें चुनाव टिकट बांटे इसलिए उन पर परिवारवाद के भी आरोप लगे.
भुजबल 2004 से 2014 तक सार्वजनिक विभाग के मंत्री थे. इस दौरान उन पर पद के गलत इस्तेमाल करने जैसे भूमि अधिग्रहण करने जैसे आरोप लगे. लेकिन भुजबल इन आरोपों को झूठा बताते रहे और उनका कहना था कि ये सब आरोप राजनीति का हिस्सा है.
5. भ्रष्टाचार और भुजबल
2014 में हाथ से सत्ता जाने के बाद वे ऐसे ही कई आरोपों में फंसते चले गए.
मार्च 2016 में दिल्ली में बने महाराष्ट्र सदन घोटाला मामले में उनको गिरफ़्तार किया गया. उन पर मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया गया था. उन्हें मुंबई के आर्थर रोड जेल में भेज दिया गया. दो सालों में उनकी ज़मानत की कई कोशिशें हुईं, लेकिन उन्हें ज़मानत नहीं मिल पाई थी.
हालांकि शुक्रवार 4 मई, 2018 को उन्हें ज़मानत मिल गई.

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कद्दावर नेता से भ्रष्ट नेता की छवि कैसे बनी?
कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब से छगन भुजबल एनसीपी में गए हैं, तब से उनमें कई बदलाव आ गए हैं.
वरिष्ठ राजनीतिज्ञ प्रवीण बर्दापुरकर से बीबीसी ने पूछा कि उनकी कद्दावर नेता से भ्रष्ट नेता की छवि कैसे बनी?
इस पर बर्दापुरकर बताते हैं, "भुजबल जब राष्ट्रवादी पार्टी में आए तब राज्य की आर्थिक उन्नति का समय था. ग्लोबलाइजेशन के कारण खुली अर्थव्यवस्था स्वीकार कर ली गई थी. उस समय देश के नेता अमीर से और अमीर होते चले गए. उन्हीं नेताओं में भुजबल का भी नाम था."
आगे वे बताते हैं, "लेकिन जिसे लोगों का प्यार और समर्थन प्राप्त था, जिसने शिवसेना को चुनौती दी, एक ऐसा नेता भ्रष्टाचार के आरोपों में घिर गया. ये बहुत ही दुखद रहा. हालांकि भुजबल को अब ज़मानत मिल गई है लेकिन वे निर्दोष है या नहीं इसका फ़ैसला नहीं हुआ है. उनके कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि उनपर से सारे आरोप जल्द ही साफ़ हो जाएंगे."
भुजबल पर भ्रष्टाचार के आरोपों के बारे में राष्ट्रवादी नेता जितेंद्र आव्हाड कहते हैं, "भुजबल पर कोई गंभीर आरोप सिद्ध नहीं हुआ है फिर भी उन्हें दो साल तक जमानत नहीं मिली, क्यों?"
वे इसी में आगे जोड़ते हैं, " क्योंकि वे ओबीसी नेता हैं इसलिए ये एक साजिश भी हो सकती है. जैसे लालू प्रसाद यादव के साथ भी हो रहा है. ये मामला अभी कानून के हाथ में हैं इसलिए हम ज्यादा कुछ नहीं कह सकते. लेकिन हमें उम्मीद है भुजबल जल्द ही निर्दोष साबित हो जाएंगे."
6. ओबीसी नेता
दो दशकों तक वे शिवसेना के कार्यकर्ता और मेयर के रूप में शिवसेना से जुड़े रहे, लेकिन तब तक किसी को नहीं पता था कि वे एक माली समुदाय से आते हैं.
1991 में वे शिवसेना से बाहर हो गए और वे एनसीपी में शामिल हो गए. एनसीपी में जाने के बाद उन्होंने माली समुदाय से होने का कई बार ज़िक्र किया.

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वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश बाल कहते हैं, "शिवसेना एक विश्वसनीय स्वयंसेवकों की पार्टी है. बालासाहेब ठाकरे के लिए जाति इतनी महत्वपूर्ण नहीं थी. बल्कि शिवसेना को मुंबई के बाहर ले जाने का काम भुजबल ने ही किया था. लेकिन उसी समय भुजबल कांग्रेस चले गए और उनकी ओबीसी वर्ग की सीट को भर दिया."
कांग्रेस में अपना वजूद बनाने के लिए उन्होंने जमकर मेहनत करना शुरू कर दिया. 1992 में उन्होंने समता परिषद् की स्थापना की. फुले-आंबेडकर के नाम पर कई कार्यक्रम आयोजित करना शुरू किया.
मुंबई से नासिक आना और एनसीपी की स्थापना होना भुजबल के लिए बहुत ही फ़ायदेमंद रहा.
प्रकाश बाल कहते हैं, ''ओबीसी नेता होने से भी ज्यादा भुजबल को कांग्रेस पार्टी में अपनी पहचान बनानी थी. पर उनके ये प्रयास ज्यादा कारगर साबित नहीं हुए. इतना ही नहीं उत्तर भारत में कई सभा और कार्यक्रम करने के बाद भी वे अपनी मौजूदगी नहीं बना पाए.''

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7. सफ़ेद दाढ़ी वाले भुजबल
छगन भुजबल लगभग 26 महीने तक जेल में रहे. जब वे गृहमंत्री थे तब उन्होंने आर्थर रोड जेल में अंडा सेल बनवाया. उसी अंडा सेल में गिरफ्तारी के बाद उन्हें भी रखा गया.
राजकीय पत्रकार आशिष जाधव कहते हैं, ''उनका उसी अंडा सेल में जाना संयोग की बात है. वो वहां एश और आराम में रह रहे हैं ऐसी कई ख़बरें सामने आई. उनको घर से खाना भी मिलता है इसकी शिकायत सामाजिक कार्यकर्ता अंजली दमानिया ने दर्ज करवा दी. इसके बाद से उनका घर से खाना आना बंद हो गया.
वे आगे कहते हैं, ''ज़मानत से बाहर आने के बाद भुजबल फिर से राजनीति में सक्रिय होंगे, ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं. उन्हें लोगों की सहानुभूति मिले इसलिए उन्होंने दाढ़ी बढ़ाकर अपना ऐसा हाल बना रखा है. ''
इतने दिन से भुजबल से दूरी बनाए रखने वाले सभी एनसीपी नेताओं ने जमानत मिलने पर भुजबल का स्वागत किया. अजीत पवार को लगता है कि जमानत के बाद वे अब सक्रिय राजनीति में आएंगे.
2019 में होने वाले चुनाव में अब एक साल से भी कम का समय ही बचा है.
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