नज़रिया: नेहरू को औरंगज़ेब और ख़ुद को शिवाजी का सिपाही बनाने की सियासत

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- Author, सुहास पलशीकर
- पदनाम, समाजशास्त्री, बीबीसी हिंदी के लिए
आज एक मई को महाराष्ट्र को अलग राज्य बने 58 वर्ष हो चुके हैं, बड़ी-सी बंबई प्रेसीडेंसी को तोड़कर दो राज्य बने थे महाराष्ट्र और गुजरात.
इस मौके पर माहौल ऐसा बनाया जाता रहा है मानो महाराष्ट्र राज्य की स्थापना के आंदोलन में जुटे मराठी लोग शिवाजी के सिपाही थे और नेहरू तो बिल्कुल औरंगज़ेब थे.
महाराष्ट्र दिवस इतिहास में डुबकियाँ लगाने का दिन है, महाराष्ट्र दिवस का उत्सव दो दिन पहले ही मराठी भाषा दिवस के रूप में शुरू हो जाता है. इस मौके पर मौजूदा भाषा को सशक्त बनाने की जगह मराठी भाषा के प्राचीन और समृद्ध होने पर प्रवचन दिया जाता है.
वैसे महाराष्ट्र अपना ज़्यादातर समय इतिहास में गोते लगाने में गुज़ारता है, खुद को इतिहास के आईने में देखकर मराठी तय करते हैं कि दूसरों को कैसे दोष देना है, इसके लिए वे अतीत के दुश्मनों को ज़िंदा कर लेते हैं. इस तरह से हम मराठी अपने विरोधियों को ऐतिहासिक नाटकों के पात्रों में ढाल देते हैं.
कोई आंदोलन हो, चुनावी भाषण हो, सरकारी नीति पर चर्चा हो, हम मराठी इतिहास में गोते लगाते हैं. ऐसे में महाराष्ट्र दिवस इतिहास में डूबने का ऑफ़िशियल दिन बन गया है तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है?

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इतिहास की शरण क्यों
इतिहास हमें धरोहर देता है, वर्तमान को देखने की दृष्टि देता है, वैसे ही इतिहास हमें बीते समय में लीन होने का मौक़ा भी देता है. इतिहास की याद हमें खुद के बारे में बताती है, लेकिन अगर समाज उसी में उलझकर रह जाए तो ये अलग बात है.
हालाँकि यह पूरे भारत के सार्वजनिक व्यवहार में दिखाई देता है, देश भर में समय-समय पर अपनी बात को पुख़्ता साबित करने के लिए इतिहास का हवाला दिया जाता है. असल में स्वतंत्रता संग्राम को हर प्रदेश की गर्व की भावना और प्रदेश के प्रतीकों से ही ताक़त मिली.
यही वजह है कि जब राष्ट्र की भावना तैयार हुई तो वह प्रांतों के इतिहास को जोड़कर ही बनी.
दूसरी बात ये है कि राज्यों के निर्माण की माँग में हर प्रदेश और वहाँ के भाषाई समूह का इतिहास एक मुद्दा बन गया. तीसरी बात ये कि लगभग हर राज्य की राजनीति में उसका इतिहास एक भावनात्मक मुद्दा था जिसका राजनीतिक दलों ने जमकर इस्तेमाल किया.
यह सभी प्रदेशों में हुआ और महाराष्ट्र इसका अपवाद नहीं है.

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महाराष्ट्र वर्तमान से भाग रहा है?
महाराष्ट्र राज्य की स्थापना का आंदोलन इतिहास पर ही टिका हुआ था. मतलब इतिहास के प्रतीकों को वर्तमान से जोड़ा गया, जो भाषा इस्तेमाल की गई उसके सारे मुहावरे इतिहास से उठाए गए थे.
हम महान हैं, हमारा इतिहास महान है, सिर्फ़ हमारे पास ही ऐसा इतिहास है, इस तरह के भ्रम में मराठी रहने लगे. इतिहास से कुछ सीखने की बजाय, कुछ भी नया न सीखने के लिए हम मराठी लोग इतिहास की आड़ में छिपने लगे. वर्तमान की ऊर्जा साबित होने के बजाय वर्तमान से भागने का रास्ता बन गया है इतिहास.
मन इतिहास में, भाषा इतिहास की, कल्पनाएँ इतिहास की और करनी बिल्कुल इतिहास से विपरीत, ऐसी विचित्र अवस्था में मराठी फँसे हुए हैं. ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ़ आज हो रहा है.
पीछे जाकर 19वीं सदी में अगर हम देखें तो राज्य के कुलीन ब्राह्मणों के दिल में पेशवाई के ख़त्म होने का दर्द और अतीत के वैभव की यादें भरी पड़ी हैं.
उस वक्त सिर्फ़ अपना राज और वर्चस्व ख़त्म होने का दर्द ही नहीं था, इस बात का दावा भी था कि मराठी संस्कृति में सब कुछ श्रेष्ठ है, सब कुछ गर्व करने योग्य है और उसमें समस्त ज्ञान ही नहीं बल्कि विज्ञान भी कूटकूट कर भरा हुआ है. अँग्रेज़ी शिक्षा और ग़ैर-ब्राह्मण जातियों के मज़बूत होने से इसमें थोड़ी कमी आई, लेकिन यह भावना अब भी मराठी ब्राह्मणों में दिखती है.

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बीसवीं सदी के मध्य से 'मराठी' राज्य की स्थापना का आंदोलन शुरू हुआ और इतिहास की यादें उसके केंद्र में थीं. इस दौर में फिर से एक बार संभ्रांत मराठी मध्यम वर्ग ने अपनी सांस्कृतिक संवेदना इतिहास के आधार पर पक्की करने का प्रयास किया.
संयुक्त महाराष्ट्र का आंदोलन ख़त्म हुआ, लेकिन 60 के दशक में और उसके बाद भी पढ़े-लिखे, समृद्ध मराठी तबके के मन में मराठाशाही का सपना पलता रहा.
महाराष्ट्र राज्य की स्थापना के तुरंत बाद शिवसेना की स्थापना हुई. उसका राजकीय विस्तार शुरू में मुंबई-ठाणे तक सीमित था, लेकिन उसकी कल्पनाएँ, उसकी भाषा और उसके प्रतीकों का गहरा प्रभाव मुंबई-ठाणे के सिवाय राज्य के अन्य शहरी भागों में रहने वाले मध्य वर्ग पर पड़ा.
अपने आसपास होने वाले सांस्कृतिक उथल-पुथल से बिल्कुल कटकर मध्यम वर्ग साठ और सत्तर के दशक में बीएम पुरंदरे और जीएन दांडेकर के लिखे इतिहास में लीन था. उसे 'स्वामी' और 'श्रीमान योगी' जैसे उपन्यासों ने और मज़बूत किया.

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सारांश ये है कि शिवसेना के उदय के वक्त यहाँ का संभ्रांत मध्य वर्ग किस तरह से इतिहास में लीन था, यह यहाँ पर समझ लेना चाहिए. मराठी समाज की सिर्फ़ राजनीति ही इतिहास के कब्जे में नहीं, बल्कि यहाँ की संस्कृति और सार्वजनिक जीवन पर भी इतिहास का गहरा प्रभाव रहा है.
मराठी मध्यवर्ग अपने घटते वर्चस्व को इतिहास का आधार देकर फिर से खड़ा करने और वर्तमान में घट रही प्रतिष्ठा की भरपाई इतिहास से करने की कोशिश कर रहा है.
इतिहास पर घमासान
सभी गुट इतिहास के ऊपर ही निर्भर थे, लेकिन उस इतिहास का अर्थ कैसे लगाया जाए. उससे जु़ड़े हुए विवाद, उस पर होने वाली राजनीति का एक और दौर था जब सवर्णों के इतिहास को नकारते हुए, आम लोगों के लिए अलग इतिहास लिखने की पहल महात्मा ज्योतिराव फुले ने की. उन्होंने शिवाजी पर पोवाडा (छंद) लिखकर इसकी शुरूआत की.
इसी का अगला एपिसोड शुरू होता है 1970 के दशक के बाद. गोविंद पानसरे की किताब 'शिवाजी कोण होता?'(शिवाजी कौन थे?) को इस दौर का 'टर्निंग प्वाइंट' माना जा सकता है.
हालांकि यह किताब काफ़ी बाद में मतलब 1988 में आई. उस वक्त तक अनेक बुद्धिजीवी और राजनैतिक कार्यकर्ताओं पर शरद पाटिल और इतालवी विचारक ग्राम्शी का प्रभाव पड़ना शुरू हुआ था.
इतिहास की पुनर्रचना करके उसे जनआंदोलन के हथियार की तरह इस्तेमाल करना इसी दौर में शुरू हुआ. इसी से आम लोगों के लिए नया नायक बनाने का प्रयास जिस तरह से हुआ, उसी तरह स्थापित नायकों को संभ्रांत वर्ग के चंगुल से निकालकर आम लोगों के नायक की तरह पेश करने की कोशिश भी हुई.

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शिवाजी महाराज बड़ी साम्राज्यवादी ताक़त मुग़लों से लोहा लेने के लिए याद किए जाने चाहिए, लेकिन आज शिवाजी महाराज की जो भी चर्चा होती है वह उनके कार्य से मिलने वाले संदेश की नहीं होती, चर्चा होती है उनका स्मारक कितना ऊँचा है और उसकी ऊँचाई कौन कम करना चाहता है.
आज इतिहास और ऐतिहासिक प्रतीकों पर निर्भर रहने का दौर है. इस दौर में इतिहास का आश्रय लिया जाता है वर्तमान के खोखलेपन की वजह से.
वर्तमान सवालों पर बोलने लायक अगर कुछ न हो, भविष्य से भिड़ने की हिम्मत अगर आज के राजनीति में न हो तो उस वक़्त ऐतिहासिक यादें, प्रतीक, भाषा, चुनौतियां इन के बीच छिपकर बैठना आसान हो गया है.

वर्तमान से भागने के लिए और अपनी खोखली, अर्थहीन राजनीति छिपाने के लिए इतिहास से शहीदों, किलों, गद्दारों-शत्रुओं को सामने खड़ा करके गर्जनाएँ की जा रही हैं.
सत्ता में बैठे जिन लोगों को आम जनता के हितों की नीतियों पर काम नहीं करना, वे सत्ताधारी महापुरुषों के स्मारकों की बातें कर सकते हैं. विपक्ष के रूप में विफल रहे दल, प्रतीकों की राजनीति में लीन हो सकते हैं और जो गुट पूरी व्यवस्था बदलना चाहते हैं, वे जनाक्रोश को आंदोलन में बदलने में नाकाम होने के कारण इतिहास के खेल में शामिल होकर क्रांति कर रहे हैं.
कुल मिलाकर बात ये है कि इतिहास में गोते लगाने की ये मजबूरी खोखली और जनविरोधी राजनीति से पैदा हुई है.












