प्रसून जोशी: 'ज़िंदा है तो प्याला पूरा भर ले...'

मोदी और प्रसून जोशी

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    • Author, विकास त्रिवेदी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

25 नवंबर 2017.

मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया पर 26/11 हमले के बरसी की तैयारियां चल रही थीं. मंच पर प्रसून जोशी 'मुमकिन है' कविता पढ़ ही रहे थे, तभी वहां खड़े शो के डायरेक्टर बेरुख़ी अख़्तियार कर प्रसून से कहते हैं- दर्द लाओ प्रसून, दर्द.

ये सुनकर स्टेज के नीचे खड़ा मैं और ऊपर प्रसून जोशी तनिक झेप गए. उस दिन प्रसून अपने डायरेक्टर को भले ही प्रभावित न कर पाए हों. लेकिन क़रीब पांच महीने बाद कवि से पत्रकार की मुद्रा में आए प्रसून जोशी देश के 'डायरेक्टर' प्रधानमंत्री मोदी को भरपूर प्रभावित कर गए.

लंदन में 18 अप्रैल को मोदी के दो घंटे 20 मिनट लंबे 'भारत की बात सबके साथ' कार्यक्रम को गीतकार प्रसून जोशी ने होस्ट किया. इस पूरे कार्यक्रम को देखें तो प्रसून की तीन भूमिकाएं उभरकर आती हैं.

पहली: आम लोगों के तारीफभरे सवाल मोदी से पूछना

दूसरी: अपने तारीफभरे सवाल मोदी से पूछना

तीसरी: 'भारत और मोदी पर खरी उतरती' तारीफभरी कविताएं पढ़ना

इसका एक नन्हा उदाहरण प्रसून जोशी के इस सवाल से समझिए.

'मोदी जी क्या कभी आप बेसब्र हो जाते हैं. कभी निराशा होती है कि चीजें मोदी जी के हिसाब से.. बुलेट ट्रेन की स्पीड से नहीं चल रही हों?'

सवाल सुनकर प्रफुल्लित हुए मोदी कहते हैं, ''मुझे नहीं पता था कि कवि के भीतर भी पत्रकार बैठा होता है.''

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लंदन में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार परवेज़ आलम ने इस कार्यक्रम पर लिखा, ''इस शो में हर एक चीज, कहां क्या आना है, क्या सवाल होगा, वो क्या जवाब देंगे पहले से तय प्रतीत हो रहा था. मोदी का इंटरव्यू ले रहे गीतकार प्रसून जोशी ने भी कमाल की भूमिका निभाई. ऐसे सवाल पूछे कि प्रधानमंत्री मोदी गदगद हो गए.''

कीर्तीश का कार्टून

लेकिन गदगद मोदी और कविराज प्रसून जोशी यहीं नहीं रुके. दो घंटे 20 मिनट तक बातें बदलीं लेकिन मूल भावना में प्रशंसा विराजमान रही.

इसलिए इस भाषण से अतीत की तरफ चलते हैं और आपको प्रसून जोशी की कहानी बताते हैं.

प्रसून जोशी

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साइंस के नियम धराशायी करने वाला अल्मोड़ा का लड़का

प्रसून जोशी के 'कुछ कर गुज़रने' की शुरुआत पहाड़ों से हुई. उत्तराखंड के अल्मोड़ा में 1971 में जन्म हुआ. पिता पीसीएस अफसर थे. मां क्लासिकल सिंगर.

मां-पिता दोनों की संगीत में दिलचस्पी थी. इकोनॉमिक टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में प्रसून ने कहा था, ''पिता पीसीएस अधिकारी थे तो देर रात तक लाइब्रेरी खुलवाए रखने में दिक्कत नहीं होती थी. सुबह नींद मां के रियाज़ से खुलती.''

लेकिन प्रसून ने गीत गाना नहीं, लिखना चुना. 17 साल की उम्र में पहली किताब 'मैं और वो' लिखी. प्रसून अब तक पांच किताबें लिख चुके हैं.

'तारे आसमां नहीं ज़मीन पर खोते हैं' जैसे गीतों के ज़रिए साइंस के नियमों को धराशायी करने वाले प्रसून ने फिजिक्स में पोस्ट ग्रेजुएशन की और एमबीए की पढ़ाई की.

पर जल्द ही प्रसून ने दूसरी राह पकड़ ली.

प्रसून जोशी

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कैसे हुई ऐड गुरु प्रसून के करियर की शुरुआत?

एमबीए करने के बाद प्रसून जोशी ने करियर की शुरुआत ऐड कंपनी 'ओग्लिवी एंड मैथर' में बतौर जूनियर कॉपीराइटर की.

ये उन्हीं पीयूष पांडे की सरपरस्ती वाली ऐड कंपनी है, जिसने साल 2014 में नरेंद्र मोदी के चुनावी अभियान के लिए 'अबकी बार मोदी सरकार' नारा लिखा था.

इस कंपनी में प्रसून जोशी को नौकरी मिलने का किस्सा भी दिलचस्प है.

बिजनेस स्टैंडर्ड के श्यामल मजूमदार को दिए इंटरव्यू में प्रसून ने इस बारे में बताया था.

प्रसून कहते हैं, ''ओग्लिवी एंड मैथर के हेड ने एक टाइल की तस्वीर मेरी तरफ उछालकर कहा कि दो घंटे के भीतर इस पर एक विस्तृत कॉपी लिखकर जमा करो. मैंने दस मिनट में कॉपी लिखकर जमा कर दी. कुछ सेकेंड्स में बॉस ने कहा- तुम्हें नौकरी पर रख लिया गया है.''

प्रसून ने इस कॉपी में लिखा था, ''इन टाइल्स को लगवाने के लिए आपको बहुत अमीर होना पड़ेगा. अमीर अपनी कल्पनाओं में.''

साल 2002 में प्रसून एक दूसरी ऐड कंपनी 'मैकएन' से जुड़े. इस कंपनी में रहते हुए प्रसून ने कई ऐड और पंचलाइन लिखे.

  • 'अबे फ्लावर पॉट, ठंडा मतलब कोका कोला
  • सैय्या मोरे गप्पी देते नहीं पप्पी. लोग क्लोरमिंट क्यों खाते हैं? दोबारा मत पूछना
  • ठंडे का तड़का... यारा का टशन
  • अतिथि देवो भव:'
  • उम्मीदों वाली धूप, सनसाइन वाली आशा. रोने के बहाने कम हैं, हँसने के ज़्यादा.'
प्रसून जोशी

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ऐसा नहीं है कि प्रसून जोशी के लिखी पंचलाइन्स को सिर्फ पसंद ही किया गया. 'उम्मीदों वाली धूप' कैंपेन को लेकर कुछ आलोचकों का एक नज़रिया ये भी रहा कि प्रसून समाज की सच्चाई को नकार गए और सिर्फ़ बाज़ार के समर्थक के तौर पर नज़र आते हैं.

लेकिन सच ये रहा कि प्रसून की ठंडा मतलब कोका कोला अभियान को साल 2003 में विज्ञापन की दुनिया का प्रतिष्ठित कान लॉयन अवॉर्ड मिला. 1992 से करियर की शुरुआत करने वाले प्रसून का नाम अब दुनिया जानने लगी थी.

मोदी से प्रसून का कनेक्शन आज का नहीं है. मोदी जब गुजरात के सीएम थे, तब स्वर्णिम गुजरात अभियान को लिखने का श्रेय भी प्रसून जोशी को जाता है.

फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े एक गीतकार के मुताबिक़, जिन प्रसून जोशी ने अपने करियर की शुरुआत 1500 रुपये से की थी... अब वो एक गाना लिखने के लिए क़रीब चार से छह लाख रुपये लेते हैं.

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फ़िल्मों में प्रसून जोशी का सफ़र...

'ना कोई धरती है तेरी ना कोई गगन, शाख से पत्ते को जैसे ले चले पवन, कौन डगर कौन शहर'

ये वो शुरुआती शब्द थे, जो प्रसून जोशी के कलम से निकले और किसी फ़िल्म में गीत बना. फ़िल्म थी साल 2001 में आई राजकुमार संतोषी की फ़िल्म लज्जा.

फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही. ऐसे में गीतकार प्रसून जोशी को पहचान बनाने के लिए इंतज़ार करना पड़ा. साल 2006 में फ़िल्म 'रंग दे बसंती' आई.

'खलबली है खलबली... कुछ कर गुज़रने को खून चला... मस्ती की पाठशाला.. लुका छिपी.. तू बिन बताए मुझे ले चल कहीं.' जैसे गाने लोगों की ज़ुबां पर चढ़ गए.

इन गानों का असर 2011 में अन्ना आंदोलन और 2012 में निर्भया गैंगरेप केस के बाद सड़कों पर उतरी युवाओं की भीड़ पर दिखा. ये वो भीड़ भी थी, जो सिस्टम से परेशान थी और मन में 'कुछ कर गुज़रने को खून चला' भाव लिए हुई थी.

'देखो इन्हें ये हैं ओस की बूंदें...

दुनिया का नारा जमे रहो, मंजिल का इशारा जमे रहो...

खोलो खोलो दरवाजे, पर्दे करो किनारे...'

तुझे सब है पता, है ना मां....'

2007 में आई 'तारे ज़मीन' पर फ़िल्म के गीतों को भी काफी पसंद किया गया.

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दिल्ली-6, आरक्षण, लंदन ड्रीम्स, ब्लैक, नीरजा, हम तुम, ग़जनी, फ़ना.. ये उन कुछ फ़िल्मों के नाम हैं, जिनके लिए प्रसून ने गाने लिखे.

मिल्खा सिंह की ज़िंदगी पर बनी फ़िल्म 'भाग मिल्खा भाग' को लिखने का काम भी प्रसून जोशी ने किया था.

2018 में कंगना रनोट की फ़िल्म 'मणिकर्णिका- द क्वींस ऑफ झांसी' में आपको प्रसून जोशी के लिखे गीत सुनाई देंगे.

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प्रसून जोशी का 'हासिल-ए-महफिल'

  • 2002: विज्ञापन जगत का ABBY अवॉर्ड
  • 2003: कान्स लॉयन अवॉर्ड
  • 2005: 'सांसों को सांसों' गाने के लिए स्क्रीन अवॉर्ड
  • 2007: चांद सिफारिश गाने के लिए फ़िल्मफेयर अवॉर्ड
  • 2008: 'मां' गाने के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर
  • 2013: फ़िल्म 'चिटगॉन्ग' के गीत 'बोलो ना' के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार
  • 2014: फ़िल्म 'भाग मिल्खा भाग' के गाने 'ज़िंदा है तो प्याला पूरा भर ले' के लिए फिल्मफेयर
  • 2015: फ़िल्म 'भाग मिल्खा भाग' के लिए बेस्ट स्टोरी अवॉर्ड
  • 2015: पद्मश्री पुरस्कार
  • 2017: विवादों में रहे पहलाज निहलानी के सेंसर बोर्ड अध्यक्ष से हटने के बाद प्रसून जोशी बने चेयरमैन
प्रसून जोशी

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राष्ट्रीय मुद्दों पर जब चर्चा में रहे प्रसून जोशी

'पद्मावत' फ़िल्म को लेकर विरोध की चिंगारी प्रसून जोशी तक भी पहुंची थी. मेवाड़ के पूर्व राजघराने के प्रमुख महेंद्र सिंह मेवाड़ ने प्रसून जोशी पर अंधेरे में रखने का आरोप लगाया था.

सिंह ने केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी को इस संबंध में एक ख़त लिखा था. ख़त में आरोप लगाया गया कि सेंसर बोर्ड ने फिल्म को हरी झंडी देने में जिस तरह से ज़ल्दबाजी में कदम उठाए हैं, उससे बोर्ड की साख़ पर ही सवाल खड़े हो गए हैं.

इसी विरोध के चलते साल 2018 में प्रसून जोशी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में नहीं जा पाए.

अयोध्या मंदिर के मुद्दे पर साल 2010 में प्रसून जोशी की कविता चर्चा में रही. कविता के बोल थे,

'किसी ने कुछ बनाया था. किसी ने कुछ बनाया है

ना जाने किसका मंदिर है, ना जाने किसकी मस्जिद है

अगर हिंदू में आंधी है, अगर तूफान मुसलमां है

तो आओ आंधी तूफान यार बनके कुछ नया करते हैं.'

निर्भया गैंगरेप केस के बाद प्रसून जोशी सड़कों पर अपनी कविता 'बाबुल मोरा जिया घबराए' गाते नज़र आए.

बीते साल रेयान इंटरनेशन स्कूल में प्रद्युमन की हत्या के बाद प्रसून जोशी ने फ़ेसबुक पर एक कविता लिखी थी, जो काफी वायरल हुई.

प्रसून जोशी

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प्रसून जोशी को कौन-कौन पसंद?

प्रसून जोशी की पत्नी अपर्णा तंगी के दिनों में उनकी वित्तीय मदद करती थी.

प्रसून जोशी को गुलज़ार बहुत पसंद हैं. प्रसून अक्सर कहते हैं, ''मुंबई को मैं कई चीजों के बावजूद माफ कर देता हूं. क्योंकि वहां गुलज़ार साहेब रहते हैं.''

प्रसून के पसंदीदा संगीतकार शंकर एहसान लॉय हैं. अपने कई इंटरव्यू में प्रसून जोशी ये कहते नज़र आते हैं कि उन्हें सामाजिक कामों में खुशी मिलती है.

आमिर ख़ान के शो 'सत्यमेव जयते' का टाइटल ट्रैक भी प्रसून जोशी ने ही लिखा था.

प्रसून जोशी

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एक कवि की सत्ता के प्रति निष्ठा...

प्रसून जोशी का बतौर सेंसर बोर्ड अध्यक्ष लंदन जाना और मोदी की तारीफ़ करना कुछ लोगों को रास नहीं आया.

वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन लिखते हैं, ''लंदन में प्रसून जोशी जो कर रहे हैं, वह चापलूसी की इन्तहा है. लंदन में आप प्रधानमंत्री से बहुत असुविधाजनक​ प्रश्न न पूछें, यह समझ में आता है, मगर प्रश्न तो पूछें- यहां तो बस प्रशस्ति है.''

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ऊपर ट्वीट में फ़कीरी का ज़िक्र इसलिए आया, क्योंकि प्रसून जोशी ने मोदी से मासूमियत से एक सवाल किया था- एक फकीरी है आपके साथ. कहां से आई है फकीरी?

एक कवि के सवाल पर मोदी का कविता प्रेम जाग गया. वो अपनी कविता तो नहीं सुना पाए लेकिन राजा रंति देव की कविता सुनाते हैं, ''न मुझे राज्य का कामना है. न मुझे मोक्ष, न मुझे पुनर्जन्म की कामना है....''

संभव है कि मोदी के चुनावी भाषण सुन चुके लोगों को 'राज्य की कामना..' वाली लाइन विरोधाभासी लगे.

लेकिन एक कविता कुछ करती हो या न करती हो. एक नई कविता की संभावना को जन्म ज़रूर देती है.

'एक आसमां कम पड़ता है/ और आसमां मंगवा दो

हैं बेसब्र उड़ानें मेरी/ पंख ये नीले रंगवा दो

स्वप्न करोड़ों सत्य हो रहे/ अब उनका सत्कार करो

निकल पड़ा है भारत मेरा/ अब तुम जय जयकार करो'

मोदी से लंबी तारीफभरी बातचीत के आख़िर में प्रसून जोशी इन्हीं लाइनों से कार्यक्रम का समापन करते हैं.

ये देखकर ऐसा महसूस होता है कि शायद कवि, ऐडगुरु, सेंसर बोर्ड अध्यक्ष और अब 'पत्रकार' प्रसून जोशी ने अपनी लिखी एक लाइन को ज़िंदगी में उतार लिया है.

'ज़िंदा है तो प्याला पूरा भर ले...'

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