नज़रिया: 'उन्नाव रेप केस ने खोल दी योगी आदित्यनाथ की पोल'

योगी आदित्यनाथ

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    • Author, शरत प्रधान
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार

तेरह महीने पहले जब योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश की कमान दी गई तब ये समझा रहा था कि एक 'ईमानदार मुख्यमंत्री' देश के सबसे बड़े प्रदेश में कुछ और ना हासिल कर पाए, कम से कम अपराध पर तो क़ाबू पा ही लेगा.

दरअसल, अखिलेश यादव के नेतृत्व की सपा सरकार में अपराध चरम पर पहुंच गया था और धारणा बन गई थी कि अपराधियों को खुली छूट है.

शुरू में जिस तरह भगवाधारी महंत से मुख्यमंत्री बने योगी ने डंडा चलाया, ऐसा लगने लगा कि गुंडों और भ्रष्टाचारियों का अंत अब दूर नहीं है. लेकिन समय के साथ कलई खुलने लगी और एक साल पूरा होने तक ये दिखने लगा कि घूम फिरकर स्थितियां कुछ अखिलेशकाल जैसी होती जा रही हैं. बल्कि सांप्रदायिकता को बढ़ावा मिलने के कारण हालात और ज़्यादा बिगड़ते हुए दिखने लगे.

मुक़म्मल मुख्यमंत्री हैं भी या नहीं

अमित शाह, योगी आदित्यनाथ, नरेंद्र मोदी

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अब उन्नाव रेप कांड और मर्डर के बाद तो यह स्पष्ट हो गया है कि योगी कोई 'चीफ मिनिस्टर विद अ डिफरेंस' तो नहीं हैं, बल्कि उनके 'मुक़म्मल मुख्यमंत्री' होने पर भी शंका होने लगी है. इसके ज़िम्मेदार वो ख़ुद हैं. जिस तरह अखिलेश काल में कहा जाता था कि यूपी में साढ़े पांच मुख्यमंत्री हैं और उनमें आधे अखिलेश हैं. शायद योगी की गाड़ी भी उसी दिशा में चल पड़ी है. कम से कई ढाई मुख्यमंत्री तो अभी से दिखने ही लगे हैं.

और अब इस रेप कांड में आरोपी भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की गिरफ़्तारी को लेकर जिस तरह नाटक हुआ, उससे यह साफ़ हो गया है कि यूपी की बागडोर योगी के अलावा कुछ और लोगों के पास भी है. नहीं तो यह मुमकिन नहीं था कि विशेष जांच टीम (एसआईटी) की सिफ़ारिश के बावजूद भी सेंगर की गिरफ़्तारी न की जाए.

आईपी सिंह का ट्वीट

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पार्टी के एक नेता आईपी सिंह ने तो ख़ुद ये ट्वीट किया है कि योगी आदित्यनाथ तो एसआईटी रिपोर्ट से सहमत हो गए थे और सेंगर की गिरफ़्तारी के लिए रज़ामंद भी हो गए थे, लेकिन आख़िरी वक़्त पर किसी उच्चस्तरीय नेता ने वीटो लगाकर गिरफ़्तारी रुकवा दी और योगी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे.

उसके बाद सेंगर अपने रुतबे की नुमाइश करने के लिए लखनऊ के एसएसपी के दफ़्तर पर रात 12 बजे पहुंचे और मीडिया को बड़ी शान से यह बताया कि मैं यहां आया हूं सिर्फ़ यह बताने के लिए कि 'मैं भगौड़ा नहीं हूं.'

'माननीय विधायक जी'

कुलदीप सिंह सेंगर

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सुबह होते ही 10 बजे प्रदेश के प्रधान सचिव (गृह) और पुलिस महानिदेशक ने एक विशेष प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ये बताया कि सरकार ने रात में फैसला लिया है कि सेंगर का यह पूरा मामला, जिसमें रेप और रेप पीड़िता के पिता की निर्मम हत्या भी शामिल है, सीबीआई को सौंपा जा रहा है.

ताज्जुब की बात तो ये हुई कि सवालों के जवाब में डीजीपी ने ये कहने में कोई हिचक नहीं की, "क्योंकि मामले को अब सीबीआई को भेजने का निर्णय लिया गया है, इसलिए विधायक को यूपी पुलिस गिरफ़्तार नहीं करेगी. ये अब सीबीआई पर है कि वो उन्हें गिरफ़्तार करती है या नहीं."

बात तो और बिगड़ी जब डीजीपी उस दोषी बलात्कारी विधायक को 'माननीय' कह-कहकर बुलाने लगे. इतना ही नहीं, मीडिया की ओर से पूछे जाने पर उन्होंने यह सफाई दी, "जब तक आरोपी को कोर्ट की ओर से दोषी नहीं ठहराया जाता, तब तक विधायक होने के नाते उन्हें माननीय कहना जायज़ है."

वैसे तो इस बात का शक़ होना लाज़मी था कि ऐसे हालात में जब तक सीबीआई केस को लेने के लिए रज़ामंद नहीं होती, सेंगर मज़े से खुलेआम घूम सकते हैं. पर इसी बीस इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ख़ुद मामले का संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया. चीफ़ जस्टिस ने प्रदेश के महाधिवक्ता को भी तलब करके पूछा कि वो बताएं कि दोषी विधायक को गिरफ़्तार किया जाएगा या नहीं.

हाईकोर्ट के सख़्त रवैये से घबराकर केंद्रीय सरकार ने रातों-रात मामला सीबीआई को ट्रांसफर कर दिया, जिसका अंजाम ये हुआ कि शुक्रवार की सुबह सीबीआई टीम ने 'माननीय' विधायक को हिरासत में ले लिया. इससे उत्तर प्रदेश सरकार की कमज़ोरी और खुलकर ज़ाहिर हो गई.

टूटा आत्मप्रचारित भ्रम

योगी आदित्यनाथ

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ज़ोर ज़ोर से रोज़ गुर्राने वाले मुख्यमंत्री जो यह कहते थकते नहीं कि उनके राज में आम आदमी और ख़ास तौर से महिलाएं पूरी तरह सुरक्षित हैं, शुक्रवार सुबह ही मध्य प्रदेश के किसी मंदिर में पूजा करते हुए टीवी चैनल पर दिख रहे थे.

उनके 'अपराधियों को बख़्शा नहीं जाएगा' वाले दावे की आज खिल्ली उड़ रही है. अभी तक वो बड़ी शान से ये बताते थे कि उनकी सरकार में हुए 1100 एनकाउंटरों के डर से अपराधी प्रदेश छोड़कर भाग रहे हैं. शायद वो ये भूल गए कि इस डर में उनकी पार्टी में बैठे अपराधी उसी तरह से शामिल नहीं हैं. यह वैसा ही है, जैसे अखिलेश यादव के कार्यकाल में सपा के दागियों को क़ानून से पूरी छूट मिली हुई थी.

योगी आदित्यनाथ के दावे इतने खोखले साबित होंगे, इसका अंदाज़ा उन वोटरों को शायद नहीं था जिन्होंने भाजपा को वोट देकर विधानसभा चुनावों में 403 में से 324 सीटें जितवाई थीं.

योगी को पहला झटका तब लगा था जब उनकी खाली की हुई गोरखपुर लोकसभा सीट पर उपचुनाव में खड़े हुए उन्हीं के नुमाइंदे को बुरी हार का सामना करना पड़ा. उनका अतिआत्मविश्वास जो उस सीट पर लगातार पांच बार क़ाबिज़ रहने के कारण था, उन्हें ही ले डूबा.

आज उन्नाव रेप कांड में जिस तरह उन्हें मुंह की खाने पड़ी है और उससे उन्हीं का आत्मप्रचारित भ्रम भी टूट गया कि ना तो वो ख़ुद कोई ग़लत काम करते हैं और ना ही किसी में दम है कि जो उनसे ग़लत काम करवा सके.

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